अय्यूब 34
पाठ
एलीहू दूसरी बार बोलने खड़ा होता है, पर इस बार वह अय्यूब से नहीं, बल्कि आसपास बैठे "बुद्धिमानों" और "ज्ञानियों" से मुख़ातिब है, जैसे किसी पंचायत में वकील जूरी की ओर मुड़ जाता हो। वह अय्यूब के दो वाक्यों को सबूत के तौर पर पेश करता है, "मैं निर्दोष हूँ, और परमेश्वर ने मेरा हक़ मार दिया है", और फिर तर्क की एक लम्बी श्रृंखला खड़ी करता है: सर्वशक्तिमान अन्याय कर ही नहीं सकता, क्योंकि वही सारे जगत का प्रबन्ध करता है, उसकी आँखें हर चाल पर लगी हैं, और वह राजाओं तक को "तू नीच है" कह सकता है। निष्कर्ष कठोर है: अय्यूब को अन्त तक परखा जाना चाहिए।
मर्म
एलीहू की धर्मविद्या में कोई बड़ी गलती ढूँढ़ना कठिन है। परमेश्वर पक्षपात नहीं करता, धनी और कंगाल दोनों को "अपने बनाए हुए जानकर" देखता है, कंगालों की दुहाई सुनता है, और अगर वह अपना श्वास समेट ले तो सब देह मिट्टी हो जाए। यह सच है, और सुन्दर सच है। समस्या यह नहीं कि एलीहू क्या कहता है, बल्कि यह कि वह इसे किस पर चलाता है। वह सामान्य सत्य को एक विशेष आदमी के घाव पर रख देता है और दावा करता है कि समीकरण हल हो गया। पद 11, "वह मनुष्य की करनी का फल देता है", नीतिवचन का सत्य है, पर अय्यूब का जीवन ठीक वही अपवाद है जिसे यह सूत्र नहीं पकड़ पाता। परमेश्वर की न्यायप्रियता पर भरोसा करना एक बात है; उस भरोसे को दूसरों पर फ़ैसला सुनाने का औज़ार बना लेना दूसरी।
सूत्र
अय्यूब अदालत माँगता रहा है: एक मध्यस्थ, एक सुनवाई, एक मौका कि वह परमेश्वर के सामने अपनी बात रखे। एलीहू उसे यही कहकर चुप कराता है कि "उसने मनुष्य का कुछ समय नहीं ठहराया ताकि वह परमेश्वर के सम्मुख अदालत में जाए"। यानी सुनवाई होगी ही नहीं। यहीं पर पूरी बाइबल की कहानी एलीहू को काटती है। परमेश्वर बाद में स्वयं आँधी में से बोलते हैं, और अन्ततः मसीह में देहधारी होकर उस कटघरे में खड़े होते हैं जहाँ दोष हमारा था। अय्यूब जिस मध्यस्थ को तरसता है, वही क्रूस पर मिलता है। एलीहू का परमेश्वर दूर से राजाओं को गिराता है; सुसमाचार का परमेश्वर नीचे उतरकर पीड़ित के साथ खड़ा होता है।
दर्पण
हम सब में थोड़ा एलीहू बैठा है, ख़ासकर तब जब हम सही होते हैं। किसी सहकर्मी की नौकरी जाती है और भीतर कोई आवाज़ कहती है, "कुछ तो किया होगा।" किसी का विवाह टूटता है, किसी का बच्चा बिगड़ता है, किसी को कैंसर निकलता है, और हमारा मन तुरन्त कारण-और-फल की रस्सी बुनने लगता है, क्योंकि बुनी हुई रस्सी हमें सुरक्षित महसूस कराती है: अगर उसकी गलती थी, तो मेरे साथ ऐसा नहीं होगा। एलीहू का असली पाप बेरुख़ी नहीं, आत्मरक्षा है। वह अय्यूब को समझाने के बहाने अपने संसार को व्यवस्थित रख रहा है। ध्यान दीजिए, पद 7 में वह अय्यूब को "अनर्थ करनेवालों का साथ" देनेवाला कह देता है, एक ऐसे आदमी को जिसने अभी-अभी दस कब्रें देखी हैं।
आज ही, उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके दुःख के बारे में आपने मन ही मन कोई कारण गढ़ लिया है, और उस नाम के नीचे लिखिए: "मैं नहीं जानता।" फिर उसके लिए एक वाक्य में प्रार्थना कीजिए।
अन्तर्पाठ
पद 19 के साथ इब्रानी शब्द मिशपाट (न्याय, अधिकार, हक़) पूरे अध्याय में धड़कता है। रोमियों 2:11 में पौलुस ठीक यही कहता है, कि परमेश्वर किसी का पक्ष नहीं करता, पर वह इसे अहंकारी धर्मी लोगों के विरुद्ध मोड़ता है, पीड़ितों के विरुद्ध नहीं। यह फ़र्क़ सब कुछ बदल देता है। और अय्यूब 42 में परमेश्वर मित्रों से कहते हैं कि उन्होंने अय्यूब के समान ठीक बात नहीं कही, जबकि शब्दों के स्तर पर उनके धर्मसिद्धान्त त्रुटिहीन लगते थे। सही बात ग़लत जगह बोली जाए तो वह झूठ का काम करती है।
मुख्य पात्र
एलीहू जवान है और यह उसके हर वाक्य में सुनाई देता है। वह दो बार "मेरी सुनो" कहता है, वह जीभ और कान की उपमा से शुरू करता है जैसे कोई छात्र अपनी सबसे अच्छी पंक्ति पहले परोस देता हो, और वह बार-बार "सब ज्ञानी पुरुष मुझसे कहेंगे" कहकर काल्पनिक समर्थन जुटाता है। उसमें आग है, और आग में कुछ सच्चाई भी: उसे सचमुच बुरा लगता है कि परमेश्वर की निन्दा हो रही है। पर पद 36 में उसका उत्साह क्रूरता बन जाता है, "भला होता, कि अय्यूब अन्त तक परीक्षा में रहता"। यह एक ऐसे आदमी की इच्छा है जिसने कभी राख पर नहीं बैठा। धर्म के लिए जोश, करुणा के बिना, हमेशा दूसरे की पीड़ा को लम्बा खींचना चाहता है।
पाठकवर्ग
पहले सुननेवालों के लिए यह दृश्य परिचित था: नगर के फाटक पर बुज़ुर्ग बैठते, मामले सुने जाते, गवाह बुलाए जाते, और जो सबसे ठोस तर्क देता वही जीतता। एलीहू की भाषा उसी अदालत की भाषा है, और उसके श्रोता सिर हिलाते होंगे। उस संसार में बीमारी, दरिद्रता और सन्तान का मरना सार्वजनिक गवाही माने जाते थे, मानो परमेश्वर ने खुली अदालत में फ़ैसला सुना दिया हो। इसलिए अय्यूब की राख केवल शोक नहीं, सामाजिक कलंक थी। जब पद 20 कहता है कि आधी रात को प्रतापी लोग "बिना हाथ लगाए उठा लिए जाते हैं", तो श्रोता किसी गिरे हुए राजा की कहानी याद करके सिहर उठते। और ठीक इसी भीड़ के सामने, अन्त में, परमेश्वर अय्यूब को नहीं, उसके धर्मशास्त्रियों को डाँटते हैं।
चिन्तन
किस व्यक्ति के दुःख को आपने मन ही मन "समझा" दिया है, और उस व्याख्या से आपको कौन सी सुरक्षा मिल रही है?
जब आपका धर्मसिद्धान्त सही हो पर समय ग़लत, तो आप कैसे पहचानेंगे कि अब बोलना नहीं, बैठना है?
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Job 34 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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अय्यूब 34 का क्या अर्थ है?
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Job 34 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कठोर शब्द कभी पानी की तरह मुझ पर बरसते हैं और मैं उन्हें चुपचाप पी जाता हूँ। मेरे भीतर की चोट आप देखते हैं। मुझे कड़वाहट से बचाइए और मेरी जीभ को भी थामिए, कि मैं किसी और पर ऐसा बोझ न डालूँ। आपकी नज़र में मेरी पहचान काफ़ी है।
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