बाइबल व्याख्या

निर्गमन 37

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

बसलेल बबूल की लकड़ी काटता है, उस पर सोना चढ़ाता है, और एक-एक नाप के अनुसार सन्दूक, मेज, दीवट और धूपवेदी गढ़ता है। सन्दूक के ऊपर प्रायश्चित का ढकना रखा जाता है, जिसके दोनों सिरों पर दो करूब अपने पंख फैलाकर आमने-सामने, ढकने की ओर देखते खड़े हैं। अंत में अभिषेक का पवित्र तेल और सुगन्ध-द्रव्य का धूप "गंधी की रीति के अनुसार" तैयार किया जाता है। पूरा अध्याय किसी चमत्कार का नहीं, निपुण हाथों के परिश्रम का ब्यौरा है।

मर्म

यह अध्याय एक बात पर अड़ा हुआ है: परमेश्वर अपनी उपस्थिति के लिए कोई भी नाप स्वयं तय करते हैं, और मनुष्य उसे बदल नहीं सकता। ढाई हाथ, डेढ़ हाथ, चार अंगुल; सब पहले से ठहराया हुआ है। हमें लगता है कि आराधना वहीं से शुरू होती है जहाँ हमारा मन उमड़ता है, पर यहाँ आराधना वहीं से शुरू होती है जहाँ आज्ञा दी गई है। और उस सारी बनावट का केंद्र खाली नहीं है: सन्दूक के ऊपर सिंहासन नहीं, "प्रायश्चित का ढकना" है। इब्रानी शब्द कप्पोरेत का मूल अर्थ ही ढाँकना है। परमेश्वर अपने लोगों के बीच बैठते हैं, पर उस जगह पर जहाँ दोष ढका जाता है। पवित्रता और दया एक ही सोने के टुकड़े से गढ़ी गई हैं।

सूत्र

ध्यान दीजिए कि सन्दूक के चारों पायों पर कड़े ढाले गए और उनमें डंडे डाले गए, "कि उनके बल सन्दूक उठाया जाए।" परमेश्वर का सिंहासन चलने के लिए बना है। जो राष्ट्र अभी रेगिस्तान में भटक रहा है, उसके साथ-साथ यह उपस्थिति चलेगी। यही सूत्र नए नियम तक खिंचता है: वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच डेरा किया। और वह ढकना? इब्रानियों की पत्री ठीक उसी करूबों से ढँके ढकने तक पाठक को ले जाती है, यह दिखाने के लिए कि मसीह का लहू उस जगह पर चढ़ाया गया है जिसका पूर्वाभास बसलेल की छेनी ने गढ़ा था। बबूल की साधारण लकड़ी, सोने से मढ़ी हुई, एक कमजोर मनुष्यता में बसी महिमा की ओर इशारा करती है।

आईना

इस अध्याय का सबसे असुविधाजनक वाक्य दूसरा पद है: "उसने उसको भीतर बाहर शुद्ध सोने से मढ़ा।" भीतर का सोना किसी ने नहीं देखा। ढक्कन बन्द होने के बाद कौन जाँचता कि अंदर क्या है? बसलेल ने फिर भी मढ़ा। अब अपने आप से पूछिए: आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा केवल बाहर से मढ़ा है? वह रिपोर्ट जो किसी को जाँचनी नहीं है, वह वादा जो पत्नी भूल चुकी है, वह हिसाब जो कोई नहीं देखेगा, वह गुस्सा जो आप घर पहुँचने तक दबा रखते हैं और फिर बच्चों पर उतार देते हैं। हम अधूरे काम के बहुत अच्छे कारीगर हैं। और दूसरी ओर, यही अध्याय आपको राहत भी देता है: परमेश्वर ने अपने सिंहासन के ऊपर जो रखा वह न्याय का पलड़ा नहीं, ढकना है। आपको अपना भीतर चमकाकर उनके पास जाने की ज़रूरत नहीं; ढकने के नीचे आने की ज़रूरत है।

आज, अगले दस मिनट में: एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसे आप लोगों से छिपाकर रखते हैं। उसके नीचे लिखिए "प्रायश्चित का ढकना"। कागज़ हाथ में लेकर ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से कहिए कि आप उसे ढकने के नीचे रख रहे हैं, और फिर उसे फाड़ दीजिए।

अंतर्पाठ

लैव्यव्यवस्था 16 में यही ढकना साल में एक बार लहू से छींटा जाता है; प्रायश्चित का दिन इसी सोने के टुकड़े के इर्द-गिर्द घूमता है। जो वस्तु यहाँ बन रही है, वह बाद में इस्राएल के सबसे गम्भीर दिन का केंद्र बनती है। और लूका में जो चुंगी लेनेवाला मन्दिर के पिछले कोने में खड़ा होकर छाती पीटते हुए दया माँगता है, वह ठीक उसी शब्द-परिवार का प्रयोग करता है जो इस ढकने से जुड़ा है: मुझ पापी पर ढकना कर दे, मेरे लिए प्रायश्चित हो जाए। बसलेल की छेनी और उस आदमी की प्रार्थना एक ही जगह पर मिलती हैं। यह पढ़कर आराधना के बारे में हमारी सोच बदलनी चाहिए: वह ठहराए हुए स्थान पर खाली हाथ आना है।

मुख्य पात्र

बसलेल इस अध्याय में चुप है। एक भी शब्द नहीं बोलता, केवल करता है। कोई दर्शन, कोई भविष्यवाणी, कोई नाम-प्रसिद्धि नहीं; सोना गढ़ना, कड़े ढालना, बादाम के फूल के समान पुष्पकोष बनाना। दीवट पूरा "गढ़े हुए शुद्ध सोने का और एक ही टुकड़े का" है, यानी जोड़कर नहीं, पीटकर बनाया गया, धैर्य का काम जिसमें एक गलत चोट सब बिगाड़ देती है। और उसने पूरा किक्कार भर सोना इस एक वस्तु में लगा दिया। यह आदमी हमें दिखाता है कि आत्मा से भरा होना हमेशा मंच पर चढ़ना नहीं होता; कभी वह सधे हुए हाथ, नपी हुई आज्ञाकारिता और किसी के न देखने पर भी पूरा किया गया काम होता है।

पाठक-वर्ग

पहले सुननेवाले वे लोग थे जिन्होंने मिस्र के विशाल मन्दिर देखे थे, पत्थर के स्तंभ, देवताओं की मूर्तियाँ। उनके कानों में यह ब्यौरा दो बातें चिल्लाता था। पहली: हमारे परमेश्वर के सिंहासन पर कोई मूर्ति नहीं; करूब आमने-सामने देखते हैं, और बीच में जगह खाली है। दूसरी: यह सब डंडों पर उठाया जा सकता है। फिरौन का देवता अपनी जगह से बँधा था; यह परमेश्वर चलते हुए लोगों के साथ चलते हैं। जो जाति अभी-अभी सोने के बछड़े में गिर चुकी थी, उसके लिए यह अध्याय क्षमा का चिह्न भी था: वही सोना, वही हाथ, पर इस बार परमेश्वर के कहे अनुसार।

चिंतन

आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा केवल बाहर से मढ़ा है, और आज उसे भीतर से मढ़ना कैसा दिखेगा?

क्या आप परमेश्वर के पास अपना सोना लेकर जाते हैं, या ढकने के नीचे खाली हाथ?

Exodus में और गहराई से जानें

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The Message of Exodus

Alec Motyer

Traces how God rescues a people for himself, from slavery to Sinai.

Exodus For You

Tim Chester

An accessible chapter by chapter guide that keeps pointing to Jesus.

Exodus: An Introduction and Commentary

R. Alan Cole

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Exodus

Peter Enns

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Exodus: Saved for God's Glory

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Exodus 37 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

निर्गमन 37 का क्या अर्थ है?
बसलेल बबूल की लकड़ी काटता है, उस पर सोना चढ़ाता है, और एक-एक नाप के अनुसार सन्दूक, मेज, दीवट और धूपवेदी गढ़ता है। सन्दूक के ऊपर प्रायश्चित का ढकना रखा जाता है, जिसके दोनों सिरों पर दो करूब अपने पंख फैलाकर आमने-सामने, ढकने की ओर देखते खड़े हैं। अंत में अभिषेक का पवित्र तेल और सुगन्ध-द्रव्य का धूप "गंधी की रीति के अनुसार" तैयार किया जाता है। पूरा अध्याय किसी चमत्कार का नहीं, निपुण हाथों के परिश्रम का ब्यौरा है।
निर्गमन 37 किस विषय में है?
ध्यान दीजिए कि सन्दूक के चारों पायों पर कड़े ढाले गए और उनमें डंडे डाले गए, "कि उनके बल सन्दूक उठाया जाए।" परमेश्वर का सिंहासन चलने के लिए बना है। जो राष्ट्र अभी रेगिस्तान में भटक रहा है, उसके साथ-साथ यह उपस्थिति चलेगी। यही सूत्र नए नियम तक खिंचता है: वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच डेरा किया। और वह ढकना?
निर्गमन 37 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज, अगले दस मिनट में: एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसे आप लोगों से छिपाकर रखते हैं। उसके नीचे लिखिए "प्रायश्चित का ढकना"। कागज़ हाथ में लेकर ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से कहिए कि आप उसे ढकने के नीचे रख रहे हैं, और फिर उसे फाड़ दीजिए।
निर्गमन 37 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
बसलेल इस अध्याय में चुप है। एक भी शब्द नहीं बोलता, केवल करता है। कोई दर्शन, कोई भविष्यवाणी, कोई नाम-प्रसिद्धि नहीं; सोना गढ़ना, कड़े ढालना, बादाम के फूल के समान पुष्पकोष बनाना। दीवट पूरा "गढ़े हुए शुद्ध सोने का और एक ही टुकड़े का" है, यानी जोड़कर नहीं, पीटकर बनाया गया, धैर्य का काम जिसमें एक गलत चोट सब बिगाड़ देती है। और उसने पूरा किक्कार भर सोना इस एक वस्तु में लगा दिया। यह आदमी हमें दिखाता है कि आत्मा से भरा होना हमेशा मंच पर चढ़ना नहीं होता; कभी वह सधे हुए हाथ, नपी हुई आज्ञाकारिता और किसी के न देखने पर भी पूरा किया गया काम होता है।
निर्गमन 37 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा केवल बाहर से मढ़ा है, और आज उसे भीतर से मढ़ना कैसा दिखेगा?
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Exodus 37 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 10

पिता, बसलेल ने जिस मन के साथ वह मेज़ बनाई, वैसा ही मन मुझे भी दे। मेरे हाथों का छोटा सा काम भी तेरे लिए हो, नाप नाप कर, प्रेम से किया हुआ। और जो मेज़ तू सजाता है, उस पर मुझे भी बिठा ले, क्योंकि तेरी रोटी से ही मेरा जीवन चलता है।

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