यूहन्ना 10
पाठ
यीशु भेड़शाला का चित्र खींचते हैं: चोर दीवार फाँदकर घुसता है, पर चरवाहा द्वार से आता है और अपनी भेड़ों को नाम ले लेकर बुलाता है, और वे उसका शब्द पहचानकर पीछे हो लेती हैं। फिर वे स्वयं को दोनों कहते हैं, द्वार भी और अच्छा चरवाहा भी, जो मजदूर की तरह भागता नहीं बल्कि भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है। सुननेवालों में फूट पड़ जाती है; और जाड़े में, स्थापन पर्व पर, वही लोग मन्दिर के ओसारे में उन्हें घेरकर सीधा उत्तर माँगते हैं, और उत्तर सुनकर पत्थर उठा लेते हैं।
मर्म
ध्यान दीजिए कि यीशु उद्धार को किसी प्रणाली या नियम की तरह नहीं, बल्कि एक आवाज़ की पहचान की तरह प्रस्तुत करते हैं। भेड़ें इसलिए सुरक्षित नहीं कि वे चतुर हैं, बल्कि इसलिए कि चरवाहा उन्हें जानता है। और यह "जानना" ठंडी जानकारी नहीं: "जिस तरह पिता मुझे जानता है, और मैं पिता को जानता हूँ।" पिता और पुत्र के बीच जो गहराई है, उसी नाप का रिश्ता वे अपनी भेड़ों के साथ जोड़ते हैं। इसीलिए वचन 10 का वादा भावुक नहीं, ठोस है: "मैं इसलिए आया कि वे जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ।" जीवन चोरी होता है, यह सच है। पर यहाँ चरवाहा भेड़िए से लड़ता नहीं भागता, वह उसके सामने खड़ा होकर मरता है। बचाव की कीमत उसके अपने प्राण हैं।
मुख्य सूत्र
जो लोग यीशु के सामने खड़े थे, उनके कानों में यहेजकेल 34 गूँज रहा होगा, जहाँ परमेश्वर इस्राएल के चरवाहों पर फूटते हैं क्योंकि वे झुण्ड को नहीं, अपने आपको चराते थे, और फिर घोषणा करते हैं कि वे स्वयं आकर अपनी भेड़ों को चराएँगे। यीशु उस भविष्यवाणी को अपने ऊपर ले लेते हैं, और साथ ही उसका दूसरा आधा भी: "मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं… तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा।" यानी बाड़ की दीवारें, इस्राएल और अन्यजातियों की, गिरने वाली हैं। यह वही धागा है जो अब्राहम की प्रतिज्ञा से चलकर कलीसिया तक पहुँचता है: एक चरवाहा, एक झुण्ड, अनेक भाषाएँ।
दर्पण
हम में से अधिकांश को मजदूर की तस्वीर चुभती है, क्योंकि हम जानते हैं कि हम कब भागे। वह सहकर्मी जिसके लिए बोलना चाहिए था, पर नौकरी दाँव पर थी। वह बच्चा जिसकी परेशानी हमने देखी, पर उससे बात करना असुविधाजनक था। भेड़िया दिखता है, और हिसाब लगता है कि इसकी कीमत मैं नहीं चुका सकता। यीशु हमें इस पर लज्जित करने नहीं आए; वे बताते हैं कि झुण्ड की सुरक्षा हमारे साहस पर टिकी ही नहीं है। "कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा।" पर वचन 26 खुरदरा है: "तुम इसलिए विश्वास नहीं करते, कि मेरी भेड़ों में से नहीं हो।" यीशु संदेह करनेवालों को सहलाते नहीं। वे सुनने की बात करते हैं, और सुनना एक चुनाव भी है।
अन्तर्पाठ
भजन 23 का पहला वाक्य हर सुननेवाला जानता था: यहोवा मेरा चरवाहा है। जब यीशु कहते हैं "अच्छा चरवाहा मैं हूँ", तो वे कोई कोमल उपमा नहीं गढ़ रहे, वे उस भजन के "यहोवा" वाली जगह पर खड़े हो रहे हैं। इसीलिए पत्थर उठते हैं। और जब उन पर निन्दा का आरोप लगता है, तो वे भजन 82 का हवाला देते हैं: "मैंने कहा, तुम ईश्वर हो।" तर्क सूक्ष्म है। यदि शास्त्र उन मनुष्य-न्यायियों को "ईश्वर" कह सकता है जिनके पास परमेश्वर का वचन पहुँचा, तो जिसे पिता ने स्वयं पवित्र ठहराकर भेजा, उसके लिए "परमेश्वर का पुत्र" कहना निन्दा कैसे हुई? वे विरोधियों को उन्हीं की पुस्तक से घेरते हैं।
मुख्य पात्र
चित्र देखिए: जाड़ा है, यरूशलेम में ठंडी हवा, और यीशु सुलैमान के ओसारे में अकेले टहल रहे हैं। भीड़ आकर उन्हें घेर लेती है, और सवाल में झुँझलाहट है: "तू हमारे मन को कब तक दुविधा में रखेगा?" वे सफाई नहीं देते। जो सबसे उल्लेखनीय है, वह उनकी स्वतंत्रता है: "कोई उसे मुझसे छीनता नहीं, वरन् मैं उसे आप ही देता हूँ।" यह आदमी शिकार नहीं है। जो मृत्यु छह महीने बाद आएगी, वह उस पर थोपी नहीं जाएगी, वह उसे उठाएँगे। और अध्याय का अंत भागने जैसा नहीं लगता, बल्कि लौटने जैसा: वे यरदन के पार उसी जगह चले जाते हैं जहाँ यूहन्ना बपतिस्मा देता था, और वहीं रहते हैं, और वहाँ बहुतों ने विश्वास किया।
एक बारीकी
वचन 22 को अधिकतर पाठक तारीख समझकर छोड़ देते हैं: "स्थापन पर्व हुआ, और जाड़े की ऋतु थी।" यह वह पर्व है जब यहूदी उस दिन को याद करते थे जब अपवित्र किए गए मन्दिर को फिर से पवित्र ठहराकर परमेश्वर को समर्पित किया गया था। यानी वे पत्थर की इमारत के समर्पण का उत्सव मना रहे हैं। और ठीक उसी पर्व पर यीशु कहते हैं: "जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है।" वही शब्द, दूसरा पात्र। मन्दिर नहीं, एक व्यक्ति; पुनःस्थापित इमारत नहीं, भेजा हुआ पुत्र। यूहन्ना यह जोड़ बिना समझाए हमारे सामने रख देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वे "जाड़े की ऋतु थी" कहकर छोड़ देते हैं।
आपके जीवन में इस समय कौन-सी आवाज़ें आपको बुला रही हैं, और आप कैसे पहचानते हैं कि उनमें से कौन-सी चरवाहे की है?
किस रिश्ते या ज़िम्मेदारी में आप इस समय मजदूर की तरह भागने को तैयार हैं, और वहाँ खड़े रहने की कीमत क्या होगी?
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John 10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
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यूहन्ना 10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अच्छा चरवाहा मैं हूँ; मैं अपनी भेड़ों को जानता हूँ, और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं।" ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि वह भेड़ों की गिनती जानते हैं। वह हर एक को जानते हैं। तेरी वह थकान भी, जिसे तूने किसी को नहीं बताया। मजदूर चरवाहा भागता है क्योंकि भेड़ें उसकी नहीं। पर तू उसका है। और आज भी वह तुझे नाम से पुकारता है।
मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझे दिया है, सबसे बड़ा है, और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता।" ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि भेड़ें मजबूत हैं। वे कमजोर हैं, भटकने वाली हैं। सुरक्षा उनकी पकड़ में नहीं, पिता की पकड़ में है। तेरा डर शायद यही है कि तू खुद को थामे नहीं रख पाएगा। सच है। पर तुझे थामने वाला हाथ सबसे बड़ा है।
यीशु उसी जगह लौट आए जहाँ यूहन्ना पहले बपतिस्मा देता था। यूहन्ना अब जीवित नहीं था, उसने कोई चमत्कार भी नहीं किया था, फिर भी लोगों ने कहा कि उसने इस मनुष्य के विषय में जो कुछ कहा वह सब सच था। और "वहाँ बहुतों ने उस पर विश्वास किया।" तुम्हारी सादी, सच्ची गवाही तुम्हारे जाने के बाद भी किसी को मसीह तक पहुँचा सकती है।
इन बातों के कारण यहूदियों में फिर फूट पड़ी।" यीशु ने अभी अपने प्राण देने की बात कही थी, सबसे कोमल शब्द, और उन्हीं शब्दों पर लोग बँट गए। सच्चाई हमेशा सबको जोड़ती नहीं, वह पहले अलग करती है। जब मसीह की बात आपके अपने घर या मंडली में मतभेद ले आए, तो घबराइए मत। पूछिए बस इतना, कि मैं किस ओर खड़ा हूँ।
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