मत्ती 27
पाठ
भोर होते ही धार्मिक नेता निर्णय ले चुके हैं, और यीशु बँधे हुए राज्यपाल के हाथ सौंप दिए जाते हैं। यहूदा पछताकर चाँदी के सिक्के मन्दिर में फेंक देता है और अपना जीवन समाप्त कर लेता है; पिलातुस भीड़ के दबाव में हाथ धो लेता है; सैनिक काँटों का मुकुट पहनाकर उपहास करते हैं। गुलगुता पर क्रूस, अंधेरा, वह पुकार, और फिर मन्दिर का फटा हुआ परदा। अंत में एक धनी चेला शव माँगता है, दो स्त्रियाँ कब्र के सामने बैठी रह जाती हैं, और पत्थर पर मुहर लगा दी जाती है।
मर्म
इस पूरे अध्याय में सबसे अधिक खटकने वाली बात यीशु का मौन है। "उसने उसको एक बात का भी उत्तर नहीं दिया, यहाँ तक कि राज्यपाल को बड़ा आश्चर्य हुआ।" जो अभी तक फरीसियों के हर प्रश्न का उत्तर देते रहे, वे अब चुप हैं। यह हार का मौन नहीं, समर्पण का मौन है। परमेश्वर यहाँ अपने बचाव में तर्क नहीं देते; वे स्वयं को सौंप देते हैं। और ठीक इसी मौन में उद्धार घटता है। हमारा स्वभाव कहता है कि शक्ति बोलती है, सफाई देती है, स्वयं को बचाती है। यह अध्याय कहता है कि परमेश्वर की शक्ति स्वयं को न बचाने में प्रकट हुई, और वही हमें बचाती है।
समग्र कथा का सूत्र
भजन संहिता 22 उस धर्मी की पुकार है जिसे परमेश्वर ने छोड़ दिया, जिसके वस्त्र बाँटे जाते हैं, जिसे देखने वाले सिर हिलाते हैं। मत्ती उस भजन को उद्धृत नहीं करते, वे उसे घटित होते दिखाते हैं: चिट्ठियाँ, सिर हिलाना, वह चीख। यशायाह 53 में वह सेवक है जो मुँह नहीं खोलता और जिसकी कब्र धनवान के साथ ठहरती है; यहाँ अरिमतियाह का धनी यूसुफ आता है। यह संयोग नहीं, सदियों से बुना गया धागा है। परमेश्वर की बचाने की योजना कभी भी हिंसा को हराने वाली प्रतिहिंसा नहीं थी, बल्कि एक ऐसा मेम्ना था जो स्वयं को दे देता है। क्रूस कोई दुर्घटना नहीं जिसे बाद में सुधारा गया; वह कहानी का केंद्र है।
दर्पण
पिलातुस का पानी हमें असहज करता है, क्योंकि हम उसे पहचानते हैं। दफ्तर की उस बैठक में जहाँ आप जानते थे कि निर्णय गलत है, पर चुप रहे। परिवार के उस झगड़े में जहाँ आपने कहा, "मुझे इससे क्या लेना-देना।" हम हाथ धोने में निपुण हैं; हम स्वयं को दोषी नहीं, केवल उपस्थित मानते हैं। और दूसरी ओर वे स्त्रियाँ हैं जो "दूर से देख रही थीं", जो कुछ बदल नहीं सकतीं पर जाती भी नहीं। कभी-कभी विश्वास का यही रूप बचता है: रुक जाना, देखते रहना, कब्र के सामने बैठना।
आज यही कीजिए: पाँच मिनट के लिए कहीं चुपचाप बैठ जाइए, कुछ न माँगिए, कुछ न समझाइए, केवल चुप रहिए जैसे वे पिलातुस के सामने चुप रहे; और फिर ऊँचे स्वर में कहिए, "सचमुच यह परमेश्वर का पुत्र था।"
मुख्य पात्र
यीशु इस अध्याय में लगभग निष्क्रिय हैं: बाँधे जाते हैं, सौंपे जाते हैं, कपड़े उतारे जाते हैं, चढ़ाए जाते हैं। क्रियाएँ दूसरों की हैं, पीड़ा उनकी। फिर भी दो जगह वे स्वयं कुछ करते हैं, और दोनों चौंकाती हैं। पहला, वे पित्त मिला दाखरस चखकर पीना नहीं चाहते; वे दर्द को कुंद नहीं करते, पूरा प्याला पीते हैं। दूसरा, वे चिल्लाते हैं। वह चीख शिकायत नहीं, प्रार्थना है, और वह अब भी परमेश्वर को "मेरे परमेश्वर" कहती है। यहाँ परमेश्वर का पुत्र मनुष्य के सबसे गहरे अँधेरे में उतरकर भी पिता को पुकारना नहीं छोड़ते। यही उनका राजत्व है, काँटों के मुकुट वाला राजत्व, जिसे उपहास करने वाले सैनिक अनजाने में सच बोल जाते हैं।
शास्त्र की गूँज
मन्दिर का परदा "ऊपर से नीचे तक" फटता है, नीचे से ऊपर नहीं। किसी मनुष्य ने उसे नहीं चीरा। जो परदा महापवित्र स्थान को वर्षों से ढके था, वह उसी क्षण खुलता है जब यीशु प्राण छोड़ते हैं। निर्गमन में वह परदा दूरी बनाए रखने के लिए था, पवित्रता और पाप के बीच की सीमा। अब वह दूरी भीतर से तोड़ी गई है। और ध्यान दीजिए किसने सबसे पहले सही बात कही: कोई याजक नहीं, कोई चेला नहीं, बल्कि एक रोमी सूबेदार। जिसने कीलें ठोकने वालों की अगुवाई की, वही कहता है, "सचमुच यह परमेश्वर का पुत्र था।" परदा फटने के बाद पहला उपासक एक परदेशी है।
कठिन प्रश्न
"हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" इस प्रश्न को जल्दी से सुलझा देना बेईमानी होगी। कहना आसान है कि यीशु पूरे भजन की ओर संकेत कर रहे थे, या कि यह केवल अनुभूति थी, वास्तविकता नहीं। पर मत्ती हमें कोई राहत नहीं देते: अंधेरा वास्तविक है, चीख वास्तविक है, और उत्तर में स्वर्ग से कोई आवाज़ नहीं आती। वहाँ खड़े लोग भी गलत समझते हैं, कहते हैं वह एलिय्याह को पुकारता है। शायद यही इस पाठ का सबसे कीमती उपहार है: जब आप स्वयं यही प्रश्न पूछेंगे, तो वह आपसे पहले पूछा जा चुका होगा, और परमेश्वर के पुत्र के मुँह से। उत्तर तीसरे दिन आता है, पर इस अध्याय में नहीं। यहाँ केवल मुहर लगी कब्र है और दो स्त्रियाँ, बैठी हुई।
चिंतन के प्रश्न
किस स्थिति में आपने हाल ही में पिलातुस की तरह हाथ धोए, यह कहकर कि "तुम ही जानो"?
यदि परमेश्वर ने आपकी किसी प्रार्थना का अब तक उत्तर नहीं दिया, तो क्या आप उन्हें फिर भी "मेरे परमेश्वर" कहकर पुकार सकते हैं?
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Matthew 27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मत्ती 27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 27 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब आपका पुत्र बंधा हुआ, चुपचाप शासक के हाथों सौंप दिया गया, तब भी आपका प्रेम पीछे नहीं हटा। मेरे जीवन में भी ऐसे पल आते हैं जब सब कुछ हाथ से निकलता लगता है। मुझे भरोसा दीजिए कि उन बंधनों के बीच भी आप काम कर रहे हैं।
पिता, जब मुझे लगता है कि तू दूर हो गया है और मेरी पुकार खाली लौट आती है, तब याद दिला कि तेरा बेटा भी उस अंधकार से गुज़रा। उसने मेरे लिए वह सन्नाटा सहा, ताकि मैं कभी सचमुच अकेला न रहूँ। मेरे सवालों के बीच भी मुझे थामे रख।
पिलातुस ने पानी से हाथ धोए, पर फैसला तो उसी के मुँह से निकला था। "मैं इस धर्मी के लहू से निर्दोष हूँ; तुम ही जानो।" हाथ साफ दिख सकते हैं, मन नहीं। जहाँ हमारे पास बोलने का अधिकार था और हम चुप रहे, वहाँ चुप्पी भी एक चुनाव है। भीड़ का शोर सच से बड़ा लगने लगे, तब सँभलना। पानी दाग मिटाता है, दोष नहीं।
पीलातुस ने पूछा, "इन दोनों में से किसको चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूँ?" और भीड़ ने चिल्लाकर कहा, "बरअब्बा को।" उस दिन एक हत्यारा घर लौट गया, और निर्दोष क्रूस तक गया। सोचो, बरअब्बा ने कुछ नहीं किया था छूटने के लिए। तुम भी नहीं। यीशु तुम्हारी जगह खड़े हो गए, और तुम्हारी बेड़ियाँ खुल गईं।
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