बाइबल व्याख्या

यशायाह 56:7

बाइबल
यह वचन POWER OF GOD FAITH MINISTRIES द्वारा समर्पित है

पाठ

परमेश्वर कहते हैं कि जो परदेशी उनसे जुड़ गए हैं, उन्हें वे अपने पवित्र पर्वत पर लाएँगे और अपने प्रार्थना के भवन में आनन्दित करेंगे। उनकी बलियाँ, जो मन्दिर की व्यवस्था के अनुसार कभी वेदी पर चढ़ ही नहीं सकती थीं, ग्रहण की जाएँगी। और इसका कारण एक ही वाक्य में दिया गया है: "मेरा भवन सब देशों के लोगों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा।" यह कोई रियायत नहीं, यह घर का मूल उद्देश्य है।

मूल बात

यह पद परमेश्वर के घर की परिभाषा बदल देता है, या बेहतर कहें, उसे उसके असली रूप में खोल देता है। मन्दिर कभी भी एक जाति की सम्पत्ति नहीं था; वह उस परमेश्वर का निवास था जिसने आदम से लेकर सब मनुष्यों को बनाया। जो बात चौंकाती है वह यह है कि परदेशियों के लिए यहाँ कोई दूसरी श्रेणी नहीं बनाई गई, कोई बाहरी आँगन नहीं सुझाया गया। वे वेदी तक आते हैं, उनकी होमबलि "ग्रहण" की जाती है, और परमेश्वर स्वयं उन्हें "आनन्दित" करते हैं। उद्धार यहाँ सहनशीलता नहीं है, यह गोद लेना है। और ध्यान दें, पहल परमेश्वर की है: "ले आकर" वही करते हैं। कोई अपने बल पर पवित्र पर्वत नहीं चढ़ता।

सूत्र

यीशु ने जब मन्दिर के आँगन में मेजें उलट दीं, तब उन्होंने यही पद उद्धृत किया (मरकुस 11:17)। यह संयोग नहीं था। जिस आँगन में व्यापार चल रहा था, वही अन्यजातियों का आँगन था, अर्थात् ठीक वही जगह जहाँ यशायाह के परदेशी को प्रार्थना करनी थी। उसे बाज़ार बना देना केवल अनादर नहीं, बल्कि इस भविष्यवाणी को रद्द कर देना था। मसीह ने उस स्थान को खाली कराया जो उनका था। और फिर उन्होंने आगे बढ़कर स्वयं को ही वह मन्दिर कहा जो गिराया और तीन दिन में उठाया जाएगा। इसका अर्थ यह है: यशायाह 56:7 की पूर्ति किसी इमारत में नहीं, बल्कि क्रूस पर चढ़े और जी उठे मसीह में होती है, जिनमें बलिदान अन्ततः "ग्रहण" किया गया, और जिनके द्वारा हर देश का व्यक्ति भीतर आता है।

आईना

यहाँ दो तरह के लोग खड़े हैं, और सम्भव है आप दोनों में से किसी एक को पहचानें। पहला वह है जो चुपचाप मानता है कि वह पूरी तरह भीतर नहीं है: तलाक के बाद कलीसिया में बैठा व्यक्ति, वह जिसका परिवार विश्वास में नहीं है, वह जिसे बाँझपन या बीमारी ने "सूखा वृक्ष" जैसा महसूस कराया है, वह जो सोचता है कि उसका अतीत उसकी वेदी को अशुद्ध कर देता है। इस पद में परमेश्वर उसके लिए स्वयं दरवाज़ा खोलते हैं। दूसरा वह है जो भीतर बैठा है और आँगन को बाज़ार बना चुका है, अपनी सुविधा, अपनी मंडली, अपनी भाषा, अपने सामाजिक दायरे से। वह भूल गया है कि यह घर किसका है।

आज करें यह: अपनी कलीसिया या मोहल्ले में उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जो वहाँ किसी कारण से "बाहरी" महसूस करता है, और उसी काग़ज़ को हाथ में लेकर नाम लेकर परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वे उसे अपने घर में आनन्दित करें।

प्रसंग

यशायाह के इस भाग के पीछे बेबीलोन से लौटे लोगों की दुनिया खड़ी है: टूटी शहरपनाह, अधूरा मन्दिर, और एक समुदाय जो अपनी पहचान बचाने के लिए सीमाएँ खींच रहा था। ऐसे माहौल में शुद्धता का प्रश्न जीवित रहने का प्रश्न बन जाता है, और सीमाएँ खींचना समझदारी लगती है। व्यवस्था में साफ़ लिखा था कि खोजा और कुछ परदेशी मण्डली में नहीं आ सकते। इसलिए पद 3 में जो दो आवाज़ें डर से बोलती हैं, वे कोरी कल्पना नहीं थीं; उनके पीछे शास्त्र का अधिकार था। और फिर परमेश्वर स्वयं बोलते हैं, और उनका वचन उस डर को हटा देता है। यह किसी उदार सोच का परिणाम नहीं, यह प्रभु की वाणी है।

एक बारीकी

"आनन्दित करूँगा" शब्द पर रुकिए। परमेश्वर यह नहीं कहते कि मैं उन्हें प्रवेश दूँगा, सहन कर लूँगा, या उनकी बलि मान लूँगा और बस। वे कहते हैं कि मैं उन्हें आनन्दित करूँगा। इब्रानी क्रिया में प्रसन्नता, उत्सव, गीत जैसा भाव है, वह आनन्द जो पर्व के दिन मन्दिर के आँगन में गूँजता था। सोचिए उस खोजे के बारे में जिसने जीवन भर अपने आप को "सूखा वृक्ष" समझा। उसे भीतर आने की अनुमति ही नहीं मिलती, उसे उत्सव का हिस्सा बना दिया जाता है। यह उड़ाऊ पुत्र के लिए बजाए गए बाजे की पूर्वछाया है। परमेश्वर का घर एक चौकी नहीं, एक भोज है।

मुख्य पात्र

इस पद का मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और वे यहाँ आश्चर्यजनक रूप से सक्रिय हैं: वे लाते हैं, वे आनन्दित करते हैं, वे ग्रहण करते हैं, वे नाम देते हैं, वे इकट्ठे करते हैं। कहीं भी मनुष्य अपनी योग्यता सिद्ध करके भीतर नहीं घुसता; परमेश्वर उसे हाथ पकड़कर पर्वत पर चढ़ाते हैं। और जो चीज़ उनके चरित्र के बारे में सबसे अधिक कहती है वह यह है कि वे अपने घर को अपने पास रखने के बजाय खोल देते हैं। पद 8 में वे "औरों को भी इकट्ठे" करने की बात करते हैं, और यीशु ने यही स्वर लिया जब उन्होंने अपनी और भेड़ों की बात की (यूहन्ना 10:16)। यह परमेश्वर संकोची नहीं हैं। उनका आनन्द भीड़ बढ़ाने में है, घटाने में नहीं।

चिन्तन

आपके भीतर कौन-सी "मेज़" लगी है जो किसी और को परमेश्वर के आँगन में प्रार्थना करने से रोकती है?

यदि परमेश्वर आपकी बलि को केवल सहन नहीं, बल्कि "ग्रहण" करते हैं और आपको आनन्दित करना चाहते हैं, तो आपका प्रार्थना-जीवन इससे कैसे बदलेगा?

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Isaiah 56:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यशायाह 56:7 का क्या अर्थ है?
परमेश्वर कहते हैं कि जो परदेशी उनसे जुड़ गए हैं, उन्हें वे अपने पवित्र पर्वत पर लाएँगे और अपने प्रार्थना के भवन में आनन्दित करेंगे। उनकी बलियाँ, जो मन्दिर की व्यवस्था के अनुसार कभी वेदी पर चढ़ ही नहीं सकती थीं, ग्रहण की जाएँगी। और इसका कारण एक ही वाक्य में दिया गया है: "मेरा भवन सब देशों के लोगों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा।" यह कोई रियायत नहीं, यह घर का मूल उद्देश्य है।
यशायाह 56:7 किस विषय में है?
यीशु ने जब मन्दिर के आँगन में मेजें उलट दीं, तब उन्होंने यही पद उद्धृत किया (मरकुस 11:17)। यह संयोग नहीं था। जिस आँगन में व्यापार चल रहा था, वही अन्यजातियों का आँगन था, अर्थात् ठीक वही जगह जहाँ यशायाह के परदेशी को प्रार्थना करनी थी। उसे बाज़ार बना देना केवल अनादर नहीं, बल्कि इस भविष्यवाणी को रद्द कर देना था। मसीह ने उस स्थान को खाली कराया जो उनका था। और फिर उन्होंने आगे बढ़कर स्वयं को ही वह मन्दिर कहा जो गिराया और तीन दिन में उठाया जाएगा। इसका अर्थ यह है: यशायाह 56:7 की पूर्ति किसी इमारत में नहीं, बल्कि क्रूस पर चढ़े और जी उठे मसीह में होती है, जिनमें बलिदान अन्ततः "ग्रहण" किया गया, और जिनके द्वारा हर देश का व्यक्ति भीतर आता है।
यशायाह 56:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज करें यह: अपनी कलीसिया या मोहल्ले में उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जो वहाँ किसी कारण से "बाहरी" महसूस करता है, और उसी काग़ज़ को हाथ में लेकर नाम लेकर परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वे उसे अपने घर में आनन्दित करें।
यशायाह 56:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"आनन्दित करूँगा" शब्द पर रुकिए। परमेश्वर यह नहीं कहते कि मैं उन्हें प्रवेश दूँगा, सहन कर लूँगा, या उनकी बलि मान लूँगा और बस। वे कहते हैं कि मैं उन्हें आनन्दित करूँगा। इब्रानी क्रिया में प्रसन्नता, उत्सव, गीत जैसा भाव है, वह आनन्द जो पर्व के दिन मन्दिर के आँगन में गूँजता था। सोचिए उस खोजे के बारे में जिसने जीवन भर अपने आप को "सूखा वृक्ष" समझा। उसे भीतर आने की अनुमति ही नहीं मिलती, उसे उत्सव का हिस्सा बना दिया जाता है। यह उड़ाऊ पुत्र के लिए बजाए गए बाजे की पूर्वछाया है। परमेश्वर का घर एक चौकी नहीं, एक भोज है।
यशायाह 56:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके भीतर कौन-सी "मेज़" लगी है जो किसी और को परमेश्वर के आँगन में प्रार्थना करने से रोकती है?
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Isaiah 56 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 3

हे पिता, कई बार मुझे लगता है कि मेरी जगह कहीं नहीं, कि मैं सूखे पेड़ जैसा हूँ जिससे कुछ निकलेगा ही नहीं। पर तूने मुझे अपने पास बुलाया है और अलग नहीं किया। इस सच्चाई को मेरे मन में गहरा उतार दे, ताकि मैं डर नहीं, अपनापन महसूस करूँ।

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