यहेजकेल 33:7
मूल पाठ
परमेश्वर यहेजकेल को एक पद सौंपते हैं, और वह पद सैनिक का नहीं, याजक का नहीं, बल्कि पहरुए का है: "मैंने तुझे इस्राएल के घराने का पहरुआ ठहरा दिया है।" पहरुए का काम लड़ना नहीं, देखना और चेतावनी देना है। और यहेजकेल को अपनी ओर से कुछ नहीं कहना है; उसे वही बोलना है जो वह सुनता है, "तू मेरे मुँह से वचन सुन-सुनकर उन्हें मेरी ओर से चिता दे।" दो क्रियाएँ, एक ही साँस में: पहले सुनना, फिर चिताना। बीच में नबी का अपना मत, अपनी सुविधा, अपना डर, कुछ भी जगह नहीं पाता। यह आयत पिछली आयतों के दृष्टान्त (नरसिंगा, तलवार, पहरुआ) को यहेजकेल के अपने कंधों पर उतार देती है। दृष्टान्त अब नौकरी बन जाता है।
मर्म
यहाँ परमेश्वर के बारे में सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि तलवार आ रही है, बल्कि यह कि वे उसके आने की सूचना पहले देते हैं। न्याय चुपचाप नहीं आता; वह नरसिंगे की आवाज़ के साथ आता है। जो परमेश्वर सचमुच विनाश चाहते, उन्हें पहरुए की क्या ज़रूरत? पहरुए का होना ही इस बात का प्रमाण है कि इसी अध्याय में आगे जो कहा गया है वह सच है: "मैं दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्न नहीं होता।" चेतावनी दया का रूप है, भले ही वह कठोर स्वर में आए। और ध्यान दें कि वचन नबी की सम्पत्ति नहीं है, वह "मेरे मुँह से" निकलता है। मनुष्य केवल माध्यम है। इसीलिए पहरुए की ज़िम्मेदारी भारी है: उसके मौन का मोल किसी और के खून से चुकाया जाता है।
सूत्र
पहरुआ चेतावनी तो दे सकता है, पर तलवार को रोक नहीं सकता। वह शहर के बाहर खड़ा है, भीतर के लोगों की मृत्यु को आते देखता है, और चिल्लाता है। यहेजकेल इतना ही कर पाता है। सदियों बाद एक और पहरुआ यरूशलेम की ओर देखता है, और वह सिर्फ़ चिल्लाता नहीं, रोता है, क्योंकि वह जानता है कि दीवारें गिरेंगी। परन्तु यीशु मसीह वहीं नहीं रुकते। जिस तलवार की वे चेतावनी देते हैं, वे उसके नीचे स्वयं खड़े हो जाते हैं। इस अध्याय का सबसे भारी वाक्य है, "उसका खून उसी के सिर पड़ेगा," और सुसमाचार में वही भाषा भीड़ के मुँह से निकलती है जब वह पिलातुस के सामने मसीह का लहू अपने और अपनी सन्तान के ऊपर माँग लेती है (मत्ती 27:25)। जो शब्द दोषारोपण का था, वही शुद्धिकरण का बन गया। पहरुए की व्यवस्था में खून किसी के सिर पड़ता है; क्रूस पर वह परमेश्वर के पुत्र के सिर पड़ता है, और इसलिए हमारे सिर से उतर जाता है।
दर्पण
यह आयत उस डर को उघाड़ देती है जिसे हम शालीनता कहकर ढक लेते हैं। आप जानते हैं कि आपका भाई अपने व्यवसाय में जो कर रहा है वह सीधा नहीं है, पर पारिवारिक समारोह में शान्ति बनी रहे, इसलिए आप चुप रहते हैं। आपके समूह का कोई सदस्य धीरे-धीरे विश्वास से खिसक रहा है, और आप सोचते हैं कि कहना "न्याय करना" होगा। आपका बेटा सुन नहीं रहा, इसलिए आपने बोलना बंद कर दिया। यहेजकेल को यह छूट नहीं मिली। उस पर यह ज़िम्मेदारी नहीं थी कि लोग मानें; ज़िम्मेदारी यह थी कि वे जानें। हमारी चुप्पी प्रायः प्रेम नहीं, आत्मरक्षा होती है। आज ही एक कागज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आपने डर के कारण सच नहीं कहा, और नीचे वह एक वाक्य लिख लीजिए जो आपको उससे कहना है।
संदर्भ
यह अध्याय यहेजकेल की पुस्तक का मोड़ है। वर्ष 587 ईसा पूर्व के आसपास, नबी बाबेल में बँधुआई में है, कबार नदी के किनारे उन लोगों के बीच जिनका मन अब भी यरूशलेम में अटका है। कुछ ही पंक्तियों बाद एक भागा हुआ व्यक्ति आकर कहता है, "नगर ले लिया गया," और उसी घड़ी यहेजकेल का मुँह खुल जाता है। उससे पहले तक उसका संदेश मुख्यतः न्याय का था; उसके बाद पुनर्स्थापना का होगा। पहरुए की तस्वीर यहूदा के हर नगरवासी को परिचित थी: ऊँची दीवार पर खड़ा आदमी, क्षितिज पर धूल उठती देखकर नरसिंगा फूँकता हुआ। जो सुनते थे वे बच जाते; जो कंधे उचका देते वे मारे जाते। और इसी अध्याय के अंत में परमेश्वर कहते हैं कि लोग यहेजकेल को मधुर गीत गानेवाले की तरह सुनते हैं। उपदेश मनोरंजन बन चुका था।
एक बारीक बात
इब्रानी शब्द है त्सोफ़े, "निगाह रखनेवाला"। पहरुए का अंग आँख है। पर इस आयत में परमेश्वर यहेजकेल से आँख की नहीं, कान की माँग करते हैं: "तू मेरे मुँह से वचन सुन-सुनकर।" हिन्दी का यह दोहरा रूप, सुन-सुनकर, लगातार चलने वाली क्रिया को पकड़ता है; एक बार सुनकर जीवन भर दोहराना नहीं, बल्कि बार-बार लौटकर सुनना। यहाँ खतरा क्षितिज पर नहीं दिखता, वह परमेश्वर के मुँह से सुनाई देता है। इसका अर्थ यह भी है कि नबी के पास अपनी कोई खबर नहीं है। जिस दिन वह सुनना बंद करेगा, उस दिन भी वह बोल सकेगा, पर वह नरसिंगा नहीं, केवल शोर होगा। हर उपदेशक, हर माता-पिता, हर समूह-अगुवे के लिए यह एक बेचैन कर देने वाली जाँच है।
मुख्य पात्र
इस आयत का असली पात्र वे हैं जो बोलते हैं। ध्यान दीजिए कि परमेश्वर अपने न्याय को गुप्त नहीं रखते। वे तलवार भेजने से पहले पहरुआ ठहराते हैं, और पहरुए के कानों में अपना वचन डालते हैं। यह उस परमेश्वर का चित्र है जो अपने ही निर्णय के विरुद्ध मनुष्य को चेताते हैं, जो आगे चलकर अपने जीवन की सौगन्ध खाकर कहते हैं कि दुष्ट के मरने में उन्हें कोई प्रसन्नता नहीं। यहाँ उदासीनता नहीं, तड़प है। और वे इस तड़प को अकेले नहीं ढोते; वे मनुष्यों को उसमें साझीदार बनाते हैं, इतना कि किसी के लहू का लेखा पहरुए से लिया जाए। पौलुस इसी भाषा में इफिसुस के अगुवों से कहते हैं कि वे सबके लहू से निर्दोष हैं (प्रेरितों 20:26)। परमेश्वर का वचन बोलना सम्मान नहीं, भार है, और वह भार उन्होंने अंततः अपने पुत्र के कंधों पर रखा।
चिंतन के प्रश्न
किस व्यक्ति के बारे में आपकी चुप्पी को आपने "समझदारी" कहकर उचित ठहराया है, और वह सचमुच किस डर से निकली है?
आप कब, कहाँ और किस तरह "परमेश्वर के मुँह से" सुनते हैं, इससे पहले कि आप दूसरों से उनके विषय में कुछ कहें?
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Ezekiel 33:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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