सभोपदेशक 7
शोक के घर में
"भोज के घर जाने से शोक ही के घर जाना उत्तम है।" यह वाक्य पढ़कर मन ठिठक जाता है। उपदेशक हमें अंत्येष्टि की ओर धकेल रहा है, जन्मदिन की पार्टी से दूर। यह किसी उदास व्यक्ति की बड़बड़ाहट नहीं है, यह एक चेतावनी है कि जीवन को समझने के लिए हमें मृत्यु के पास बैठना पड़ता है। जो लोग शोक के कमरे से भागते हैं, वे कभी बुद्धिमान नहीं हो पाते। और यहीं से यह पूरा अध्याय अपनी अजीब, कड़वी मिठास के साथ खुलता है।
पाठ
अध्याय सात नीतिवचनों की तरह लगता है, पर इसमें उपदेशक की खास तीखी आवाज़ है। अच्छा नाम इत्र से बेहतर, मृत्यु का दिन जन्म से बेहतर, शोक हँसी से बेहतर। फिर वह बुद्धि, धैर्य, क्रोध, और परमेश्वर के टेढ़े-सीधे कामों पर बोलता है। अंत में वह मानता है कि बुद्धि उससे दूर रही, कि मनुष्य ने सीधे रास्ते छोड़कर बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं।
मूल बात
इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय पद 13 और 14 में है: "जिस वस्तु को उसने टेढ़ा किया हो उसे कौन सीधा कर सकता है?" उपदेशक हमसे कहता है कि सुख और दुःख दोनों परमेश्वर ने एक साथ रखे हैं, ठीक इसलिए कि हम भविष्य को अपनी मुट्ठी में न पकड़ सकें। यह कोई भाग्यवाद नहीं है, यह श्रद्धा है। यह मानना कि परमेश्वर के काम को हम सीधा नहीं कर सकते, यह कोई हार नहीं, बल्कि ज्ञान की शुरुआत है। बुद्धि यहाँ इसलिए मूल्यवान है क्योंकि वह जीवन की टेढ़ी रेखाओं के साथ चलना सिखाती है, न कि उन्हें ज़बरदस्ती सीधा करने की कोशिश करती।
साझा धागा
पद 20 पौलुस ने रोमियों में उठाया: "कोई ऐसा धर्मी मनुष्य नहीं जो भलाई ही करे और जिससे पाप न हुआ हो।" उपदेशक की यह स्वीकारोक्ति सुसमाचार की भूमि तैयार करती है। वह पद 16 में चेतावनी देता है, "अपने को बहुत धर्मी न बना," जो एक विचित्र सलाह लगती है, जब तक हम न समझें कि आत्म-धार्मिकता स्वयं एक जाल है। जिस सीधेपन से परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया (पद 29) और जिन "बहुत सी युक्तियों" में हम भटक गए, उन दोनों के बीच की खाई को केवल मसीह पाटते हैं। वे वह "एक पुरुष" हैं जिसे उपदेशक ढूँढ़ता रहा पर पूरी तरह न पा सका।
दर्पण
क्या आपने कभी गौर किया कि हम मृत्यु से कितना बचते हैं? अस्पताल के कमरे में जाने से पहले हम बहाने बनाते हैं। अंत्येष्टि में जल्दी लौटना चाहते हैं। पद 4 कहता है कि मूर्ख का मन आनन्द करनेवालों के घर लगा रहता है, बुद्धिमान का शोक के घर। यह सोशल मीडिया के युग में और भी चुभता है, जहाँ हम लगातार भोज के घर में रहना चाहते हैं।
और पद 10 का वह सवाल: "बीते दिन इनसे क्यों उत्तम थे?" हम में से कितने इसी में फँसे हैं? पुरानी नौकरी, पुरानी कलीसिया, पुराने रिश्ते। उपदेशक कहता है यह प्रश्न ही मूर्खता है। बीता कल कभी उतना सुनहरा नहीं था जितना स्मृति उसे बनाती है।
मुख्य पात्र
उपदेशक स्वयं यहाँ एक थका हुआ खोजी है। पद 23-25 में वह स्वीकार करता है, "मैं बुद्धिमान हो जाऊँगा, परन्तु यह मुझसे दूर रहा।" यह एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ है जिसने सब कुछ आज़माया, पढ़ा, तौला, और अंत में हाथ ऊपर उठा दिए। पर यह निराशा नहीं है, यह नम्रता है। वह परमेश्वर के सामने खड़ा है यह जानते हुए कि "जो दूर और अत्यन्त गहरा है, उसका भेद कौन पा सकता है?" उसका आध्यात्मिक भूगोल यह है: बहुत ज्ञान, बहुत थकान, और अंत में परमेश्वर का भय (पद 18) जो एकमात्र स्थिर ज़मीन बचती है। वह हमें अपनी असफलताओं के ज़रिए सिखाता है, अपनी सफलताओं से नहीं।
अंतर्पाठ
याकूब 1:19 पद 9 की गूँज है: क्रोध में उतावली न कर। दोनों लेखक मानते हैं कि क्रोध मूर्खों के हृदय में बसता है। और पद 20 का रोमियों 3:10 से जुड़ाव तो सीधा है, पौलुस उपदेशक की इस पंक्ति को उठाकर पूरे मानव जाति के ऊपर छत की तरह टाँग देता है। पर एक और गूँज सुनिए: यीशु ने कहा था कि जो शोक करते हैं वे धन्य हैं। उपदेशक जो पद 3 में "हँसी से खेद उत्तम है" कहता है, यीशु उसे पर्वत पर आशीष में बदल देते हैं। पुराने नियम की तीखी बुद्धि और नए नियम की कोमल कृपा एक ही सत्य के दो पहलू हैं।
संदर्भ
उपदेशक की पुस्तक एक ऐसे युग से आती है जब इस्राएल का ज्ञान-साहित्य पक चुका था। यह नीतिवचन जैसी सरल "अच्छा करो तो अच्छा पाओ" वाली बुद्धि से आगे बढ़ चुका था। लेखक ने देखा था कि धर्मी नाश हो जाते हैं और दुष्ट फलते-फूलते हैं (पद 15)। यह किसी युवा उत्साही की आवाज़ नहीं है, यह किसी ऐसे व्यक्ति की है जिसने राजदरबार देखा, घूस देखी (पद 7), चापलूसी सुनी, दासों की बड़बड़ाहट सुनी (पद 21)। प्राचीन निकट पूर्व में "अच्छा नाम" (पद 1) व्यक्ति की सबसे बड़ी सम्पत्ति थी, धन से भी ब
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Ecclesiastes 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Ecclesiastes 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हँसी से खेद उत्तम है, क्योंकि उदास मुख से मन सुधरता है।" सुलैमान हँसी के विरुद्ध नहीं है, वह उस हँसी के विरुद्ध है जो सच्चाई से बचकर भागती है। दुख तुम्हें बैठाकर वह सवाल पूछता है जिसे तुम भीड़ और शोर में टालते रहे। जो आँसू तुम आज रो रहे हो, शायद वही तुम्हारे भीतर कुछ सीधा कर रहे हैं।
पिता, मुझे ऐसी समझ दीजिए जो ताकत से नहीं, आपके साथ चलने से आती है। जब मैं अपने बल पर भरोसा करने लगूँ, तो मुझे याद दिलाइए कि सच्ची मजबूती आपकी बुद्धि में छिपी है। हर फैसले में मेरा मन आपकी ओर झुका रहे।
अति धर्मी न बन, और न अपने आप को बुद्धिमान बना; तू अपने आप को क्यों नाश करे?"
यह पाप करने की छूट नहीं है। यह उस थकान की चेतावनी है जो अपने आप को सिद्ध साबित करते रहने से आती है। जब धार्मिकता एक नाप बन जाती है, तो पहले हम दूसरों को नापते हैं, फिर खुद को, और अंत में परमेश्वर को भी।
तू क्या साबित करने में घिस रहा है? उसने तुझे पहले ही अपना कहा है।
सुख के दिन में आनन्दित रह, और दुःख के दिन में सोच; क्योंकि परमेश्वर ने दोनों को एक साथ रखा है, ताकि मनुष्य अपने बाद होनेवाली किसी बात को न जान सके।" कल का पन्ना तुझसे छिपा है, यह सज़ा नहीं, दया है। अच्छे दिन को पूरे मन से जी ले, और भारी दिन में बैठकर सोच कि परमेश्वर तुझे क्या सिखा रहा है। दोनों उसी के हाथ से आते हैं।
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