प्रेरितों के काम 7
पाठ
महायाजक एक सीधा सवाल पूछता है: "क्या ये बातें सत्य है?" और स्तिफनुस जवाब में अपनी सफाई नहीं देता, वह एक कहानी सुनाता है, अब्राहम से शुरू होकर सुलैमान के मन्दिर तक, पन्द्रह सौ साल लम्बी। उस कहानी के अन्त में वह अपने न्यायियों की ओर मुड़कर कहता है कि जो विरोध उनके पूर्वजों ने किया, वही वे कर रहे हैं; फिर पथराव होता है और वह घुटने टेककर अपने मारनेवालों के लिये प्रार्थना करता हुआ "सो गया।"
ध्यान दीजिए कि स्तिफनुस ने अपने बारे में एक शब्द नहीं कहा। उस पर आरोप था, और उसने इतिहास सुनाया। मानो उसकी बेगुनाही उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितना यह कि परमेश्वर कौन हैं।
मर्म
यह लम्बा भाषण एक ही बात के इर्द-गिर्द घूमता है: परमेश्वर कभी वहाँ नहीं रुकते जहाँ हम उन्हें रखना चाहते हैं। अब्राहम को दर्शन मेसोपोटामिया में मिला, देश के बाहर। यूसुफ के साथ परमेश्वर मिस्र की जेल में थे। मूसा से वे मिद्यान के जंगल में बोले। तम्बू चलता रहा, मन्दिर खड़ा हो गया, और स्तिफनुस कहता है: "परन्तु परमप्रधान हाथ के बनाए घरों में नहीं रहता।"
यह मन्दिर के विरुद्ध ताना नहीं, एक चेतावनी है। जिस क्षण हम परमेश्वर का पता जान लेते हैं, हम सोचने लगते हैं कि हमने उन्हें जान लिया। और तब हम उस आवाज़ को नहीं पहचानते जो बाहर से आती है। "मन और कान के खतनारहित" का यही अर्थ है: धर्म का पूरा ढाँचा, और भीतर एक बन्द दरवाज़ा।
जोड़नेवाला धागा
स्तिफनुस दो कहानियाँ बहुत धीरे-धीरे कहता है, और दोनों का आकार एक है। यूसुफ को भाइयों ने ईर्ष्या से बेच दिया, "परन्तु परमेश्वर उसके साथ था," और वही बिका हुआ भाई बाद में उनका जीवनदाता बना। मूसा को अपनों ने ठुकराया, "तुझे किसने हम पर अधिपति और न्यायाधीश ठहराया है?", और परमेश्वर ने ठीक उसी को "अधिपति और छुड़ानेवाला ठहराकर" भेजा।
स्तिफनुस कहीं नहीं कहता, "और यीशु भी ऐसे ही थे।" उसे कहने की ज़रूरत नहीं। वह केवल पैटर्न रखता है, बार-बार, जब तक सुननेवाले खुद उसमें अपना चेहरा न देख लें। ठुकराया गया छुड़ानेवाला परमेश्वर की कोई आपात-योजना नहीं है; यह उनके काम करने का तरीका है। व्यवस्थाविवरण का वह वचन जिसे स्तिफनुस उद्धृत करता है, "मेरे जैसा एक भविष्यद्वक्ता," इसी धागे को आगे खींचता है।
दर्पण
हम सबके पास अपने मन्दिर हैं। वह चर्च की इमारत हो सकती है, या रविवार की वह व्यवस्था जिसमें कुछ बदलना अखरता है, या सुबह का वह ठीक-ठीक तरीका जिससे हम परमेश्वर से मिलते हैं। इनमें कुछ भी बुरा नहीं। खतरा वहाँ शुरू होता है जहाँ ये चीज़ें परमेश्वर की आवाज़ का एकमात्र स्वीकृत पता बन जाती हैं, और बाकी हर जगह से आनेवाली आवाज़ पर हम कान बन्द कर लेते हैं, जैसे सभा ने किया।
पूछिए: पिछली बार परमेश्वर ने आपसे कुछ ऐसा कब कहा जो आपकी योजना के विरुद्ध था? अगर याद नहीं आता, तो शायद समस्या उनके मौन की नहीं, हमारी सुनवाई की है। अब्राहम के पास "पैर रखने भर की भी" जगह नहीं थी, फिर भी प्रतिज्ञा थी। बेघर होकर भी भरोसा करना सीखना पड़ता है।
आज कुछ करने के लिये: अपने घर की किसी बिलकुल साधारण जगह पर, रसोई में या सीढ़ी पर, जूते उतारकर दो मिनट चुप खड़े रहिए और ऊँचे स्वर में कहिए, "यह जगह भी आपकी है।"
प्रश्न
स्वर्ग खुलता है, और फिर भी पत्थर नहीं रुकते। यह अध्याय का सबसे कठिन हिस्सा है। परमेश्वर स्तिफनुस को दर्शन देते हैं, पर बचाते नहीं। मूसा को उन्होंने चालीस साल बाद लौटाया; स्तिफनुस को उन्होंने कुछ मिनट में जाने दिया।
हम इसे जल्दी से "वह तो शहीद था, उसे महिमा मिली" कहकर ढाँप सकते हैं, पर पाठ ऐसा नहीं करता। पाठ केवल इतना कहता है कि वह "सो गया।" छुटकारा हर बार बाहर निकलने जैसा नहीं दिखता; कभी-कभी वह भीतर खींचे जाने जैसा दिखता है। और यह हमें वहीं छोड़ देता है जहाँ हर रोगी, हर शोक-ग्रस्त परिवार खड़ा होता है: खुला हुआ स्वर्ग दिखता तो है, पर उससे कोई हाथ नीचे नहीं आता। इसका कोई सन्तोषजनक उत्तर यह अध्याय नहीं देता। वह केवल एक खड़े हुए यीशु दिखाता है।
श्रोता
सभा में बैठे लोगों के लिये मन्दिर केवल इमारत नहीं था। वह उनकी पहचान थी, उनकी अर्थव्यवस्था, रोम के अधीन रहते हुए भी उनका एक बचा हुआ गौरव। जब स्तिफनुस कहता है कि परमप्रधान हाथ के बनाए घरों में नहीं रहते, तो उनके कानों में यह धर्मशास्त्र नहीं, देशद्रोह सुनाई देता है।
और लूका के पहले पाठक, जिनमें से कई यूनानी-भाषी यहूदी थे और बहुत मन्दिर के गिरने के बाद पढ़ रहे थे, इसमें कुछ और सुनते: अगर परमेश्वर कभी किसी इमारत के बन्दी नहीं थे, तो इमारत के खँडहर होने पर भी वे नहीं गिरे। तितर-बितर हुई कलीसिया के लिये यह भाषण एक नक्शा था, कि परमेश्वर रास्ते में साथ चलते हैं।
एक बारीकी
स्तिफनुस कहता है कि वह "मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा हुआ" देखता है। बाकी पूरे नए नियम में यीशु दाहिनी ओर बैठे हैं, क्योंकि बैठना पूरे हुए काम और राजा के अधिकार का चिह्न है। यहाँ वे खड़े हैं।
दानिय्येल के उस दर्शन में मनुष्य का पुत्र परमेश्वर के सामने आकर राज्य पाता है; वहाँ दरबार लगा है। और यहाँ, जब नीचे पृथ्वी पर एक सभा स्तिफनुस को दोषी ठहरा रही है, ऊपर का न्यायी अपने गवाह के लिये उठ खड़ा हुआ है। नीचे का फैसला अन्तिम नहीं। इसीलिए स्तिफनुस अपने मारनेवालों के लिये प्रार्थना कर सका, "हे प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा," वही शब्द जो क्रूस पर से आए थे। जो जानता है कि कोई उसके लिये खड़ा है, वह दूसरों को क्षमा करने के लिये स्वतंत्र हो जाता है।
चिंतन के प्रश्न
परमेश्वर ने पिछली बार आपसे कहाँ से बात की थी, किसी ऐसी जगह से जिसे आप "पवित्र भूमि" नहीं मानते थे?
अगर यीशु इस समय आपके लिये खड़े हैं, तो आपके जीवन में कौन सा डर या कौन सी शिकायत अपना वज़न खो देती है?
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Acts 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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प्रेरितों के काम 7 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 7 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मूसा के मन में अपने लोगों की सुध लेने की इच्छा आपने ही डाली थी। मेरे मन में भी वैसी करुणा जगाइए कि मैं अपने आसपास के दुख को देख सकूँ। और जब मेरा समय और आपका समय अलग लगे, तब मुझे धीरज दीजिए, क्योंकि आप कभी देर नहीं करते।
चालीस साल मिद्यान के जंगल में भेड़ें चराते हुए मूसा शायद सोच चुका था कि उसकी कहानी खत्म हो गई। पर परमेश्वर ने खुद को ताकत से नहीं, रिश्तों से पहचनवाया: "मैं तेरे पूर्वजों का परमेश्वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्वर, और इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर हूँ।" जिनसे उसने वादा किया, उन्हें वह भूलता नहीं। तेरी चुप्पी के साल भी उसकी याददाश्त में दर्ज हैं।
पिता, धन्यवाद कि पत्थरों की बौछार के बीच भी आपने स्तिफनुस की आँखें खोलीं, और उसने "परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा देखा।" धन्यवाद कि मेरे कठिन समय में भी यीशु बैठे नहीं, मेरे लिए खड़े हैं, और आपका पवित्र आत्मा मुझे भर देता है।
स्तिफनुस की आखिरी बात यही थी: "तुम ने स्वर्गदूतों के द्वारा ठहराई हुई व्यवस्था तो पाई, पर उसका पालन नहीं किया।" उनके पास परमेश्वर का वचन था, पूरे सम्मान के साथ। कमी पाने में नहीं, जीने में थी। मेरी बाइबल में लगे निशान, याद किए हुए वचन, ये सब मुझे बचाते नहीं। सवाल यह है कि आज जो मैं जानता हूँ, क्या उस पर चला भी?
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