यिर्मयाह 7
पाठ
मन्दिर के फाटक पर भीड़ है। पर्व का दिन है, लोग भीतर जा रहे हैं, और वहीं द्वार पर परमेश्वर यिर्मयाह को खड़ा करते हैं: "अपनी-अपनी चाल और काम सुधारो, तब मैं तुम को इस स्थान में बसे रहने दूँगा।" जो नारा लोगों की जीभ पर था, "यही यहोवा का मन्दिर है; यही यहोवा का मन्दिर, यहोवा का मन्दिर", उसे परमेश्वर झूठी बात कहकर तोड़ देते हैं। फिर वे शीलो की ओर उँगली उठाते हैं, जहाँ पहले उनके नाम का निवास था और जो अब खण्डहर है, और हिन्नोम की तराई की ओर, जहाँ माता-पिता अपने ही बच्चों को आग में जला रहे हैं। अन्त में प्रार्थना पर भी रोक लग जाती है, और नगर की गलियों से दुल्हे-दुल्हन का शब्द मिट जाने की घोषणा होती है।
मर्म
भीड़ का तर्क साफ है: परमेश्वर यहाँ रहते हैं, इसलिए यह नगर कभी नहीं गिर सकता। यह धर्मशास्त्र नहीं, बीमा-पॉलिसी है। और परमेश्वर इसी बिन्दु पर चोट करते हैं। वे पूछते हैं कि चोरी, हत्या, व्यभिचार और झूठी शपथ के बाद उनके सामने खड़े होकर "हम इसलिए छूट गए हैं" कहना क्या उचित है। ध्यान दें, वे मन्दिर को गिराने की बात नहीं कर रहे; वे कह रहे हैं कि मन्दिर का नाम उनका है, मालिकी उनकी है, और वे अपने ही घर को डाकुओं की गुफा बनने नहीं देंगे। पवित्र स्थान कवच नहीं है। वाचा का परमेश्वर उपस्थिति देते हैं, लेकिन उस उपस्थिति को अन्याय के ऊपर छत बनने की अनुमति नहीं देते। परदेशी, अनाथ और विधवा के साथ जो होता है, वही बताता है कि आराधना सच्ची है या अभिनय।
सूत्र
जब यीशु मसीह मन्दिर के आँगन में मेज़ें उलटते हैं, तो वे अपने शब्द नहीं, यिर्मयाह के शब्द उठाते हैं: "डाकुओं की गुफा।" यह संयोग नहीं। छह सौ साल बाद वही फाटक, वही भीड़, वही भरोसा कि पत्थर हमें बचा लेंगे, और वही आवाज़। फ़र्क़ यह है कि अब बोलनेवाला द्वार पर खड़ा भविष्यद्वक्ता नहीं, वह स्वयं है जिसका नाम उस भवन पर लिखा था। और यिर्मयाह से आगे जाकर वह एक बात करता है: शीलो की तरह यह मन्दिर भी गिरेगा, पर तीन दिन में उठनेवाला एक नया मन्दिर उसका देह होगा। आज्ञाकारिता की वह सच्चाई जो पद 23 में माँगी गई थी, "मेरे वचन को मानो, तब मैं तुम्हारा परमेश्वर होऊँगा", अन्त में एक ही व्यक्ति में पूरी होती है, और उसी के द्वारा हममें।
दर्पण
हमारे पास भी नारे हैं। "मैं तो हर रविवार चर्च में हूँ।" "मेरा परिवार तो तीन पीढ़ियों से विश्वासी है।" "मैं दशमांश देता हूँ।" ये बुरी बातें नहीं; बुरी बात यह है कि हम इन्हें कर्मचारी को कम वेतन देने, घर में पत्नी पर चिल्लाने, या किरायेदार को धोखा देने के ऊपर छत की तरह तान देते हैं। परमेश्वर ने तीन नाम गिनाए: परदेशी, अनाथ, विधवा। यानी वे लोग जिनके पास आपके विरुद्ध कोई ताक़त नहीं है, जो शिकायत नहीं कर सकते। आपके जीवन में वह कौन है? जिस मज़दूर का हिसाब आपने टाल रखा है, जिस अकेली बहन को आपने बुलाना बंद कर दिया, जिस नए आदमी को कलीसिया में कोई नहीं जानता। आज ही, अगले दस मिनट में, उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए और उसे फ़ोन करके पूछिए कि उसे किस चीज़ की ज़रूरत है।
अंतर्पाठ
शमूएल की पुस्तक में एली के पुत्रों के पाप के बाद शीलो का तम्बू उजड़ गया और सन्दूक छिन गया; यिर्मयाह उसी खण्डहर की ओर भीड़ को भेजते हैं, "वहाँ जाकर देखो", क्योंकि इतिहास पहले ही एक बार साबित कर चुका है कि परमेश्वर अपने नाम के स्थान को भी छोड़ सकते हैं। और पद 22 की चौंकानेवाली बात, कि मिस्र से निकालते समय परमेश्वर ने होमबलि की आज्ञा नहीं दी थी, वही है जो शमूएल शाऊल से कहता है: आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है। बलि व्यवस्था नकली नहीं थी, पर वह कभी भी संबंध का विकल्प नहीं थी। जहाँ सुनना मर जाता है, वहाँ धूप का धुआँ केवल धुआँ है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और उनका भावनात्मक चित्र बेचैन करता है। वे कहते हैं, "मैं तुम से बड़े यत्न से बातें करता रहा हूँ", मानो कोई पिता रातभर जागकर बुलाता रहा हो। वे भविष्यद्वक्ताओं को "लगातार" भेजते रहे। और फिर, पद 19 में, क्रोध के बीच एक अजीब करुणा फूटती है: "क्या वे मुझी को क्रोध दिलाते हैं? क्या वे अपने ही को नहीं?" यह रोष प्रतिष्ठा का नहीं, प्रेम का है; वे देख रहे हैं कि लोग अपने ही मुँह पर उदासी पोत रहे हैं। तोपेत के बारे में उनका वाक्य सबसे मार्मिक है: "न मेरे मन में वह कभी आया।" परमेश्वर कहते हैं कि यह क्रूरता उनकी कल्पना से भी बाहर थी। और इसी पीड़ा में वे यिर्मयाह को प्रार्थना से रोक देते हैं, क्योंकि न्याय अब टलने का नहीं।
श्रोता
सुननेवाले यहूदा के वे लोग थे जिन्होंने देखा था कि उत्तर का राज्य, उनके "सब भाई, सारे एप्रैमी", अश्शूर के हाथों मिट गए, और यरूशलेम बचा रहा। उन्होंने इससे ग़लत सबक सीखा: हम चुने हुए हैं, हमारा मन्दिर अभेद्य है। योशिय्याह के सुधार के बाद भी घरों में "स्वर्ग की रानी" के लिए रोटियाँ पक रही थीं, और यह पूरे परिवार का काम था, बच्चे ईंधन, पिता आग, माँ आटा। उनके कानों में पद 14 किसी गाली से बढ़कर था, लगभग देशद्रोह; इसी भाषण के कारण अगले अध्यायों में उन्हें मार डालने की माँग उठती है। हमारे लिए यह पुराना उपदेश है, उनके लिए यह उनकी राजधानी, उनके मन्दिर और उनके भविष्य की मृत्यु-सूचना थी।
चिंतन
आपका कौन सा वाक्य "यही यहोवा का मन्दिर" जैसा है, यानी सच्चा लेकिन आपके जीवन की जाँच रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है?
जिन लोगों के पास आपके विरुद्ध कोई ताक़त नहीं है, वे आपके बारे में क्या गवाही देंगे?
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Jeremiah 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यिर्मयाह 7 का क्या अर्थ है?
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यिर्मयाह 7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यिर्मयाह 7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jeremiah 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मुझे माफ कर जब मैंने तेरे नाम की आड़ में अपने गलत कामों को छिपाया है। मेरा मन तेरा घर है, उसे लुटेरों का अड्डा न बनने दे। मेरी भक्ति सिर्फ दिखावा न रहे, बल्कि सच्चाई से भरी हो। मुझे भीतर से साफ कर दे।
जिस दिन से तुम्हारे पुरखा मिस्र देश से निकले, उस दिन से आज तक मैं तुम्हारे पास अपने सब दास भविष्यद्वक्ताओं को बार बार भेजता रहा।" सोचो, सदियों तक परमेश्वर हार नहीं मानता। एक नबी की अनसुनी हुई, तो उसने दूसरा भेज दिया। तुम्हारे जीवन में भी वह कितनी आवाज़ें भेज चुका है? कोई वचन, कोई मित्र, कोई बेचैन रात। वह अब भी बोल रहा है। सुन लो।
पिता, तू बार बार बोलता रहा और मैं सुनने से कतराता रहा। तूने पुकारा, पर मैंने जवाब नहीं दिया। मुझे माफ कर। मेरे कानों को खोल दे, मेरे मन की जिद को नरम कर, ताकि जब तू आज बुलाए तो मैं टालूँ नहीं, बल्कि तेरी ओर लौट आऊँ।
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