यशायाह 59:2
पाठ
यशायाह लोगों की उस शिकायत को उठाकर उलट देते हैं जो हर निराश प्रार्थना करनेवाले के मन में उठती है: परमेश्वर चुप क्यों हैं? पद 1 में उत्तर आता है कि दोष उनकी ओर नहीं है, "यहोवा का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि उद्धार न कर सके, न वह ऐसा बहरा हो गया है कि सुन न सके।" और फिर पद 2 वह कड़वा "परन्तु" लाता है: "तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उसका मुँह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता।" दीवार परमेश्वर ने नहीं खड़ी की; वह हमारे ही हाथों की चिनाई है। बहरापन ऊपर नहीं, नीचे है।
मूल बात
यह पद पाप को एक नैतिक चूक के रूप में नहीं, बल्कि एक संबंध-विच्छेद के रूप में परिभाषित करता है। इब्रानी क्रिया जो यहाँ "अलग कर दिया" के लिए आई है, वह बादल है, वही शब्द जो मन्दिर के पर्दे के पीछे पवित्रस्थान को बाकी सब से अलग करने के लिए इस्तेमाल होता था। यानी हमारा अधर्म एक पर्दा बुनता है, और उस पर्दे के इस पार हम चिल्लाते रह जाते हैं। ध्यान दीजिए, परमेश्वर यहाँ अपनी सामर्थ्य या करुणा का बचाव नहीं कर रहे; वे उन्हें मानी हुई बात रखते हैं। जो सवाल में है वह हम हैं। और यही इस पद की दया भी है: यदि समस्या परमेश्वर की कमजोरी होती, तो कोई आशा न होती। समस्या यदि हमारा पाप है, तो उसका इलाज संभव है, क्योंकि पाप क्षमा किया जा सकता है।
सूत्र
इस अध्याय को पद 2 पर रोककर मत पढ़िए, क्योंकि यशायाह स्वयं नहीं रुकते। पद 16 में परमेश्वर चारों ओर देखते हैं और पाते हैं कि "कोई भी पुरुष नहीं", कोई विनती करनेवाला नहीं, कोई नहीं जो उस पर्दे के आरपार खड़ा हो सके। और तब वह वाक्य आता है जो पूरे बाइबल के उद्धार-इतिहास की धुरी है: "तब उसने अपने ही भुजबल से उद्धार किया।" जिस दीवार को हमने चिना, उसे गिराने का काम परमेश्वर अपने ऊपर ले लेते हैं। पद 20 उसे नाम देता है: "सिय्योन में एक छुड़ानेवाला आएगा।" मसीह में यह अक्षरशः हुआ। क्रूस पर जो अँधेरा छाया और जो पुकार उठी कि परमेश्वर ने क्यों छोड़ दिया, वह यशायाह 59:2 का भार है जो निर्दोष पर आ पड़ा। और उसी घड़ी मन्दिर का पर्दा ऊपर से नीचे तक फट गया। जो हाथ पर्दा बुनते हैं वे हमारे हैं; जो हाथ उसे फाड़ता है वह परमेश्वर का।
दर्पण
यह पद उस आराम को छीन लेता है जिसमें हम छिपना चाहते हैं: कि प्रार्थना का अनुत्तरित रहना बस एक रहस्य है। कभी-कभी वह रहस्य नहीं, हिसाब है। वह बिल जिसमें आपने थोड़ा हेरफेर किया; वह बात जो आपने अपने सहकर्मी के बारे में फैलाई और जिसे अब "चिंता" कहते हैं; वह भाई जिससे आपने चार साल से बात नहीं की और जिसे आप "उसकी गलती थी" कहकर टालते हैं। पद 3 बेरहमी से इशारा करता है हाथों और अंगुलियों और जीभ की ओर, यानी रोज़मर्रा के ठोस अंगों की ओर, न कि किसी धुँधली "मानव दुर्बलता" की ओर। और फिर भी यह निराशा का पद नहीं है, क्योंकि पद 12 कहता है, "हम अपने अधर्म के काम जानते हैं।" जानना ही पहला दरवाज़ा है। आज, अगले दस मिनट में, अकेले बैठकर उस एक काम को ज़ोर से, उसके असली नाम से परमेश्वर के सामने कहिए, बिना "लेकिन" जोड़े।
मुख्य पात्र
यहाँ केन्द्रीय पात्र परमेश्वर हैं, और उनका चित्र हमारी अपेक्षा से अधिक जीवंत है। वे दूर खड़े ठंडे न्यायी नहीं हैं। पद 15 कहता है कि यह सब देखकर "यहोवा ने बुरा माना", और पद 16 में वे "अचम्भा" करते हैं। परमेश्वर चौंकते हैं, दुखी होते हैं, क्रोधित होते हैं। मुँह छिपाना उनकी उदासीनता नहीं, उनकी पवित्रता की अनिवार्य प्रतिक्रिया है; आग और कूड़ा एक साथ नहीं रह सकते। परन्तु इसी पात्र के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वे अपने ही छिपे हुए मुँह से असंतुष्ट हैं। वे दूरी को बनाए नहीं रखना चाहते। इसलिए वे कवच पहनते हैं, धार्मिकता का झिलम और उद्धार का टोप, और स्वयं मैदान में उतरते हैं। यह वह परमेश्वर हैं जो न्याय करने में भी उद्धार करने को बेचैन हैं।
श्रोता
पहले सुननेवाले निर्वासन से लौटे हुए लोग थे। मन्दिर की नींव पड़ चुकी थी, वे प्रार्थना कर रहे थे, उपवास रख रहे थे, और फिर भी वह महिमा नहीं लौटी जिसका वादा था। उनका सवाल जायज़ था: हमने तो बंधुआई की सज़ा भुगत ली, अब देर क्यों? यशायाह उनका आईना उनकी ही गलियों की ओर मोड़ देते हैं। पद 14 पढ़िए: "सच्चाई बाजार में गिर पड़ी।" अदालतें बिक चुकी थीं, मजदूर ठगे जा रहे थे, ईमानदार आदमी शिकार बन रहा था। यानी लौट आना और बदल जाना एक बात नहीं। यह उन लोगों के लिए चुभता हुआ संदेश था जो स्वयं को पीड़ित समझते थे और जिन्हें बताया गया कि वे अपराधी भी हैं। धार्मिक सक्रियता और परमेश्वर की निकटता का कोई स्वतः संबंध नहीं।
बारीकी
"उसका मुँह तुम से ऐसा छिपा है।" इस छवि का भार तब खुलता है जब आप याद करें कि इस्राएल पर हर दिन उच्चारित आशीष यही थी कि यहोवा अपना मुख तुझ पर प्रकाशित करे और तुझ पर अनुग्रह करे। मुँह, यानी चेहरा, इब्रानी सोच में उपस्थिति, ध्यान और प्रसन्नता का प्रतीक है। चेहरा छिपाना रिश्ता तोड़ना है, जैसे कोई आपसे नज़र मिलाना बंद कर दे। और यह वाक्य का सबसे दर्दनाक हिस्सा है, क्योंकि इसमें शत्रुता से ज़्यादा शोक है। इसी पृष्ठभूमि में समझिए कि मसीह का देहधारी होना क्या है: वह चेहरा जो छिपा था, एक मनुष्य के चेहरे में दिखाई देने लगा, और वह चेहरा क्रूस पर थूका और पीटा गया ताकि हमारी ओर से फिर कभी न मुड़े।
मनन
किस प्रार्थना को आप "परमेश्वर की चुप्पी" कहते आए हैं, जबकि भीतर कहीं आप जानते हैं कि वहाँ कोई दीवार खड़ी है जिसे आपने ही चिना है?
यदि उद्धार परमेश्वर ने "अपने ही भुजबल से" किया, तो आपकी धार्मिकता की कोशिशें इस पूरे चित्र में कहाँ बैठती हैं?
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Isaiah 59:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यशायाह 59:2 का क्या अर्थ है?
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