सभोपदेशक 5:6
पाठ
अपने मुँह से अपने शरीर को पाप में मत फँसाओ। मन्नत मान ली, फिर जब चुकाने का समय आया तो परमेश्वर के दूत के सामने खड़े होकर यह मत कहना, "भूल हो गई, ज़बान फिसल गई, ऐसा कहने का इरादा न था।" उपदेशक का सवाल तीखा है और वह सवाल ही रहने दिया गया है: परमेश्वर क्यों तेरा बोल सुनकर क्रोधित हो, और तेरे हाथ के कार्यों को नष्ट करे? यानी जो वचन तूने हल्के मन से बोला, वह तेरी फसल, तेरे व्यापार, तेरी मेहनत की कमाई तक पहुँच सकता है। बात केवल धार्मिक शिष्टाचार की नहीं, रोटी की है।
मूल बात
कल्पना कीजिए यरूशलेम के मन्दिर का आँगन: भेड़ों की मिमियाहट, जलती चर्बी का धुआँ, भीड़, और उस भीड़ के बीच एक आदमी जो बीमारी या कर्ज़ के दिनों में ऊँची आवाज़ में मन्नत मान चुका था, और अब पीछे हटना चाहता है। उसके सामने खड़ा "परमेश्वर का दूत" कोई स्वर्गदूत नहीं, मन्दिर का वह अधिकारी है जो मन्नतों का हिसाब रखता है। इस आदमी का बहाना सुनकर उपदेशक ठंडे स्वर में कहता है: तू सोचता है परमेश्वर तेरी बहानेबाज़ी को धार्मिक चतुराई मानेंगे? यहाँ मूल बात यह है कि परमेश्वर मनुष्य की वाणी को गम्भीरता से लेते हैं, उससे कहीं अधिक गम्भीरता से जितनी मनुष्य स्वयं लेता है। स्वर्ग में बैठे परमेश्वर और पृथ्वी पर खड़े मनुष्य के बीच की दूरी (पद 2) चुप्पी और भय सिखाती है, लापरवाह वाचालता नहीं। कृपा का अर्थ यह नहीं कि शब्द सस्ते हो गए।
सूत्र
मन्नत इस्राएल की धर्मपरम्परा का सबसे स्वैच्छिक हिस्सा थी। कोई तुमसे माँग नहीं रहा था; तुमने खुद मुँह खोला था। और यही वाचा का पूरा ढाँचा है: परमेश्वर ने पहले अपना वचन बोला, फिर उसे निभाया, यहाँ तक कि तब भी जब उनकी प्रजा ने अपना हिस्सा तोड़ दिया। मनुष्य का वचन हवा में उड़ जाता है, परमेश्वर का वचन देह बनकर हमारे बीच रहने आ गया। यीशु मसीह ने अपने पहाड़ी उपदेश में इसी मन्नत-संस्कृति पर चोट की: कसम मत खाओ, तुम्हारी हाँ हाँ हो। वे मन्नत की व्यवस्था को कमज़ोर नहीं कर रहे थे, बल्कि उपदेशक की बात को उसके अंत तक ले जा रहे थे। और जो हमसे सच्ची ज़बान माँगते हैं, वही क्रूस पर हमारी झूठी ज़बानों का बोझ उठाते हैं। यह छूट नहीं, यह मुक्ति है।
दर्पण
हम मन्दिर के आँगन में नहीं खड़े, पर हमारे पास अपनी मन्नतें हैं। अस्पताल के गलियारे में की गई प्रार्थना: "बस यह बार ठीक हो जाए, फिर मैं…।" नौकरी मिलने से पहले का वादा। विवाह की वेदी पर बोले गए शब्द। बपतिस्मा के समय की गवाही। और फिर संकट टल जाता है, और हम वही करते हैं जो वह आदमी दूत के सामने कर रहा था: "उस वक़्त भावुक हो गया था।" उपदेशक इस बहाने को धार्मिक नहीं, खतरनाक कहते हैं, क्योंकि यह परमेश्वर को अपने ही स्तर पर उतार लेना है, एक ऐसा श्रोता जिसे बातों में उलझाया जा सके। आज ही उस एक वादे को याद कीजिए जो आपने परमेश्वर से किया और चुपचाप दफ़ना दिया, उसे एक वाक्य में कागज़ पर लिखिए और ज़ोर से बोलिए: "यह मैंने कहा था।" बिना "भूल हो गई" जोड़े।
बारीकी
"अपने को पाप में न फँसाना" में जो क्रिया है, वह शिकार की भाषा है। इब्रानी में देह या शरीर शब्द इस्तेमाल हुआ है: अपने मुँह को अपने ही शरीर के लिए जाल मत बनने दो। यह चित्र गाँव के हर सुननेवाले को परिचित था, पक्षी पकड़ने का फन्दा, जो ज़मीन पर बिछा रहता है और दिखता नहीं। तुम्हारा अपना मुँह वह फन्दा है और तुम्हारी अपनी देह वह पक्षी। बोलते समय शब्द भारहीन लगते हैं, हवा जैसे; पर वे ज़मीन पर गिरकर जाल बन जाते हैं, और फँसने वाला कोई और नहीं, तुम्हारा अपना जीवन है, तुम्हारे हाथ का काम, तुम्हारी कमाई। उपदेशक कहते हैं: जुबान से निकली एक हल्की बात पूरे शरीर को खींच ले जाती है।
शास्त्र-संवाद
व्यवस्थाविवरण में मूसा यही चेतावनी देते हैं: मन्नत मानो तो देर मत करो, पर न मानना कोई पाप नहीं। उपदेशक इस पुरानी व्यवस्था को दोहरा नहीं रहे, वे उसे मनुष्य के मन तक ले जा रहे हैं, जहाँ भक्ति अक्सर प्रदर्शन बन जाती है। दूसरी ओर यिप्तह की कहानी पढ़िए, जिसने बिना सोचे मन्नत मानी और फिर उसकी कीमत अपनी बेटी से चुकाई; वह कथा इसी अध्याय का सबसे भयानक उदाहरण है। और इसी अध्याय के भीतर पद 5 पहले ही फैसला सुना चुका है: "मन्नत मानकर पूरी न करने से मन्नत का न मानना ही अच्छा है।" चुप्पी भक्तिहीनता नहीं; कभी-कभी वही सबसे ईमानदार भक्ति है।
पृष्ठभूमि
यह उपदेश दूसरे मन्दिर के दौर का है, जब यहूदा फारसी साम्राज्य का एक छोटा-सा, गरीब प्रान्त था। कर भारी थे, फसल अनिश्चित, और अधिकारियों की परतें एक के ऊपर एक, जैसा पद 8 कहता है। ऐसे माहौल में मन्दिर सिर्फ प्रार्थनाघर नहीं था, वह अर्थव्यवस्था का हिस्सा था: मन्नत का मतलब था भेड़, अनाज, चाँदी, ऐसा कुछ जो परिवार के पेट से निकलता था। इसलिए वादा तोड़ने का प्रलोभन धार्मिक कमज़ोरी नहीं, आर्थिक गणित था। और सामने खड़ा मन्दिर का अधिकारी रजिस्टर में नाम लिखता था। उपदेशक इस दुनिया को अच्छी तरह जानते हैं, और इसीलिए वे भावुक उपदेश नहीं देते, बस एक ठंडा वाक्य: "तू परमेश्वर का भय मानना।"
चिंतन
आपने परमेश्वर से पिछली बार कब कुछ कहा था जो आप निभाने का इरादा नहीं रखते थे, और आपने उसे अपने भीतर किस बहाने से ढका?
अगर आपके शब्द सचमुच आपके हाथ के कामों तक पहुँचते हैं, तो इस सप्ताह आपको कौन-सी एक बात कम बोलनी चाहिए और कौन-सी एक बात कर देनी चाहिए?
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Ecclesiastes 5:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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सभोपदेशक 5:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Ecclesiastes 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जब सम्पत्ति बढ़ती है, तो उसके खानेवाले भी बढ़ जाते हैं; और उसके स्वामी को इससे क्या लाभ, सिवाय इसके कि वह उसे अपनी आँखों से देखता रहे?" सुलैमान के पास सब कुछ था, फिर भी उसने पाया कि बहुत सारा धन केवल देखने के लिए रह जाता है। जो तू जोड़ रहा है, क्या तू उसे सचमुच भोग रहा है, या बस पहरा दे रहा है? परमेश्वर के हाथ से मिली रोटी खाने में जो चैन है, वह तिजोरी में नहीं मिलता।
जो व्यक्ति परमेश्वर के दिए हुए को खाता, पीता और अपने परिश्रम में सुख पाता है, उसके बारे में सुलैमान कहता है, "परमेश्वर उसे उसके मन के आनन्द में लगाए रखता है।" ध्यान दे, यह आनन्द दिनों की गिनती भुला देता है। जो मन कड़वाहट और हिसाब में उलझा है, वह हर बीता दिन गिनता रहता है। आज तेरी थाली में जो सादा रोटी है, क्या तू उसे परमेश्वर का उपहार मानकर खा सकता है?
राजा सिंहासन पर बैठता है, मुकुट पहनता है, आज्ञा देता है। पर उसकी थाली में रोटी किसी किसान के पसीने से आती है। "राजा भी खेत से लाभ उठाता है।"
कोई इतना ऊँचा नहीं जो मिट्टी पर निर्भर न हो। और मिट्टी परमेश्वर की है।
जिस काम को तू छोटा समझकर करता है, कहीं ऐसा न हो कि उसी पर किसी का जीवन टिका हो। और जो तेरे पास है, वह भी किसी के हाथों से आया है, तेरी योग्यता से नहीं।
जब तू परमेश्वर के लिये मन्नत माने, तब उसे पूरी करने में विलम्ब न करना; क्योंकि वह मूर्खों से प्रसन्न नहीं होता। जो मन्नत तू ने मानी है उसे पूरी करना।" संकट की घड़ी में मुँह से निकली बातें याद हैं? "प्रभु, बस इस बार बचा ले, फिर मैं..." राहत मिल गई, और वादा वहीं छूट गया। परमेश्वर भूलता नहीं। आज उसके सामने बैठ, और जो कहा था उसे पूरा कर।
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