बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 19

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पौलुस इफिसुस पहुँचता है, वहाँ कुछ चेलों को पवित्र आत्मा में पूरा करता है, तीन महीने आराधनालय में और दो साल तुरन्नुस की पाठशाला में सिखाता है, और परमेश्वर उसके हाथों से अद्भुत काम करते हैं। जब स्क्किवा के पुत्रों का झाड़-फूँक का धंधा बुरी तरह उलटा पड़ता है, तो शहर में डर छा जाता है और विश्वासी अपनी जादू की पोथियाँ, पचास हजार चाँदी के सिक्कों के बराबर, सबके सामने जला देते हैं। इसके बाद चाँदी के मंदिर बनानेवाले दिमेत्रियुस का धंधा खतरे में पड़ता है और पूरा शहर रंगशाला में दंगे पर उतर आता है।

मूल बात

यह अध्याय दिखाता है कि सुसमाचार केवल मन बदलता नहीं, बजट बदलता है। पचास हजार चाँदी के सिक्के आग में डालना कोई भावनात्मक क्षण नहीं था; वह आर्थिक आत्महत्या जैसी दिखनेवाली आज्ञाकारिता थी। ये पोथियाँ इफिसुस के लोगों का बीमा थीं, उनका सुरक्षा-कवच, उनकी कमाई का साधन। परमेश्वर का राज्य आते ही यह सवाल उठता है कि तुम्हारी सुरक्षा किस पर टिकी है। और दूसरी ओर दिमेत्रियुस दिखाता है कि विरोध अक्सर धर्म के नाम पर आता है जबकि जड़ पैसे में होती है: "तुम जानते हो कि इस काम से हमें कितना धन मिलता है।" पहले लाभ, फिर देवी। ईमानदारी से पूछें: हमारे विश्वास के कितने हिस्से इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि उनसे हमारा धंधा चलता है?

मुख्य सूत्र

यीशु ने कहा था कि कोई दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, और इफिसुस में यह वचन धुएँ के रूप में दिखाई देने लगा। पुराने नियम में जब भी परमेश्वर के लोग सचमुच लौटे, मूर्तियाँ तोड़ी गईं, अशेरा के खंभे काटे गए; पश्चाताप कभी केवल भीतरी नहीं रहा, उसने हमेशा घर के सामान को छुआ। मसीह के क्रूस और पुनरुत्थान से जो अधिकार आया, वह इफिसुस में "प्रभु यीशु के नाम" के रूप में काम करता है, और वही नाम लोगों को अपने छिपे कामों को "मान लेने और प्रगट करने" तक ले आता है। छुटकारे की कहानी सदा एक ही दिशा में चलती है: प्रकाश में आना, और फिर जो प्रकाश में टिक नहीं सकता उसे छोड़ देना।

दर्पण

आपकी पोथियाँ कहाँ रखी हैं? हो सकता है वे आपकी फाइलों में हों: वह ग्राहक जिसके साथ हिसाब साफ नहीं है, वह आय जो टैक्स में दिखती नहीं। हो सकता है वे आपके फोन में हों, वह चीज़ जिसे आप महीनों से मिटाना टाल रहे हैं क्योंकि उसे छोड़ना खाली लगेगा। हो सकता है वह वह सम्बन्ध हो जिसे आप ईश्वर के सामने लाने से बचते हैं, या वह डर जिसके कारण आप कुंडली, टोना, या "बस सुरक्षा के लिए" रखे गए तावीज़ को छोड़ नहीं पाते। ध्यान दें, इफिसुस में विश्वास करने के बाद भी ये चीज़ें बहुतों के पास थीं। पश्चाताप एक बार का बपतिस्मा नहीं, बार-बार का हिसाब है, और वह सार्वजनिक हुआ: "सब के सामने"।

एक बारीकी

स्क्किवा के सात पुत्रों का वाक्य ध्यान से पढ़िए: "जिस यीशु का प्रचार पौलुस करता है, मैं तुम्हें उसी की शपथ देता हूँ।" यह उधार का विश्वास है। यीशु का नाम उनके लिए एक असरदार तकनीक था, किसी और के अनुभव से लिया गया मंत्र। दुष्टात्मा का उत्तर चुभता है: "यीशु को मैं जानती हूँ, और पौलुस को भी पहचानती हूँ; परन्तु तुम कौन हो?" यही सवाल आज हर उस व्यक्ति के सामने खड़ा है जो मसीही भाषा में माहिर है पर मसीह से अनजान: वह उपदेशक, वह समूह-अगुआ, वह माता-पिता जो बच्चों को प्रार्थना सिखाते हैं पर स्वयं वर्षों से प्रार्थना नहीं करते। नाम काम करता है, पर वह किराए पर नहीं मिलता।

पृष्ठभूमि

इफिसुस रोमी आसिया का सबसे बड़ा व्यापारिक शहर था, और अरतिमिस का मंदिर संसार के सात आश्चर्यों में गिना जाता था। वहाँ धर्म और अर्थव्यवस्था एक ही सिक्के के दो पहलू थे: तीर्थयात्री आते, चाँदी की छोटी प्रतिमाएँ खरीदते, कारीगरों का पेट भरता, शहर की प्रतिष्ठा बढ़ती। इसीलिए दिमेत्रियुस का गुस्सा समझ में आता है; पौलुस का प्रचार उसकी रोज़ी पर हमला था। रंगशाला में पच्चीस हज़ार लोग बैठ सकते थे, और भीड़ का दो घंटे तक एक ही नारा लगाना, वह भी जब "बहुत से लोग तो यह जानते भी नहीं थे कि वे किस लिये इकट्ठे हुए हैं," भीड़ की प्रकृति का सटीक चित्र है। नगर मंत्री का हस्तक्षेप डर से आया, न्याय से नहीं: रोम दंगों को माफ नहीं करता था।

श्रोताओं का चेहरा

लूका के पहले पाठक अल्पसंख्यक थे, आर्थिक रूप से कमज़ोर, और अच्छी तरह जानते थे कि मसीह का अनुसरण करने पर ठेका छूट सकता है, परिवार नाराज़ हो सकता है, मोहल्ला बहिष्कार कर सकता है। उनके लिए यह अध्याय सांत्वना और चेतावनी दोनों था। सांत्वना, क्योंकि पौलुस के मित्र, आसिया के हाकिमों तक, उसकी रक्षा में खड़े होते हैं और परमेश्वर व्यवस्था के साधारण साधनों से भी अपने लोगों को बचाते हैं। चेतावनी, क्योंकि यहाँ कोई चमत्कारी छुटकारा नहीं है, केवल एक डरा हुआ अधिकारी और एक भीड़ जो थक जाती है। वे यह सुनते थे कि "प्रभु का वचन सामर्थ्यपूर्वक फैलता गया", और साथ ही यह कि उस फैलाव की कीमत किसी की कमाई से चुकाई जाती है।

चिंतन

अगर आज आपको अपनी "पोथियाँ" सबके सामने जलानी पड़ें, तो सबसे पहले किस चीज़ का नाम लेने में आपको सबसे ज़्यादा डर लगेगा, और वह डर किसका है: नुकसान का या शर्म का?

आपके जीवन में कौन-सा विश्वास इसलिए सुरक्षित है कि उससे आपका "धंधा" चलता है, चाहे वह पैसा हो, पद हो, या लोगों की नज़र में आपकी छवि?

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

I. Howard Marshall

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Acts

Ajith Fernando

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Acts 19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 19 का क्या अर्थ है?
पौलुस इफिसुस पहुँचता है, वहाँ कुछ चेलों को पवित्र आत्मा में पूरा करता है, तीन महीने आराधनालय में और दो साल तुरन्नुस की पाठशाला में सिखाता है, और परमेश्वर उसके हाथों से अद्भुत काम करते हैं। जब स्क्किवा के पुत्रों का झाड़-फूँक का धंधा बुरी तरह उलटा पड़ता है, तो शहर में डर छा जाता है और विश्वासी अपनी जादू की पोथियाँ, पचास हजार चाँदी के सिक्कों के बराबर, सबके सामने जला देते हैं। इसके बाद चाँदी के मंदिर बनानेवाले दिमेत्रियुस का धंधा खतरे में पड़ता है और पूरा शहर रंगशाला में दंगे पर उतर आता है।
प्रेरितों के काम 19 किस विषय में है?
यीशु ने कहा था कि कोई दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, और इफिसुस में यह वचन धुएँ के रूप में दिखाई देने लगा। पुराने नियम में जब भी परमेश्वर के लोग सचमुच लौटे, मूर्तियाँ तोड़ी गईं, अशेरा के खंभे काटे गए; पश्चाताप कभी केवल भीतरी नहीं रहा, उसने हमेशा घर के सामान को छुआ। मसीह के क्रूस और पुनरुत्थान से जो अधिकार आया, वह इफिसुस में "प्रभु यीशु के नाम" के रूप में काम करता है, और वही नाम लोगों को अपने छिपे कामों को "मान लेने और प्रगट करने" तक ले आता है। छुटकारे की कहानी सदा एक ही दिशा में चलती है: प्रकाश में आना, और फिर जो प्रकाश में टिक नहीं सकता उसे छोड़ देना।
प्रेरितों के काम 19 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
स्क्किवा के सात पुत्रों का वाक्य ध्यान से पढ़िए: "जिस यीशु का प्रचार पौलुस करता है, मैं तुम्हें उसी की शपथ देता हूँ।" यह उधार का विश्वास है। यीशु का नाम उनके लिए एक असरदार तकनीक था, किसी और के अनुभव से लिया गया मंत्र। दुष्टात्मा का उत्तर चुभता है: "यीशु को मैं जानती हूँ, और पौलुस को भी पहचानती हूँ; परन्तु तुम कौन हो?
प्रेरितों के काम 19 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका के पहले पाठक अल्पसंख्यक थे, आर्थिक रूप से कमज़ोर, और अच्छी तरह जानते थे कि मसीह का अनुसरण करने पर ठेका छूट सकता है, परिवार नाराज़ हो सकता है, मोहल्ला बहिष्कार कर सकता है। उनके लिए यह अध्याय सांत्वना और चेतावनी दोनों था। सांत्वना, क्योंकि पौलुस के मित्र, आसिया के हाकिमों तक, उसकी रक्षा में खड़े होते हैं और परमेश्वर व्यवस्था के साधारण साधनों से भी अपने लोगों को बचाते हैं। चेतावनी, क्योंकि यहाँ कोई चमत्कारी छुटकारा नहीं है, केवल एक डरा हुआ अधिकारी और एक भीड़ जो थक जाती है। वे यह सुनते थे कि "प्रभु का वचन सामर्थ्यपूर्वक फैलता गया", और साथ ही यह कि उस फैलाव की कीमत किसी की कमाई से चुकाई जाती है।
प्रेरितों के काम 19 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में कौन-सा विश्वास इसलिए सुरक्षित है कि उससे आपका "धंधा" चलता है, चाहे वह पैसा हो, पद हो, या लोगों की नज़र में आपकी छवि?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Acts 19 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 39

परन्तु यदि तुम कोई और बात पूछना चाहते हो, तो नियमित सभा में उसका फैसला किया जाएगा।" इफिसुस की भीड़ दो घंटे तक चिल्लाती रही, और उनमें से बहुतों को यह भी पता न था कि वे इकट्ठे क्यों हुए हैं। फिर एक नगर अधिकारी शांत स्वर में कहता है, सही बात सही जगह पर तय होगी, शोर से नहीं। परमेश्वर ने अपनी कलीसिया की रक्षा एक ठंडे दिमाग वाले आदमी के ज़रिए की। तुम्हारे झगड़े में भी शायद ऊँची आवाज़ नहीं, ठहराव चाहिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

स्कीवा के सात बेटे यीशु का नाम एक जादुई मंत्र की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। उन्होंने पौलुस को देखा था, नाम सुना था, पर यीशु को जानते नहीं थे। दुष्ट आत्मा ने कहा, "यीशु को मैं जानती हूँ, और पौलुस को भी पहचानती हूँ, परन्तु तुम कौन हो?"

आज भी यही सवाल हमारे सामने खड़ा है। क्या यीशु का नाम हमारे लिए सिर्फ एक शब्द है, या एक रिश्ता? नाम दोहराना आसान है, पर उसे जानना, उसके साथ चलना, यही असली शक्ति है।

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