यहेजकेल 24
पाठ
"तब मैं सवेरे लोगों से बोला, और साँझ को मेरी स्त्री मर गई।" पूरा शोक एक पंक्ति में समेट दिया गया है, और अगली सुबह भविष्यद्वक्ता वही करता है जो उसे कहा गया था: कुछ नहीं। अध्याय दो हिस्सों में चलता है। पहले हण्डे का दृष्टान्त: यरूशलेम एक उबलता बर्तन है, माँस और हड्डियाँ भीतर, और नीचे आग तेज की जा रही है, जब तक बर्तन खाली होकर अंगारों पर तपने न लगे, क्योंकि उसका जंग किसी तरह छूटता नहीं। फिर यहेजकेल की पत्नी की मृत्यु, बिना विलाप के, इस्राएल के लिए चिन्ह कि उनका पवित्रस्थान भी अपवित्र होगा और वे भी रो न सकेंगे।
मर्म
यह पाठ परमेश्वर के धीरज की सीमा दिखाता है, और वह दृश्य सहज नहीं है। "मैं उसके कारण परिश्रम करते-करते थक गया, परन्तु उसका भारी जंग उससे छूटता नहीं।" शुद्धिकरण की कोशिश हुई थी; भविष्यद्वक्ता भेजे गए, चेतावनियाँ दी गईं, निर्वासन का पहला दौर बीत चुका। अब आग इसलिए तेज नहीं की जाती कि भोजन पके, बल्कि इसलिए कि बर्तन खाली होकर स्वयं जले। पाप यहाँ कोई दुर्घटना नहीं, वह धातु में बैठा जंग है। और परमेश्वर के वचन में सबसे कठोर शब्द नैतिक नहीं, व्यक्तिगत हैं: "मैं तुझे न छोड़ूँगा, न तुझ पर तरस खाऊँगा, न पछताऊँगा।" वह परमेश्वर जो सदा पछताने को तैयार रहते हैं, यहाँ कहते हैं कि अब नहीं। इसे जल्दी से मीठा कर देना पाठ के साथ बेईमानी होगी।
जोड़ने वाला सूत्र
ध्यान दीजिए कि यहेजकेल किस तरह चिन्ह बनता है: उसका निजी दुःख सार्वजनिक संदेश बन जाता है। परमेश्वर उसकी "आँखों की प्रिय" को ले लेते हैं ताकि लोग समझें कि उनकी आँखों की चाही हुई वस्तु, मन्दिर, ली जाएगी। भविष्यद्वक्ता का शरीर और जीवन ही उपदेश है। यही रेखा आगे बढ़ती है उस एक तक जो केवल चिन्ह नहीं देता बल्कि स्वयं चिन्ह है, जिसका शरीर तोड़ा गया मन्दिर कहलाया। और वह हण्डा? मसीह में आग किसी और पर जलती है। पौलुस जिसे "क्रोध" कहते हैं, वह गोलगोथा पर एक निर्दोष पर उतरती है। परन्तु यह मत सोचिए कि इससे यहेजकेल 24 नरम हो जाता है। यह अध्याय ही बताता है कि क्रूस क्यों आवश्यक था: जंग आग के बिना नहीं छूटता।
दर्पण
हम सब के पास कोई "आँखों की चाही हुई" वस्तु है। वह घर जिसके लिए बीस साल किश्तें भरीं। वह बच्चा जिसके नंबरों में हमारी इज़्ज़त टँगी है। वह पद, वह सेवकाई, वह मंडली जिसका नाम लेते ही सीना चौड़ा होता है। यरूशलेम के लोग मन्दिर पर "फूलते" थे, और वह घमंड ही उनका सबसे धार्मिक दिखने वाला पाप था: परमेश्वर की वस्तु को परमेश्वर की जगह रख देना। पाठ पूछता है कि यदि वह चीज़ कल न रहे, तो आपके पास क्या बचेगा। और दूसरी बात: यह अध्याय उन लोगों के लिए है जो रो नहीं सकते, जिनका दुःख गले में अटका है। परमेश्वर उस सूखी आँख से परिचित हैं। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक नाम या वस्तु लिखिए जिसके खोने की कल्पना से आप सबसे अधिक डरते हैं, और उसे हाथ में पकड़कर ज़ोर से कहिए, "यह आपकी है, मेरी नहीं।"
मुख्य पात्र
यहाँ मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और उनका चित्र असहज करता है। वे थके हुए हैं। वे क्रोधित हैं। और वे अपने भविष्यद्वक्ता से एक ऐसी कीमत माँगते हैं जिसकी व्याख्या वे नहीं देते। यहेजकेल को यह नहीं बताया जाता कि उसकी पत्नी क्यों मरेगी, केवल यह कि वह मरेगी और उसे चुप रहना है। इसमें एक अजीब कोमलता भी है: परमेश्वर पहले से बता देते हैं, वे उसे अँधेरे में नहीं छोड़ते। और वे स्वयं भी किसी प्रिय को खो रहे हैं, अपना पवित्रस्थान। "जिसको तुम्हारा मन चाहता है" कहते समय क्या यह केवल लोगों की चाह है? वह भवन उनका भी निवास था। परमेश्वर अपने घर को छोड़ते हुए अपने सेवक से कहते हैं: तुम भी बिना रोए खो देना सीखो।
प्रश्न
क्या परमेश्वर किसी स्त्री की जान इसलिए ले सकते हैं कि एक उपदेश स्पष्ट हो जाए? पाठ यह प्रश्न उठाता है और उत्तर नहीं देता। वह स्त्री की कोई बात नहीं बताता, उसका नाम नहीं, उसकी सहमति नहीं, उसके जीवन का कोई ब्योरा नहीं। बाइबल यहाँ अपनी ही शांति में टिकी रहती है, और वह शांति चुभती है। कुछ कहते हैं कि वह वैसे भी मरने वाली थी और परमेश्वर ने केवल समय जानकर बताया। शायद। पाठ इसकी पुष्टि नहीं करता। मैं इसे सुलझा नहीं सकता, और सुलझाने की कोशिश मुझे झूठा बना देगी। इतना ही कह सकता हूँ: जो परमेश्वर यहाँ अपने सेवक से इतनी कीमत माँगते हैं, वे अंततः वही कीमत स्वयं चुकाते हैं, अपने पुत्र में।
संदर्भ
तारीख अनजाने में नहीं दी गई है: नवें वर्ष के दसवें महीने का दसवाँ दिन, लगभग 588 ईसा पूर्व, जनवरी की सर्दी। यहेजकेल बाबेल में निर्वासितों के बीच है, यरूशलेम से सैकड़ों मील दूर, और उसी दिन नबूकदनेस्सर की सेना नगर के चारों ओर मोर्चा लगाती है। वह यह देख नहीं सकता, उसे बताया जाता है, और उसे लिख लेने को कहा जाता है, ताकि बाद में समाचार आने पर प्रमाण रहे। निर्वासित लोग अब तक आशा में जी रहे थे: मन्दिर खड़ा है, तो सब ठीक हो जाएगा। प्राचीन पूर्व में शोक के अपने कड़े नियम थे, सिर खुला, नंगे पाँव, होंठ ढँके, पड़ोसियों की रोटी। यहेजकेल का पगड़ी और जूती पहनना सार्वजनिक अपमान जैसा दिखा होगा, और यही तो उद्देश्य था।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में कौन सी अच्छी चीज़ धीरे-धीरे वह "गढ़" बन गई है जिस पर आप फूलते हैं, और आप यह कैसे पहचानेंगे?
जब दुःख इतना बड़ा हो कि आँसू न आएँ, तब आप परमेश्वर से क्या कहेंगे?
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