यूहन्ना 8
पाठ
मन्दिर के आँगन में सुबह का उपदेश टूटता है: शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को घसीटकर बीच में खड़ा कर देते हैं, और यीशु उत्तर देने के बजाय झुककर उँगली से भूमि पर लिखने लगते हैं। जब सब चले जाते हैं, वे कहते हैं, "जा, और फिर पाप न करना।" इसके बाद अध्याय एक लंबे, तीखे विवाद में बदल जाता है: ज्योति, गवाही, पिता, स्वतंत्रता, अब्राहम, और अन्त में वह वाक्य जिस पर पत्थर उठ जाते हैं, "पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ।"
मूल बात
यह अध्याय दो प्रश्नों को एक कर देता है: तुम कौन हो, और मैं कौन हूँ। धर्म के जानकार जानते हैं कि व्यवस्था क्या कहती है; वे नहीं जानते कि वे किसके सामने खड़े हैं। यीशु न्याय को रद्द नहीं करते, वे उसे अपने हाथ में लेते हैं और फिर स्थगित कर देते हैं: "मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता।" ध्यान दें, वे यह नहीं कहते कि कुछ हुआ ही नहीं। कृपा पाप को झूठा नहीं ठहराती, वह उसे ढाँपती है और आगे का रास्ता खोलती है। और जो कृपा उस स्त्री को जीवन देती है, वही आँगन के दूसरे लोगों के लिए असहनीय हो जाती है, क्योंकि उसे लेने के लिए पहले यह मानना पड़ता है कि मैं भी अभियुक्त हूँ।
जोड़ने वाला सूत्र
"जगत की ज्योति मैं हूँ" यह वाक्य संयोग से नहीं आता। मन्दिर के भण्डार घर के पास, झोपड़ियों के पर्व की उन बड़ी मशालों की स्मृति में, जो जंगल के उस अग्निस्तंभ को याद कराती थीं जिसने इस्राएल को रात में राह दिखाई। यीशु कहते हैं: वह स्तंभ अब देह में तुम्हारे बीच खड़ा है। और अध्याय का अन्त उसी नाम पर पहुँचता है जो जलती झाड़ी में से सुनाई पड़ा था, "मैं हूँ।" यही सूत्र है: मूसा, अब्राहम, व्यवस्था, ये सब उस एक की ओर इशारा करते थे जो उनसे पहले था। इसलिए अब्राहम की सन्तान होना वंशावली का नहीं, विश्वास का प्रश्न है, और स्वतंत्रता का स्रोत मिस्र से निकलना नहीं, पुत्र है: "यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करेगा, तो सचमुच तुम स्वतंत्र हो जाओगे।"
आपका दर्पण
"हम तो अब्राहम के वंश से हैं, और कभी किसी के दास नहीं हुए।" यह वाक्य ऐतिहासिक रूप से गलत है और भावनात्मक रूप से बहुत परिचित। हम भी ऐसा ही बोलते हैं: मेरा घर मसीही है, मैं बीस साल से कलीसिया में हूँ, मैं छोटा समूह चलाता हूँ, इसलिए मैं किसी चीज़ का दास नहीं। पर उस आदत के बारे में क्या, जिसे आप हर बार तोड़ने का वादा करते हैं और अगले शुक्रवार फिर हार जाते हैं? उस कड़वाहट के बारे में, जो परिवार के किसी नाम पर आज भी गर्म हो जाती है? उस पैसे के हिसाब के बारे में, जो आपकी प्रार्थना से ज़्यादा आपकी नींद तय करता है? यीशु आपकी वंशावली से बहस नहीं करते। वे केवल पूछते हैं कि उनका वचन आपके हृदय में जगह पाता है या नहीं।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में यीशु आश्चर्यजनक रूप से अकेले हैं। स्त्री जाती है, भीड़ बदलती है, विरोधी उन्हें सामरी और दुष्टात्माग्रस्त कहते हैं, और अन्त में पत्थर उठते हैं। इस अकेलेपन के बीच वे कहते हैं, "मेरा भेजनेवाला मेरे साथ है; उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।" यह आत्मविश्वास नहीं, यह सम्बन्ध है। वे अपनी प्रतिष्ठा नहीं चाहते, अपना बचाव भी बहुत नहीं करते; वे केवल उसी की ओर इशारा करते रहते हैं जिसने भेजा। और यहीं उनकी कठोरता समझ में आती है: चौवालीसवीं आयत में जो शब्द वे बोलते हैं, वे किसी घायल अहंकार से नहीं निकलते, बल्कि उस दुःख से जो सच बोलनेवाले को होता है जब सुननेवाला सुनना ही नहीं चाहता।
एक छोटी बात
यूहन्ना यह नहीं बताता कि यीशु ने भूमि पर क्या लिखा। यह चुप्पी जानबूझकर है, और सदियों से लोगों ने उसे भरने की कोशिश की है। परन्तु शायद लिखने की विषय-वस्तु से ज़्यादा महत्वपूर्ण झुकना है। वे एक बार झुकते हैं, सीधे होते हैं, एक वाक्य बोलते हैं, और फिर झुक जाते हैं। इस बीच जो होता है वह शोर नहीं, ठहराव है: "बड़ों से लेकर छोटों तक एक-एक करके निकल गए।" पत्थर हाथों से गिरने के लिए भाषण की ज़रूरत नहीं पड़ी, केवल इतनी देर की चुप्पी चाहिए थी कि हर आदमी अपने भीतर देख सके। परमेश्वर की आवाज़ यहाँ धीमी है, और इसीलिए बचती नहीं।
पहले सुननेवाले
जो लोग उस आँगन में खड़े थे, वे रोमी शासन के नीचे जी रहे थे और अपनी पहचान अब्राहम में गाड़ रखते थे; वही उनका आखिरी सम्मान था। "तू अपनी गवाही आप देता है" यह कानूनी आपत्ति उनके लिए तर्क नहीं, हथियार थी, क्योंकि दो गवाहों की व्यवस्था वे बचपन से जानते थे। और यूहन्ना जिनके लिए लिख रहा था, वे मसीही अपनी सभाओं से निकाले जा चुके थे, अपने ही परिवारों में सामरी और भ्रष्ट कहे जा रहे थे। उनके लिए यह अध्याय दिलासा था: जिस स्वामी को उन्होंने अपनाया, वह भी इसी तरह बाहर किया गया था, और तब भी अकेला नहीं था।
आपके जीवन में वह कौन सी बात है जिसे आप "मैं तो विश्वासी हूँ" कहकर देखने से बचते रहे हैं?
यीशु की उस चुप्पी में, जब वे झुककर लिख रहे थे, आपको आज क्या सुनाई देता है?
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John 8 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वह ये बातें कह ही रहा था कि बहुतों ने उस पर विश्वास किया।" कितनी सुंदर घड़ी। पर ठीक अगली पंक्तियों में यीशु उन्हीं से कहते हैं, "यदि तुम मेरे वचन में बने रहो, तो सच में मेरे चेले ठहरोगे।" और कुछ ही देर में वही लोग पत्थर उठा लेते हैं। एक पल का विश्वास आसान है, बने रहना कठिन। आज तू किस में टिका हुआ है?
पिता, कई बार मैं सुनता तो हूँ, पर सच में सुन नहीं पाता। मेरे भीतर का शोर, मेरे अपने विचार, मेरी जिद, ये सब तेरी आवाज़ को दबा देते हैं। मेरे कान खोल, मेरा मन नरम कर, ताकि तेरी बात मुझ तक पहुँचे और मैं उसे समझ सकूँ।
यीशु ने कहा, "तुम नीचे के हो, मैं ऊपर का हूँ; तुम संसार के हो, मैं संसार का नहीं।" बात सिर्फ जगह की नहीं, जड़ की है। जो जिससे निकला है, उसी की सोच बोलता है। इसलिए वे उसकी बात समझ नहीं पा रहे थे। आज खुद से पूछ: मेरी चिंताएँ, मेरी इच्छाएँ, मेरे फैसले किस मिट्टी से उगते हैं? और अगर मसीह मुझमें है, तो कुछ तो ऊपर का दिखना चाहिए।
मंदिर में यीशु के चारों ओर विरोधी खड़े थे, ताने और आरोप लग रहे थे, और उसी बीच वे कहते हैं, "मेरा भेजनेवाला मेरे साथ है; उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।" भीड़ के बीच भी अकेलापन आता है, और अकेले भी संगति मिलती है। ध्यान दो, वे इसे पिता की प्रसन्नता से जोड़ते हैं। जिस काम में तुम इस समय हो, क्या वह पिता को भाता है? शायद तुम्हारा सूनापन दूर होने की शुरुआत यहीं से हो।
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