यशायाह 2
पाठ
एक ही अध्याय में दो दृश्य आमने-सामने खड़े हैं। पहले में हर जाति के लोग धारा की तरह ऊपर की ओर बहते हैं, यहोवा के पर्वत पर, और तलवारें पिघलकर हल के फाल बन जाती हैं। दूसरे में वही मनुष्य नीचे की ओर भागते हैं, "चट्टानों की गुफाओं और भूमि के बिलों में", और अपनी सोने-चाँदी की मूरतें छछून्दरों और चमगादड़ों के आगे फेंक देते हैं। बीच में यहूदा है: धन से भरा, घोड़ों से भरा, मूरतों से भरा, और परमेश्वर से खाली। यशायाह का दर्शन इन दो दिशाओं के बीच खड़ा है, ऊपर या नीचे।
मर्म
इस अध्याय की धुरी एक ही वाक्य है, जो दो बार लौटता है: "उस दिन केवल यहोवा ही ऊँचे पर विराजमान रहेगा।" यह सज़ा की घोषणा से पहले एक तथ्य का कथन है। परमेश्वर ऊँचा किया नहीं जाता, वे ऊँचे हैं; प्रश्न केवल यह है कि उनकी ऊँचाई हमें खींचेगी या हमें झुकाएगी। देवदार, बांज, गुम्मट, शहरपनाह, तर्शीश के जहाज़: यशायाह ऊँची चीज़ों की सूची बनाता है, और हर एक झुकाई जाएगी। यह परमेश्वर की ईर्ष्या नहीं, यथार्थ है। जो ऊँचाई अपने बल पर खड़ी है, वह अंततः खोखली है। और चौंकाने वाली बात यह है कि यही झुकाव उस पर्वत की ओर बहती धारा का दूसरा पहलू है। ऊपर चढ़ने का रास्ता नीचे झुकने से होकर जाता है।
सूत्र
पद 3 में जो कहा गया है, वह अजीब है: राष्ट्र आपस में एक-दूसरे को बुलाते हैं, कोई मिशनरी उन्हें नहीं खींच रहा। "आओ, हम यहोवा के पर्वत पर चढ़कर, याकूब के परमेश्वर के भवन में जाएँ।" और वे हथियार नहीं, शिक्षा माँगते हैं। यह वही आकर्षण है जो बाद में यीशु मसीह के इर्द-गिर्द दिखाई देता है, जब गैर-यहूदी उनके पास आते हैं, और जब पिन्तेकुस्त के दिन यरूशलेम से वचन सचमुच बाहर निकलता है। पर ध्यान दीजिए, यशायाह जिस पर्वत की बात करता है वह अंत में एक व्यक्ति में सिमट जाता है: व्यवस्था सिय्योन से निकली, पर वह मसीह के रूप में चलकर आई। शान्ति यहाँ समझौते से नहीं, न्याय से आती है; पहले वे न्याय करेंगे, फिर तलवारें टूटेंगी।
दर्पण
पद 7 और 8 पढ़िए और अपने घर की सूची बनाइए। चाँदी-सोना, घोड़े, रथ, मूरतें: सुरक्षा, गतिशीलता, नियंत्रण। यशायाह इन्हें पाप नहीं कहता, वह केवल कहता है कि देश इनसे "भरपूर" है। भरा हुआ होना ही समस्या है, क्योंकि भरे हुए बर्तन में कुछ और नहीं समाता। आपकी बचत योजना, आपके बच्चों का पाठ्यक्रम, आपका कैलेंडर जो आपको बताता है कि आप ज़रूरी हैं: ये सब आपके हाथों की बनाई हुई वस्तुएँ हैं, "जिन्हें उन्होंने अपनी उँगलियों से संवारा है।" उँगलियों वाला शब्द चुभता है। हम अपनी मूरतें सावधानी से सजाते हैं। और पद 20 का दृश्य निर्दयी है: एक दिन आप स्वयं उन्हें फेंक देंगे, चमगादड़ों के आगे, बिना अफ़सोस के, क्योंकि उस घड़ी वे बेकार लगेंगी।
प्रश्न
पद 9 में एक प्रार्थना है जिसे पढ़कर दिल रुक जाता है: "इस कारण उनको क्षमा न कर!" क्या भविष्यद्वक्ता सचमुच यह माँग रहा है? हम आदी हैं ऐसे परमेश्वर के जो क्षमा करते हैं; यहाँ कोई कहता है, मत कीजिए। इसे मुलायम करना आसान होगा, पर पाठ इसकी अनुमति नहीं देता। शायद यह क्रोध नहीं, बल्कि एक भयानक स्पष्टता है: जो व्यक्ति अपने हाथ की बनाई मूरत के आगे झुका है, उसके लिए क्षमा का अर्थ क्या होगा? क्षमा उसे उसी झूठ में लौटा देगी। कभी-कभी दया का पहला रूप छूट नहीं, टकराव होता है। पर यशायाह यह समझाता नहीं। वह वाक्य वहीं छोड़ देता है, खुला और असहज, और हमें उसके साथ बैठना पड़ता है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में परमेश्वर बोलते कम हैं, उठते ज़्यादा हैं। "जब यहोवा पृथ्वी को कम्पित करने के लिये उठेगा" दो बार दोहराया जाता है, मानो कोई इतनी देर से बैठा था कि उसका खड़ा होना ही भूकंप बन जाए। यह वही परमेश्वर हैं जो पद 3 में शिक्षक हैं, धैर्य से मार्ग सिखाते हुए। दोनों चित्रों को अलग करना हमारी आदत है, पर यशायाह उन्हें एक ही साँस में रखता है। जो सिखाता है वही हिलाता है। और अंतिम पद में वे हमें अपने बारे में नहीं, मनुष्य के बारे में चेतावनी देते हैं: "जिसकी श्वास उसके नथनों में है, क्योंकि उसका मूल्य है ही क्या?" यह मनुष्य से घृणा नहीं; यह हमें उस भरोसे से मुक्त करना है जो कोई मनुष्य उठा नहीं सकता, न आप, न मैं।
संदर्भ
यशायाह आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के यरूशलेम में खड़ा है, उज्जियाह के लंबे समृद्ध शासन के बाद। व्यापार फल-फूल रहा था, तर्शीश के जहाज़ दूर के बाज़ारों से माल लाते थे, सेना के पास घोड़े और रथ थे। धार्मिक रूप से भी सब कुछ "उपलब्ध" था: पलिश्तियों जैसा टोना, परदेशियों से गठजोड़, हर संकट के लिए एक उपाय। ऐसे समय में भविष्यद्वक्ता का काम सबसे कठिन होता है, क्योंकि कोई संकट नहीं दिखता। ऊपर से अश्शूर की छाया बढ़ रही थी। पर्वत की छवि भी संदर्भ माँगती है: सिय्योन कोई ऊँची चोटी नहीं थी, आसपास की पहाड़ियाँ उससे ऊँची थीं। यशायाह जो देखता है, वह भूगोल नहीं, उलटफेर है।
आपके जीवन में वह चीज़ कौन-सी है जिससे आप इतने "भरपूर" हैं कि परमेश्वर के लिए जगह नहीं बची?
पद 5 का निमंत्रण, "आ, हम यहोवा के प्रकाश में चलें", इस सप्ताह आपके लिए ठोस रूप से किस एक कदम की माँग करता है?
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