रोमियों 9
पाठ
पौलुस एक शपथ जैसी बात से शुरू करते हैं: वे झूठ नहीं बोल रहे, उनका मन पवित्र आत्मा में गवाही देता है, और उनके भीतर एक ऐसा शोक है जो कभी सोता नहीं। अपने ही लोगों, इस्राएल के लिये वे इतना तड़पते हैं कि कहते हैं, "मैं यहाँ तक चाहता था, कि अपने भाइयों, के लिये… आप ही मसीह से श्रापित और अलग हो जाता।" फिर वे उस सवाल की ओर मुड़ते हैं जो इस दुःख के नीचे दबा है: यदि परमेश्वर के अपने ही लोग मसीह को ठुकरा रहे हैं, तो क्या परमेश्वर की प्रतिज्ञा टूट गई? उत्तर में वे इस्राएल के इतिहास को खोलते हैं, इसहाक और इश्माएल, याकूब और एसाव, मूसा और फ़िरौन, कुम्हार और मिट्टी, और अन्त में उस पत्थर पर पहुँचते हैं जिस पर लोग ठोकर खाते हैं। बीच में वे यह भी दिखाते हैं कि होशे और यशायाह ने पहले ही बता दिया था: बचे हुए थोड़े ही होंगे, और जो "मेरी प्रजा न थी" वे प्रजा कहलाएँगे।
मूल बात
यहाँ जो दाँव पर लगा है वह चुनाव का सिद्धांत नहीं, बल्कि परमेश्वर की विश्वसनीयता है। पौलुस का असली प्रश्न यह है: अगर परमेश्वर ने इस्राएल से वादा किया और इस्राएल का बड़ा हिस्सा मसीह को ठुकरा बैठा, तो क्या परमेश्वर का वचन नाकाम हो गया? उनका उत्तर काटता है: नहीं, क्योंकि वादा कभी खून के रिश्ते से नहीं चला, वह हमेशा बुलावे से चला। "शरीर की सन्तान परमेश्वर की सन्तान नहीं, परन्तु प्रतिज्ञा के सन्तान वंश गिने जाते हैं।" याकूब और एसाव के जन्म से पहले, जब उन्होंने "कुछ भला या बुरा" नहीं किया था, फैसला हो चुका था, ताकि सब कुछ "बुलानेवाले पर बनी रहे।" यह हमारे लिये तसल्ली भी है और चोट भी। तसल्ली, क्योंकि आपका उद्धार आपके प्रदर्शन पर नहीं टिका; परमेश्वर की दया आपकी दौड़ से नहीं, अपने ही निर्णय से बहती है। चोट, क्योंकि इसका मतलब है कि आपके पास परमेश्वर पर कोई दावा नहीं, कोई हक़ नहीं, कोई ऐसी योग्यता नहीं जिसे दिखाकर आप कह सकें: मुझे तो मिलना ही चाहिए था। दया, परिभाषा से ही, बिना कारण दी जाती है, वरना वह दया नहीं मज़दूरी होती। और ठीक यही बात हमें सबसे ज़्यादा खटकती है।
जोड़ने वाला सूत्र
यह अध्याय अचानक आसमान से नहीं गिरता। इससे ठीक पहले पौलुस ने लिखा था कि कोई भी वस्तु हमें मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकती। और तुरंत बाद वे कहते हैं कि वे स्वयं "मसीह से श्रापित और अलग" होने को तैयार हैं, बशर्ते उनके लोग बच जाएँ। यह विरोधाभास नहीं, यह उसी प्रेम का बहाव है। जो व्यक्ति सचमुच जान गया है कि उसे कोई अलग नहीं कर सकता, वही इतना निडर होकर दूसरों के लिये अपने आप को दाँव पर लगा सकता है। और यहीं मसीह की छाया पड़ती है: पौलुस जो चाह भर सके, यीशु ने कर दिखाया। वे सचमुच शापित हुए, सचमुच अलग किए गए, ताकि जो "मेरी प्रजा न थी" उसे प्रजा कहा जा सके। रोमियों 9 का पूरा तर्क अंत में एक व्यक्ति पर आकर ठहरता है: सिय्योन में रखा गया वह पत्थर।
दर्पण
आप खुद को कहाँ खड़ा पाते हैं, इसकी परीक्षा सरल है: जब आप पढ़ते हैं "यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की परन्तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है," तो भीतर राहत उठती है या विरोध? अगर विरोध उठता है, तो शायद इसलिए कि आप वर्षों से दौड़ रहे हैं। सुबह का समय, बच्चों की परवरिश, चंदा, सेवकाई, वह रविवार जब आप थके होकर भी गए। कहीं गहरे में एक खाता-बही चल रही है, और यह पद उसे फाड़ देता है। और तब वह असली सवाल सामने आता है जो हम कभी ज़ोर से नहीं पूछते: अगर मेरी मेहनत मुझे कुछ नहीं दिलाती, तो मैं इतने साल किसके लिये कर रहा था? यह पाठ आपके परिश्रम को नहीं, आपके दावे को तोड़ता है। और यह भी पूछता है: आपके अपने परिवार में, आपके भाई या बेटी में जो विश्वास से दूर चला गया है, क्या आपके भीतर पौलुस जैसा "सदा दुखता" मन है, या आपने चुपचाप उसे परमेश्वर के न्याय के हवाले करके अपनी शांति बचा ली है?
संदर्भ
पौलुस यह पत्र लगभग सन् 57 में लिखते हैं, कुरिन्थुस से, रोम की उस कलीसिया को जिसे उन्होंने खुद नहीं लगाया था। रोम में समस्या ठोस थी। सम्राट क्लौदियुस ने कुछ साल पहले यहूदियों को शहर से निकाला था; जब वे लौटे, तो कलीसिया में अन्यजाति विश्वासी बहुमत बन चुके थे। कल्पना कीजिए उस तनाव की: जो लोग वाचाओं और व्यवस्था के वारिस थे, वे अब अल्पसंख्यक हैं, और जिन्हें कल तक अशुद्ध कहा जाता था, वे मेज़ के मुखिया बन बैठे हैं। इस माहौल में अन्यजाति विश्वासियों के मन में एक ख़तरनाक विचार पनप सकता था: परमेश्वर ने यहूदियों को छोड़ दिया, अब हमारी बारी है। रोमियों 9 से 11 उसी घमंड की जड़ पर कुल्हाड़ी चलाते हैं, और साथ ही यहूदी विश्वासियों के उस डर का उत्तर देते हैं कि कहीं परमेश्वर का वादा हवा तो नहीं हो गया।
एक बारीकी
पद 22 और 23 में एक असंतुलन छिपा है जिसे अंग्रेज़ी या हिंदी में जल्दी से पढ़ जाना आसान है। क्रोध के बरतनों के बारे में लिखा है कि वे "विनाश के लिये तैयार किए गए थे," पर यह नहीं कहा जाता कि किसने तैयार किए। लेकिन दया के बरतनों के बारे में पौलुस साफ़ कहते हैं: "जिन्हें उसने महिमा के लिये पहले से तैयार किया।" कर्ता का नाम केवल दया की ओर लिया गया है। और उससे पहले एक और शब्द है जिसे हम अक्सर छोड़ देते हैं: परमेश्वर ने उन्हें "बड़े धीरज से सही।" यानी यहाँ कोई ठंडा, यांत्रिक न्यायाधीश नहीं बैठा जो बरतन फोड़ने को उतावला हो। जो चित्र उभरता है वह सहनेवाले परमेश्वर का है, जिसका धीरज ही इस बीच के समय को बनाता है, वह समय जिसमें आप और मैं अब भी साँस ले रहे हैं।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का मुख्य पात्र निस्संदेह परमेश्वर हैं, और जो चेहरा उभरता है वह सहज नहीं है। वे स्वतंत्र हैं, इतने कि जन्म से पहले चुनते हैं; वे इतने ऊँचे हैं कि उनसे "तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया है" पूछना ही अनुचित ठहरता है। पर यही परमेश्वर मूसा से कहते हैं, "मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ, उस पर दया करूँगा," और ध्यान दीजिए कि यह वाक्य मूल में उस क्षण बोला गया था जब इस्राएल ने सोने का बछड़ा बनाकर सब कुछ गँवा दिया था। वहाँ यह वाक्य धमकी नहीं था, वह उस लोगों के बचे रहने का एकमात्र आधार था। परमेश्वर की सम्प्रभुता का पहला फल न्याय नहीं, बल्कि यह है कि नाश के योग्य लोग अब भी जीवित हैं।
अंतर्पाठ
दो जगहें इस अध्याय को रोशनी देती हैं। पहली, निर्गमन 32, जहाँ मूसा परमेश्वर से कहते हैं कि लोगों को क्षमा करें, वरना उनका अपना नाम पुस्तक से मिटा दिया जाए। पौलुस जानबूझकर उसी मुद्रा में खड़े होते हैं; वे केवल भावुक नहीं हो रहे, वे मध्यस्थ की उस पुरानी परंपरा में अपने आप को जोड़ रहे हैं। दूसरी, होशे की भविष्यवाणी जिसे वे यहाँ उद्धृत करते हैं: "जो मेरी प्रजा न थी, उन्हें मैं अपनी प्रजा कहूँगा।" होशे ने ये शब्द इस्राएल के बारे में कहे थे, अपने ही विश्वासघाती लोगों के बारे में। पौलुस उन्हें अन्यजातियों पर लागू करते हैं। यह मनमानी नहीं; यह तर्क है कि परमेश्वर हमेशा से ऐसे ही काम करते आए हैं, ठुकराए हुए को नाम देकर।
पहले सुननेवाले
रोम के यहूदी विश्वासी इस अध्याय को अपने घाव पर पढ़ते होंगे। उनके अपने रिश्तेदार, जिनके साथ वे आराधनालय में बड़े हुए थे, अब उन्हें धर्मत्यागी मानते थे। उनके कानों में पद 4 और 5 की वह सूची, लेपालकपन, महिमा, वाचाएँ, व्यवस्था, उपासना, प्रतिज्ञाएँ, पूर्वज, संगीत की तरह बजती होगी: पौलुस उनकी विरासत को ठुकरा नहीं रहे, वे उसे गले लगा रहे हैं। और अन्यजाति विश्वासियों ने पद 25 और 26 को अपने ही नाम की तरह सुना होगा। वे रोम के दास, कारीगर, प्रवासी थे, ऐसे लोग जिन्हें कभी किसी ने "जीविते परमेश्वर की सन्तान" नहीं कहा था। पर उसी साँस में उन्होंने यह भी सुना कि वे केवल दया के बरतन हैं, कुम्हार की कारीगरी, न कि अपनी योग्यता का फल।
कठिन प्रश्न
फ़िरौन वाला पद टलता नहीं है: "वह जिस पर चाहता है, उस पर दया करता है; और जिसे चाहता है, उसे कठोर कर देता है।" अगर परमेश्वर कठोर करते हैं, तो दोष कैसा? पौलुस इस सवाल को जानते हैं, वे इसे पद 19 में खुद उठाते हैं, और फिर वे उसका दार्शनिक हल नहीं देते। वे प्रतिप्रश्न करते हैं: "हे मनुष्य, भला तू कौन है, जो परमेश्वर का सामना करता है?" यह उत्तर हमें असंतुष्ट छोड़ता है, और शायद छोड़ना ही चाहिए। पौलुस यह नहीं कह रहे कि सवाल बेवकूफ़ी है; वे कह रहे हैं कि सवाल पूछनेवाले की जगह मिट्टी की है, न्यायाधीश की नहीं। पर ध्यान रखिए कि यह अध्याय यहाँ खत्म नहीं होता। यह पत्थर पर आकर खत्म होता है, और वहाँ शर्त बदल जाती है: "जो उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा।" रहस्य बना रहता है, पर दरवाज़ा खुला रहता है, और वह दरवाज़ा आपके सामने है।
चिंतन
आपके भीतर कहीं वह खाता-बही अब भी चल रही है जिसमें आप परमेश्वर के सामने अपनी योग्यता जोड़ते हैं? आज उसका कौन सा पन्ना आपको फाड़ना है?
पौलुस का मन अपने लोगों के लिये "सदा दुखता" रहता था। आपके करीब कौन है जिसके लिये आपने दुःख करना छोड़ दिया और उसे चुपचाप न्याय के हवाले कर दिया?
यदि आप सचमुच "दया के बरतन" हैं और कुम्हार नहीं, तो आपके जीवन का कौन सा हिस्सा है जिसे आप अब भी अपने हाथ में पकड़े हुए हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि मसीह शरीर के भाव से इस्राएल के वंश में आया और वही "सब के ऊपर परम परमेश्वर युगानुयुग धन्य है।" आपने अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी कीं। मेरा उद्धारकर्ता सचमुच मनुष्य बना और सचमुच परमेश्वर है, इसलिए मेरा भरोसा डगमगाता नहीं।
रिबका के गर्भ में दो बच्चे थे, एक ही पिता, एक ही माँ, एक ही समय। कोई अंतर नहीं था जिसे परमेश्वर देखकर चुनाव करता। "जब रिबका भी एक से अर्थात् हमारे पिता इसहाक से गर्भवती थी।" फिर भी उसका बुलावा आया, उनके कुछ करने से पहले। सोचो, तुम्हारे नाम पर उसकी नज़र तब पड़ी जब तुम्हारे पास दिखाने को कुछ भी न था। आज भी तुम्हें उसका प्रेम कमाना नहीं है।
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