यिर्मयाह 18:6
पाठ
कुम्हार के घर में परमेश्वर यिर्मयाह से एक सवाल पूछते हैं, और वह सवाल पूरे राष्ट्र के सिर पर आ गिरता है: "इस कुम्हार के समान तुम्हारे साथ क्या मैं भी काम नहीं कर सकता?" जो बर्तन चाक पर बिगड़ गया था, कुम्हार ने उसे फेंका नहीं, बल्कि उसी मिट्टी से "अपनी समझ के अनुसार" दूसरा बर्तन गढ़ दिया। इसी चित्र को परमेश्वर इस्राएल के घराने पर लागू करते हैं: जैसे मिट्टी कुम्हार के हाथ में रहती है, वैसे ही तुम मेरे हाथ में हो। यह वाक्य न धमकी है न सांत्वना, बल्कि दोनों एक साथ, और यही इसकी धार है।
मर्म
यह पद परमेश्वर के अधिकार की घोषणा है, पर ध्यान दीजिए कि वह अधिकार किस दिशा में मुड़ता है। तुरंत अगली पंक्तियों में परमेश्वर कहते हैं कि यदि कोई जाति "अपनी बुराई से फिरे," तो वे अपने ठाने हुए दंड पर पछताएँगे। यानी कुम्हार का हाथ भाग्य की मशीन नहीं है; वह जीवित हाथ है जो प्रतिक्रिया करता है। मिट्टी होने का अर्थ यह नहीं कि आपके चुनाव मायने नहीं रखते, बल्कि यह कि आपके चुनाव किसी और के हाथ में घटते हैं, और वह हाथ आपसे बड़ा है। नैतिक रूप से यह दोधारी है: आप अपने जीवन के कुम्हार नहीं हैं, इसलिए अपनी योजनाओं पर अकड़ना मूर्खता है; और आप कठोर पत्थर भी नहीं हैं, इसलिए "अब बदलना संभव नहीं" कहना बहाना है, सच्चाई नहीं।
साझा सूत्र
कुम्हार का चित्र बाइबल में कहीं भी भाग्यवाद नहीं सिखाता, बल्कि हमेशा सृष्टि और पुनर्सृष्टि की ओर इशारा करता है। जिस परमेश्वर ने आदम को मिट्टी से गढ़ा, वही यहाँ बिगड़े हुए बर्तन को दोबारा गढ़ने की बात कर रहे हैं। और यहीं से एक रेखा सीधे मसीह तक जाती है: क्रूस पर परमेश्वर ने बिगड़ी हुई मानवता को कूड़े में नहीं फेंका, उन्होंने उसे फिर से गढ़ा, अपने पुत्र के स्वरूप में। पौलुस रोमियों 9:21 में इसी चित्र को उठाते हैं, पर ध्यान रहे, वहाँ भी उसका अंत करुणा पर होता है, दंड पर नहीं। इसलिए "मैं मिट्टी हूँ" कहना हार मानना नहीं है; वह उस हाथ के सामने खुल जाना है जिसने पहले ही हमें बचाने का निर्णय ले लिया है।
दर्पण
अब इसे रोज़मर्रा में उतारिए। आप जिस सहकर्मी के बारे में मन ही मन कह चुके हैं, "यह आदमी कभी नहीं सुधरेगा," उसके बारे में परमेश्वर ने यह फैसला नहीं सुनाया है। आपके परिवार का वह रिश्ता जिसे आपने "अब बहुत देर हो चुकी" कहकर बंद कर दिया है, चाक पर से नहीं उतरा है। और अपने बारे में भी: वह आदत, वह गुस्सा, पैसे को लेकर वह पकड़ जिसे आप "मेरा स्वभाव ही ऐसा है" कहकर पालते आए हैं, मिट्टी के मुँह से निकला हुआ बहाना है। सच यह भी है कि यह पद आपकी अकड़ पर भी हाथ रखता है, क्योंकि जिस करियर, शरीर और समय को आप अपनी रचना समझते हैं, वह किसी और के हाथ की चीज़ है।
आज दस मिनट निकालिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके बारे में आप मान चुके हैं कि वह कभी नहीं बदलेगा, और उस नाम के नीचे लिखिए, "यह अब भी परमेश्वर के हाथ में है," फिर उसी नाम के लिए प्रार्थना कीजिए।
एक बारीकी
पद 4 का एक छोटा वाक्यांश पूरे चित्र को खोल देता है: कुम्हार ने "उसी का दूसरा बर्तन" बनाया। नई मिट्टी नहीं लाई गई। जो बिगड़ा, उसी को दोबारा गढ़ा गया। परमेश्वर इस्राएल को छोड़कर कोई दूसरी जाति नहीं चुनते; वे उसी घराने को, उसी इतिहास को, उसी टूटी हुई सामग्री को हाथ में लेते हैं। यह आपके जीवन पर लागू होता है और थोड़ा असहज भी है: परमेश्वर आपको आपके अतीत से अलग करके नहीं गढ़ते। वही स्वभाव, वही घाव, वही बीता हुआ समय चाक पर लौटता है। पुनर्निर्माण का मतलब मिटा देना नहीं, फिर से आकार देना है, और उस प्रक्रिया में दबाव लगता है।
प्रसंग
यिर्मयाह यह सब यहूदा के अंतिम दशकों में कह रहे हैं, जब बाबेल का साया बढ़ रहा था और यरूशलेम में लोग मंदिर के भरोसे बैठे थे: परमेश्वर का घर यहीं है, हमें कुछ नहीं होगा। कुम्हार की कार्यशाला कोई मंदिर नहीं थी, बल्कि शहर के किनारे की धूल भरी जगह, जहाँ नबी को भेजा जाता है ताकि सत्ता के गलियारों की जगह मज़दूर के हाथ से सबक मिले। इसी अध्याय के अंत में लोग जवाब देते हैं, "ऐसा नहीं होने का, हम तो अपनी ही कल्पनाओं के अनुसार चलेंगे," और फिर नबी को मारने की योजना बनाते हैं। यानी यह चेतावनी खाली हवा में नहीं दी गई; उसे सुनकर लोग भड़क उठे।
मुख्य पात्र
यहाँ मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और वे मालिक की कुर्सी पर नहीं, चाक के सामने झुके हुए दिखाई देते हैं। यह महत्वपूर्ण है। सर्वशक्तिमान को यिर्मयाह एक कारीगर के रूप में देखता है, जिसके हाथ गंदे हैं, जो धैर्य से काम करता है, जो बिगड़ने पर चिढ़कर उठ नहीं जाता। साथ ही यही परमेश्वर पद 17 में कहते हैं कि वे विपत्ति के दिन "मुँह नहीं परन्तु पीठ" दिखाएँगे, और यह डरावना है। इन दोनों को अलग मत कीजिए। परमेश्वर का धैर्य अनंत रूप से लचीला नहीं है; उनकी करुणा का अपना समय है, और वह समय अभी, आज खुला हुआ है। इसीलिए यह पद प्रश्न के रूप में आता है, बयान के रूप में नहीं: वे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
चिंतन
आपके जीवन का कौन सा हिस्सा आपने चाक से उतारकर अलमारी में रख दिया है, यह मानकर कि अब उसका कुछ नहीं हो सकता?
जब परमेश्वर का हाथ आपको नया आकार देने के लिए दबाव डालता है, तो आप उसे अक्सर किस नाम से पुकारते हैं: बुरी किस्मत, अन्याय, या गढ़ा जाना?
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Jeremiah 18:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यिर्मयाह 18:6 का क्या अर्थ है?
यिर्मयाह 18:6 किस विषय में है?
यिर्मयाह 18:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यिर्मयाह 18:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यिर्मयाह 18:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jeremiah 18 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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