अय्यूब 23
पाठ
अय्यूब की शिकायत थमती नहीं। वह परमेश्वर को खोजता है, न इसलिए कि उनसे सांत्वना चाहिए, बल्कि इसलिए कि वह उनके सामने अपना मुकदमा रखना चाहता है: "भला होता, कि मैं जानता कि वह कहाँ मिल सकता है, तब मैं उसके विराजने के स्थान तक जा सकता!" पर चारों दिशाओं में वह परमेश्वर को खोजता है और कहीं नहीं पाता। फिर भी वह अपने चाल-चलन पर अड़ा रहता है, परमेश्वर की आज्ञाओं को अपनी भूख से भी अधिक कीमती मानता है, और अंत में फिर अंधकार में डूब जाता है, कांपता हुआ, पर पीछे हटे बिना।
मर्म
यह अध्याय एक विचित्र चीज़ करता है: यह परमेश्वर की अनुपस्थिति के अनुभव और परमेश्वर के प्रति वफ़ादारी को एक ही सांस में रखता है। अय्यूब यह नहीं कहता कि परमेश्वर नहीं हैं; वह कहता है कि वे नहीं मिलते। और उसी के साथ वह कहता है, "मेरे पैर उसके मार्गों में स्थिर रहे।" यहाँ नैतिक जीवन की जड़ उखड़कर एक नई जगह लगाई जा रही है। अय्यूब का आचरण अब इनाम के तर्क पर टिका नहीं है, क्योंकि इनाम छिन चुका है। वह ठीक चलता है जबकि ठीक चलने से कुछ नहीं मिल रहा। यही विश्वास की सबसे कठिन और सबसे शुद्ध परीक्षा है: क्या भलाई तब भी भलाई रहती है जब उसका कोई बाज़ार भाव न हो?
सूत्र
अय्यूब एक न्यायालय चाहता है जहाँ वह परमेश्वर के सामने खड़ा होकर बोल सके और सुना जाए: "क्या वह अपना बड़ा बल दिखाकर मुझसे मुकद्दमा लड़ता? नहीं, वह मुझ पर ध्यान देता।" यह आशा असाधारण है, क्योंकि वह शक्ति से नहीं, सुनवाई से न्याय की उम्मीद करता है। पूरे बाइबल की कहानी इसी असंभव इच्छा की ओर बढ़ती है: एक मध्यस्थ जो परमेश्वर के सामने खड़ा हो और मनुष्य का पक्ष ले। मसीह में वह न्यायालय खुल जाता है, पर उस तरह नहीं जैसे अय्यूब सोचता था। गतसमनी और गुलगुता में वही अंधकार दोहराया जाता है, और इस बार निर्दोष वास्तव में छोड़ा जाता है, ताकि दोषी सुने जाएँ।
दर्पण
ध्यान दीजिए कि अय्यूब की ईमानदारी कहाँ दिखती है: ऑफ़िस में, जहाँ ईमानदारी से रिपोर्ट देने पर प्रमोशन रुक जाता है; उस रिश्ते में, जहाँ आप सालों से देते आए हैं और लौटकर कुछ नहीं आया; उस बीमार शरीर में, जिसके लिए आपने प्रार्थना की और सन्नाटा मिला। हममें से ज़्यादातर लोग इन जगहों पर धीरे-धीरे समझौता कर लेते हैं, इसलिए नहीं कि हम बुरे हो गए, बल्कि इसलिए कि भलाई अब फ़ायदेमंद नहीं लगती। अय्यूब यह समझौता नहीं करता, और साथ ही वह अपनी शिकायत भी दबाता नहीं। वह दोनों करता है: सही चलता है और खुलकर गिला करता है। यह हमारी दोनों आदतों पर चोट है, भक्तिपूर्ण चुप्पी पर भी और कड़वे फिसलन पर भी।
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर वह एक काम लिखिए जो आप पिछले हफ़्ते सिर्फ़ इसलिए करने से हिचके क्योंकि उसका कोई फ़ायदा नहीं दिख रहा था, और आज उसी काम को दस मिनट के भीतर पूरा कर दीजिए, चाहे कोई देखे या न देखे।
अंतर्पाठ
पद 10 की गूँज सीधे 1 पतरस 1:7 तक जाती है, जहाँ विश्वास की परीक्षा आग में तपाए जाने वाले सोने से तुलना की जाती है। अंतर यह है कि अय्यूब यह बात बिना किसी पुनरुत्थान के भरोसे के कहता है; वह अंधेरे में से बोल रहा है, पतरस मसीह की जीत के इस पार से। दूसरी गूँज भजन संहिता 139 है, जहाँ यही चारों दिशाओं की खोज होती है, पर उल्टे अर्थ में: वहाँ कवि कहीं भी जाए, परमेश्वर उपस्थित हैं। अय्यूब कहीं भी जाए, वे नहीं मिलते। एक ही सच्चाई दो तरह से अनुभव होती है, और बाइबल दोनों अनुभवों को अपनी प्रार्थना-पुस्तक में जगह देती है।
प्रश्न
पद 13 से 16 को मीठा बनाने की कोशिश मत कीजिए। अय्यूब कहता है कि परमेश्वर जो चाहते हैं वही करते हैं, कोई उन्हें फिरा नहीं सकता, और इसी कारण वह घबराता है और कांपता है। यह "परमेश्वर संप्रभु हैं, इसलिए चिंता मत करो" वाला आराम नहीं है; यह वही संप्रभुता है जो डरावनी लगती है जब आप उसके नीचे कुचले जा रहे हों। पुस्तक इस डर को गलत नहीं ठहराती। अंत में परमेश्वर आते तो हैं, पर उत्तर नहीं, उपस्थिति देते हैं। शायद यही वह जगह है जहाँ हमें रुकना पड़ता है: परमेश्वर की स्वतंत्रता हमारी समझ से बड़ी है, और उस पर भरोसा करना और उससे डरना, दोनों एक साथ सच्चे हो सकते हैं।
परिचय
जिन लोगों ने यह पुस्तक पहली बार सुनी, वे एक ऐसी दुनिया में रहते थे जहाँ दुख का अर्थ साफ़ माना जाता था: पाप का फल। अय्यूब के मित्र इसी समझ के प्रवक्ता हैं। इसलिए अध्याय 23 उनके कानों में लगभग गुस्ताख़ी जैसा लगा होगा, क्योंकि एक पीड़ित आदमी अपने न्यायी के सामने मुकदमा लड़ने की बात कर रहा है, और कहता है कि वह "सदा के लिये छूट" जाएगा। पर साथ ही यह उन्हें आज़ाद भी करता था। निर्वासन और हार झेल चुके इस्राएल के लिए यह पुस्तक कहती थी: तुम्हारा दुख तुम्हारे पाप का सीधा हिसाब नहीं है, और परमेश्वर से शिकायत करना विश्वास छोड़ना नहीं है।
जिन जगहों पर आपकी ईमानदारी का कोई इनाम नहीं मिल रहा, वहाँ आप चुपचाप क्या छोड़ने लगे हैं?
अय्यूब शिकायत और आज्ञापालन दोनों एक साथ करता है; आप इनमें से किसे छोड़ देते हैं, और क्यों?
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Job 23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 23 का क्या अर्थ है?
अय्यूब 23 किस विषय में है?
अय्यूब 23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अय्यूब 23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 23 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अय्यूब अभी अभी कह चुका था, "परन्तु वह जानता है कि मैं कौन से मार्ग से चलता हूँ," और कुछ ही पंक्तियों बाद वही मुँह कहता है, "इस कारण मैं उसके सम्मुख घबरा जाता हूँ।" भरोसा और कँपकँपी एक ही दिल में साथ रह सकते हैं। तुम्हें हर डर मिटाकर ही परमेश्वर के पास नहीं आना है। काँपते हुए भी उसे पुकारना विश्वास ही है।
पिता, धन्यवाद कि आप मेरे मन को कठोर नहीं रहने देते। अय्यूब की तरह जब मेरा मन कच्चा हो जाता है और आपकी महिमा के सामने मैं घबरा जाता हूँ, तब भी आप मुझे छोड़ते नहीं। यह कोमल, झुका हुआ दिल आपका ही दिया हुआ उपहार है, और इसी में मैं आपके और पास खिंचा चला आता हूँ।
पिता, मेरे कदम तेरे रास्ते पर टिके रहें। जब चारों ओर से रास्ते बुलाते हैं और तू दिखाई नहीं देता, तब भी मुझे मुड़ने से बचा। मैं तेरी राह पर चलता रहूँ, भले ही धीरे चलूँ। मेरा मन तेरी बात थामे रहे।
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