प्रेरितों के काम 7:51
पाठ
स्तिफनुस अब्राहम से लेकर सुलैमान के मन्दिर तक की पूरी कहानी शान्ति से सुनाता आया था, और फिर अचानक वह इतिहास छोड़कर सीधे अपने न्यायियों की आँखों में देखता है: "हे हठीले, और मन और कान के खतनारहित लोगों, तुम सदा पवित्र आत्मा का विरोध करते हो।" यह कोई ठंडा धर्मशास्त्रीय निष्कर्ष नहीं, बल्कि अभियोग है। जो लोग शरीर में खतने पर गर्व करते थे, उन्हें वह कहता है कि जहाँ चिह्न सबसे ज़रूरी था, यानी मन और कान में, वहाँ वे बिना चिह्न के रह गए। और अन्त में वह पीढ़ियों की डोर जोड़ देता है: "जैसा तुम्हारे पूर्वज करते थे, वैसे ही तुम भी करते हो।" पूर्वजों की कहानी सुनाना उनकी प्रशंसा नहीं थी; वह आईना था।
मर्म
ध्यान दीजिए कि स्तिफनुस यह नहीं कहता कि ये लोग परमेश्वर को नहीं जानते या धर्म से दूर हैं। वे महासभा के सदस्य हैं, व्यवस्था के रखवाले, मन्दिर के संरक्षक। दोष अज्ञान का नहीं, विरोध का है। "सदा" शब्द भारी है: यह एक बार की चूक नहीं, एक आदत बन चुका रवैया है। पवित्र आत्मा बोलते रहते हैं, और मनुष्य हर बार गर्दन अकड़ा लेता है। यही बाइबल में पाप की सबसे असहज परिभाषा है, कि वह मुख्यतः जानकारी की कमी नहीं बल्कि इच्छा का प्रतिरोध है। और इसका उलटा भी उतना ही सच है: यदि परमेश्वर अब भी बोल रहे हैं, तो अनुग्रह अभी बन्द नहीं हुआ। कान का खतना, यानी सुनने की तैयारी, वह जगह है जहाँ आज भी यह लड़ाई हारी या जीती जाती है।
सूत्र
स्तिफनुस का भाषण पूरे पुराने नियम को एक ही दिशा में मोड़ता है: परमेश्वर बार-बार छुड़ानेवाले भेजते हैं, और लोग बार-बार उन्हें ठुकराते हैं। यूसुफ को भाइयों ने बेच दिया, फिर वही उन्हें अकाल से बचाता है। मूसा से उन्होंने कहा, "तुझे किसने हम पर अधिपति और न्यायाधीश ठहराया है?" और उसी को परमेश्वर ने "अधिपति और छुड़ानेवाला ठहराकर" भेजा। यह ढाँचा संयोग नहीं, यह पैटर्न है, और अगली पंक्ति में स्तिफनुस उसे पूरा करता है: "अब तुम भी उसके पकड़वानेवाले और मार डालनेवाले हुए।" यीशु उस लम्बी शृंखला के अन्त में खड़े ठुकराए गए उद्धारक हैं। इसीलिए मसीह का क्रूस केवल एक दुर्घटना नहीं; वह मनुष्य के उस पुराने हठ का चरम है जिसे परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में उलटकर उद्धार बना दिया।
आईना
"मन और कान के खतनारहित" शब्द हमें सहज ही यहूदी महासभा पर छोड़ने का मन करता है, पर पूछिए: आप आखिरी बार कब किसी बात से सचमुच बदले? दफ़्तर में जब किसी जूनियर ने आपके फ़ैसले पर सवाल उठाया, आपने सुना या तुरन्त अपनी स्थिति की रक्षा में जुट गए? घर पर जब पत्नी या पति ने वही पुरानी शिकायत दोहराई, आपने उसे "फिर वही बात" कहकर टाल दिया? पैसे के मामले में जब भीतर से एक असहज आवाज़ आई कि यह खर्च ठीक नहीं, आपने उसे तर्कों से चुप कराया? हठ ऊँची आवाज़ में नहीं आता; वह विनम्र मुस्कान के साथ आता है और कहता है, मैं जानता हूँ। खतरनाक बात यह है कि धार्मिक अनुशासन इस अकड़ को ढँक देता है। महासभा रोज़ प्रार्थना करती थी।
आज ही उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसकी आलोचना आपने पिछले महीने बीच में काटी थी, और उसे दो पंक्तियों का संदेश भेजिए: "तुमने जो कहा था, मैंने ठीक से नहीं सुना। फिर से कहो, मैं इस बार सुनूँगा।"
प्रसंग
यह दृश्य यरूशलेम में, महासभा के सामने घट रहा है, संभवतः यीशु की मृत्यु के दो-तीन साल के भीतर। स्तिफनुस कोई प्रेरित नहीं, बल्कि यूनानी बोलनेवाले विश्वासियों की सेवा के लिए चुना गया एक सेवक है, यानी सत्ता के ढाँचे में सबसे निचला व्यक्ति सबसे ऊँची अदालत के सामने खड़ा है। उस पर आरोप मन्दिर और मूसा की व्यवस्था के विरुद्ध बोलने का है, और ये आरोप हल्के नहीं थे: मन्दिर यरूशलेम की अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय पहचान और धार्मिक सुरक्षा, तीनों का केन्द्र था। महायाजक ने पूछा, "क्या ये बातें सत्य है?" और स्तिफनुस ने बचाव करने के बजाय पूरा इतिहास सुनाया। पद 51 में वह "हमारे पूर्वज" कहना छोड़कर "तुम्हारे पूर्वज" कहने लगता है। यह व्याकरण का नहीं, अलगाव का क्षण है।
एक बारीकी
"कान के खतनारहित" वाक्यांश हमें अटपटा लगता है, पर पुराने नियम के श्रोताओं के लिए यह जाना-पहचाना था। खतना वाचा का चिह्न था, शरीर पर स्थायी निशान कि यह व्यक्ति परमेश्वर का है। भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह ने वही रूपक कान पर लगाया: जो सुन नहीं सकता, उसका कान अभी परमेश्वर के अधिकार में नहीं आया। यानी सुनना केवल जानकारी लेना नहीं; सुनना समर्पण का अंग है। और गौर कीजिए कि यह अभियोग कितना सटीक निकला, क्योंकि तीन पद बाद वे सचमुच "कान बन्द कर लिए"। रूपक शरीर बन गया। जो भीतर बन्द था, वह हाथों से बाहर प्रकट हो गया। हमारे साथ भी यही होता है: भीतर की अनसुनी देर-सबेर व्यवहार में दिखती है, बात काटने में, विषय बदलने में, मोबाइल उठा लेने में।
मुख्य पात्र
स्तिफनुस को समझने की कुंजी यह है कि वह क्रोध में नहीं बोल रहा। जो व्यक्ति कुछ ही मिनट बाद घुटने टेककर कहेगा, "हे प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा," वह बदला लेने के लिए कठोर शब्द नहीं चुनता। उसकी कठोरता प्रेम की आखिरी कोशिश है, उस डॉक्टर जैसी जो मीठी बात छोड़कर सीधे निदान बता देता है क्योंकि समय बचा नहीं। यहाँ हमें एक असहज बात सीखनी है: नम्रता का अर्थ हमेशा नरम शब्द नहीं होता, और तीखे शब्द हमेशा घृणा से नहीं आते। स्तिफनुस पवित्र आत्मा से भरा हुआ है, और वही आत्मा उससे यह अभियोग बुलवाती है। जो आत्मा क्षमा माँगने की शक्ति देती है, वही सच बोलने का साहस भी देती है। दोनों एक ही जड़ से निकलते हैं।
शास्त्र की गूँज
स्तिफनुस के शब्द नए नहीं हैं। जब इस्राएल ने बछड़ा बनाया, परमेश्वर ने मूसा से इसी जाति को "हठीले" कहा था, और यशायाह ने लिखा कि लोगों ने उनके पवित्र आत्मा को दुःखी किया। यानी स्तिफनुस कोई नया आरोप गढ़ नहीं रहा; वह उन्हीं की पवित्र पुस्तकों की भाषा उन्हीं पर लौटा रहा है, और यही उन्हें सबसे ज़्यादा चुभता है। दूसरी गूँज और गहरी है: यीशु ने भी कहा था कि उनके पूर्वजों ने भविष्यद्वक्ताओं को मारा। स्तिफनुस अपने गुरु की ही आवाज़ दोहरा रहा है, और उसी अन्त तक पहुँचता है। जब शास्त्र हमारे विरुद्ध बोलने लगे, तब पता चलता है कि हम उसे पढ़ते हैं या उसका इस्तेमाल करते हैं।
श्रोताओं का चेहरा
लूका यह वृत्तान्त उन कलीसियाओं के लिए लिख रहा है जिनमें यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासी साथ बैठते थे, और जिनमें से कई सिनेगॉग से निकाले जा चुके थे। उनके लिए स्तिफनुस की मृत्यु आराम की कहानी नहीं थी; वह उनका अपना अनुभव थी। साथ ही उन्हें एक चेतावनी भी सुनाई देती थी: यदि परमेश्वर के अपने लोग पीढ़ियों तक आत्मा का विरोध कर सकते हैं, तो कलीसिया इससे स्वतः सुरक्षित नहीं। और एक नाम इस दृश्य में चुपचाप खड़ा है, शाऊल, जिसके पाँवों के पास गवाहों ने कपड़े रखे। पहले पाठक जानते थे कि यही सबसे कठोर गर्दन आगे झुकनेवाली है। इसलिए यह पाठ जितना अभियोग है, उतना ही उम्मीद भी: हठ अन्तिम शब्द नहीं होता।
कठिन प्रश्न
अगर सुनने की क्षमता खुद परमेश्वर का काम है, तो जो नहीं सुनते उन्हें दोष कैसे दिया जाए? स्तिफनुस इस तनाव को हल नहीं करता, वह दोनों सिरे थामे रखता है: कान का खतना परमेश्वर करते हैं, और फिर भी अनसुनी करने का दोष मनुष्य का है। बाइबल यहाँ हमें एक साफ़-सुथरा तर्कशास्त्र नहीं देती, और शायद इसलिए कि जो व्यक्ति सचमुच अनसुना कर रहा है, वह कभी नहीं कहता कि मुझसे यह हो नहीं सकता; वह कहता है कि इसकी ज़रूरत नहीं। हठ अपने आप को असमर्थता नहीं, समझदारी कहकर पेश करता है। इसलिए यह प्रश्न सिद्धान्त की मेज़ पर नहीं, प्रार्थना में हल होता है: यदि आप डरते हैं कि आपका मन कठोर है, तो यह डर ही संकेत है कि आत्मा अभी बोल रही है।
चिन्तन के प्रश्न
पिछले छह महीनों में परमेश्वर ने किस व्यक्ति या परिस्थिति के द्वारा आपसे कुछ ऐसा कहा जिसे आपने सुनकर टाल दिया?
आपके जीवन में कौन-सी धार्मिक आदत ऐसी है जो सुनने की जगह ले चुकी है, यानी जिसे करने के बाद आप मान लेते हैं कि अब बदलने की ज़रूरत नहीं?
स्तिफनुस कठोर सच भी बोलता है और क्षमा भी माँगता है। आप इन दोनों में से किस ओर झुकते हैं, और उसका दूसरा पक्ष सीखने के लिए इस सप्ताह क्या करेंगे?
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Acts 7:51 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रेरितों के काम 7:51 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 7:51 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 7:51 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 7:51 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 7:51 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मूसा के मन में अपने लोगों की सुध लेने की इच्छा आपने ही डाली थी। मेरे मन में भी वैसी करुणा जगाइए कि मैं अपने आसपास के दुख को देख सकूँ। और जब मेरा समय और आपका समय अलग लगे, तब मुझे धीरज दीजिए, क्योंकि आप कभी देर नहीं करते।
चालीस साल मिद्यान के जंगल में भेड़ें चराते हुए मूसा शायद सोच चुका था कि उसकी कहानी खत्म हो गई। पर परमेश्वर ने खुद को ताकत से नहीं, रिश्तों से पहचनवाया: "मैं तेरे पूर्वजों का परमेश्वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्वर, और इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर हूँ।" जिनसे उसने वादा किया, उन्हें वह भूलता नहीं। तेरी चुप्पी के साल भी उसकी याददाश्त में दर्ज हैं।
पिता, धन्यवाद कि पत्थरों की बौछार के बीच भी आपने स्तिफनुस की आँखें खोलीं, और उसने "परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा देखा।" धन्यवाद कि मेरे कठिन समय में भी यीशु बैठे नहीं, मेरे लिए खड़े हैं, और आपका पवित्र आत्मा मुझे भर देता है।
स्तिफनुस की आखिरी बात यही थी: "तुम ने स्वर्गदूतों के द्वारा ठहराई हुई व्यवस्था तो पाई, पर उसका पालन नहीं किया।" उनके पास परमेश्वर का वचन था, पूरे सम्मान के साथ। कमी पाने में नहीं, जीने में थी। मेरी बाइबल में लगे निशान, याद किए हुए वचन, ये सब मुझे बचाते नहीं। सवाल यह है कि आज जो मैं जानता हूँ, क्या उस पर चला भी?
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