कुलुस्सियों 2
पाठ
लुकस घाटी का एक छोटा शहर, एक घर, दीये की गंध, और एक पत्र जो ऊँची आवाज़ में पढ़ा जा रहा है। जो लोग सुन रहे हैं उन्होंने लिखनेवाले को कभी देखा तक नहीं; वह खुद कहता है कि वह उनके लिये परिश्रम करता है "जिन्होंने मेरा शारीरिक मुँह नहीं देखा।" और फिर वह सीधे मुद्दे पर आता है: मसीह में परमेश्वर का भेद खुल चुका है, उसी में "बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं," इसलिए किसी "लुभानेवाली बातों" के आगे झुकने की ज़रूरत नहीं। क्रूस पर अपराधों का लेख मिटा दिया गया, स्वर्गिक शक्तियों का खुला तमाशा बना। इसलिए खान-पान, पर्व, नये चाँद और सब्त के नियमों से किसी को तुम्हें आँकने मत दो: वे छाया हैं, शरीर मसीह का है।
मर्म
कुलुस्से के विश्वासी एक ऐसी दुनिया में साँस लेते थे जहाँ सुरक्षा हमेशा किसी न किसी कीमत पर मिलती थी। तारों की चाल, मंदिर का पंचांग, देवदूतों के नाम, उपवास और स्पर्श-वर्जनाएँ: ये सब उस अदृश्य शक्ति-तंत्र को साधने के उपाय थे जिससे लोग डरते थे। पौलुस इस पूरे बाज़ार को एक वाक्य से बंद कर देता है: "उसमें ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है।" परमेश्वर ने अपने आप को किश्तों में नहीं बाँटा; वे देह धारण कर पूरे के पूरे आए। और जो उसमें है, वह "भरपूर" है, उसे किसी अतिरिक्त अनुष्ठान से भरा जाना बाकी नहीं। यही सुसमाचार का धारदार किनारा है: मसीह में जोड़ने को कुछ नहीं बचा, सिर्फ़ उसी में चलते रहना बचा है।
साझा सूत्र
ध्यान दीजिए कि पौलुस किन चित्रों से बात करता है: खतना, दफ़न, पर्व, नया चाँद, सब्त। ये सब इस्राएल की कहानी के चिह्न हैं, वे निशान जिनसे एक जाति सदियों तक पहचानी जाती रही। पौलुस उन्हें कूड़ा नहीं कहता; वह कहता है, "ये सब आनेवाली बातों की छाया हैं, पर मूल वस्तुएँ मसीह की हैं।" छाया झूठी नहीं होती, वह सच्ची होती है, पर वह किसी के आने की सूचना भर है। दीवार पर पड़ती परछाईं से आप जान जाते हैं कि कोई दरवाज़े तक आ चुका है। और जब वह व्यक्ति कमरे में खड़ा हो, तो परछाईं से चिपके रहना अजीब है। इस्राएल का पूरा पंचांग, उसका मांस-शरीर पर लगा चिह्न, सब उस एक देह की ओर इशारा करता था जो क्रूस पर टाँगी गई और तीसरे दिन जिलाई गई।
दर्पण
वह डर आज भी ज़िंदा है, बस उसके कपड़े बदल गए हैं। कोई बीमारी की रिपोर्ट आने से पहले मन्नत का हिसाब लगाता है; कोई सोचता है कि उसने उस महीने दशमांश ठीक से नहीं दिया, इसलिए नौकरी गई; कोई उपवास की संख्या गिनकर अपनी आत्मिकता नापता है; कोई घर में शांति न होने पर किसी बुज़ुर्ग के बताए नियम को और कसकर पकड़ लेता है। पौलुस का निदान निर्मम है: "शारीरिक लालसाओं को रोकने में इनसे कुछ भी लाभ नहीं होता।" ये नियम भीतर के आदमी को नहीं बदलते, वे सिर्फ़ उसे व्यस्त रखते हैं। आपको जो चाहिए वह नियंत्रण नहीं, जड़ है: "उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ।"
आज ही एक काग़ज़ पर वह एक शर्त लिखिए जो आप चुपचाप परमेश्वर की स्वीकृति के लिए पूरी करने की कोशिश करते हैं, फिर उसके नीचे लिखिए "तुम मसीह में भरपूर हो गए हो," और वह काग़ज़ फाड़ दीजिए।
अंतर्पाठ
गलातियों के नाम लिखी चिट्ठी में पौलुस लगभग यही लड़ाई लड़ता है: वहाँ भी लोग दिन, महीने और पर्व गिनने लगे थे, और वहाँ भी वह इसे पीछे लौटना कहता है, आज़ाद किए गए दासों का अपनी ज़ंजीर को फिर से प्यार से देखना। और इब्रानियों की पत्री उसी "छाया" वाले चित्र को पूरे विस्तार से खोलती है: मंदिर, बलिदान और याजक सब आनेवाली वास्तविकता के रेखाचित्र थे, जिन्हें मसीह के एक ही बलिदान ने पूरा कर दिया। दोनों जगह तर्क एक ही है, और वह भावुक नहीं बल्कि ऐतिहासिक है: जो हो चुका है, वह दोबारा नहीं किया जा सकता। क्रूस कोई प्रस्ताव नहीं था, वह एक घटना थी, और घटनाएँ दुनिया का नक्शा बदल देती हैं।
प्रश्न
अगर क्रूस पर प्रधानताओं और अधिकारों का "खुल्लमखुल्ला तमाशा" बन चुका है, तो वे आज भी इतनी ताक़त से क्यों काटते हैं? कुलुस्से के विश्वासी यह सुनकर बाहर निकलते थे और वही साम्राज्य, वही कर, वही मंदिर, वही बीमारी उनका इंतज़ार कर रही थी। पौलुस उन्हें यह नहीं कहता कि अब कुछ बुरा नहीं होगा। वह उनकी स्थिति नहीं, उनका स्वामी बदलता है। पराजित शक्तियाँ तुरंत ग़ायब नहीं होतीं; हारी हुई सेना भी गाँव लूटती चलती है जब तक उसका अंतिम सफ़ाया न हो। यह आसान उत्तर नहीं है, और पौलुस इसे आसान बनाता भी नहीं। वह सिर्फ़ यह कहता है कि जयजयकार की ध्वनि पहले ही बज चुकी है, और आप उसी ध्वनि के भीतर जीते हैं।
बारीकी
आयत 14 का "विधियों का वह लेख" यूनानी में खेइरोग्राफ़ोन है, यानी अपने ही हाथ से लिखा गया ऋण-पत्र। उस समय कर्ज़दार खुद लिखता था: इतना मैं देता हूँ, इतने तक चुकाऊँगा, और अपने हस्ताक्षर करता था। वह काग़ज़ दफ़्तर में रखा रहता, और जब तक रहता, आदमी का भविष्य गिरवी रहता। विद्रोहों में भीड़ सबसे पहले इन्हीं दस्तावेज़ों के गोदाम जलाती थी। पौलुस कहता है कि वह काग़ज़ "हमारे नाम पर और हमारे विरोध में था," यानी किसी और ने नहीं, हमने ही उस पर दस्तख़त किए थे। और परमेश्वर ने उसे फाड़ा नहीं, छिपाया नहीं, बल्कि "क्रूस पर कीलों से जड़कर सामने से हटा दिया"। सबके देखने के लिए, खुले में, रद्द।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सा "लेख" है जिसे आप मन ही मन अब भी चुकता करने की कोशिश कर रहे हैं, हालाँकि वह क्रूस पर कीलों से जड़ा जा चुका है?
आपकी आत्मिक आदतें जड़ से उगती हैं या डर से? आप यह फ़र्क़ कैसे पहचानेंगे?
Colossians में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
The Message of Colossians and Philemon
Christ above everything: fullness in him against every substitute.
Paul For Everyone: The Prison Letters
Ephesians, Philippians, Colossians and Philemon in short daily readings.
Colossians and Philemon: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Colossians 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
कुलुस्सियों 2 का क्या अर्थ है?
कुलुस्सियों 2 किस विषय में है?
कुलुस्सियों 2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
कुलुस्सियों 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कुलुस्सियों 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Colossians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
इसलिए भोजन या पेय, या पर्व, या नये चाँद, या सब्त के विषय में कोई तुम पर दोष न लगाए।" पौलुस जानता था कि लोग किस तरह नियमों से तौलते हैं। सोचो, कितनी बार तुमने किसी की नज़र में खरा उतरने के लिए कुछ किया? मसीह ने तुम्हें अपनाया है, यही तुम्हारी पहचान है। छाया को छोड़ो, शरीर को थामे रहो।
पिता, आप जानते हैं कि मेरे भीतर कितना कुछ है जिसे मैं खुद नहीं बदल सकता। बाहर से सब ठीक दिखाना आसान है, पर दिल की गहराई में काम आप ही करते हैं। मसीह में मेरा पुराना स्वभाव उतार दीजिए, और जो नया है उसे मुझमें बढ़ने दीजिए।
न छूना," "न चखना," "हाथ भी न लगाना।" कितने छोटे से वाक्य, पर इनका बोझ कितना भारी। पौलुस इन्हें दोहराता है ताकि तू सुन सके कि ये कितने खोखले हैं। मसीह ने तुझे क्रूस पर आज़ाद किया, और तू फिर से सूची बनाकर जीना चाहता है? नियमों से डर मिटता नहीं, बस छिप जाता है। जो हृदय मसीह से भरा है, उसे ताले की ज़रूरत नहीं।
मत छू," "मत चख," "हाथ मत लगा," ये नियम सुनने में पवित्र लगते हैं, पर पौलुस कहता है कि ये "काम में लाते-लाते नाश हो जाएँगी।" जो चीज़ें मिट जाने वाली हैं, उन पर तेरी पवित्रता कैसे टिकेगी? ज़रा सोच, तू मसीह से जुड़ा है या सिर्फ़ अपनी बनाई सूची से? जीवन नियमों से नहीं, जीवित मसीह से आता है।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
