अय्यूब 38
पाठ
अय्यूब ने अध्यायों तक परमेश्वर को अदालत में बुलाया था; आखिरकार परमेश्वर आते हैं, पर आँधी में से, और गवाह के कठघरे में खड़े होने के बजाय वे स्वयं प्रश्न पूछने लगते हैं: "यह कौन है जो अज्ञानता की बातें कहकर युक्ति को बिगाड़ना चाहता है?" फिर एक के बाद एक प्रश्न आते हैं, जिनका उत्तर अय्यूब दे ही नहीं सकता: पृथ्वी की नींव किसने डाली, समुद्र के लिए किवाड़ किसने लगाए, भोर को आज्ञा किसने दी, हिम और ओलों के भण्डार कौन जानता है, कचपचिया के गुच्छे को कौन गूँथ सकता है। और अंत में परमेश्वर सबसे ऊँचे तारों से उतरकर सबसे साधारण भूख तक आते हैं: सिंहनी के बच्चों का पेट कौन भरता है, और भूखे कौवे के बच्चों को आहार कौन देता है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर अय्यूब के प्रश्न का उत्तर नहीं देते। दुःख क्यों आया, शैतान के साथ स्वर्ग में क्या हुआ, इसका एक शब्द भी नहीं। इसके बदले वे स्वयं को देते हैं। यही इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय है: पीड़ित मनुष्य को अंततः व्याख्या नहीं, उपस्थिति चाहिए। और यह उपस्थिति चापलूसी नहीं करती, वह अय्यूब से कहती है "पुरुष के समान अपनी कमर बाँध ले", यानी खड़ा हो, बात कर, मैं तुझे कीड़ा समझकर कुचल नहीं रहा। ये प्रश्न अपमान नहीं, निमंत्रण हैं: एक ऐसे संसार में जहाँ वर्षा वहाँ भी बरसती है "जहाँ कोई मनुष्य नहीं रहता", जहाँ कौवे के बच्चों की दुहाई सुनी जाती है। परमेश्वर की देखभाल मनुष्य के हिसाब-किताब से कहीं बड़ी है, और इसीलिए अय्यूब का दुःख उस देखभाल से बाहर नहीं गिरा है।
सूत्र
छठे पद पर रुकिए: "किसने उसके कोने का पत्थर बैठाया?" यह प्रश्न अय्यूब को चुप कराता है, पर बाइबल की पूरी कहानी में उसका उत्तर एक व्यक्ति है। जो सृष्टि की नींव पर कोने का पत्थर रखता है, वही बाद में स्वयं कोने का पत्थर बनकर मनुष्यों द्वारा ठुकराया जाता है। और आठवें से ग्यारहवें पद में परमेश्वर समुद्र से कहते हैं, "यहीं तक आ, और आगे न बढ़"; गलील की झील पर एक थका हुआ बढ़ई उठकर ठीक यही अधिकार बोलता है, और लहरें थम जाती हैं। शिष्यों का डर उसी कोटि का था जो अय्यूब पर आँधी में आया। पर सबसे गहरा जोड़ यह है: यहाँ परमेश्वर आँधी में से बोलते हैं, मसीह में वे मनुष्य की देह में से बोलते हैं। उत्तर व्याख्यान नहीं, अवतार है।
दर्पण
आप शायद वर्षों से एक ही प्रश्न लिए घूम रहे हैं। वह असफल इलाज, वह बच्चा जो लौटकर बात नहीं करता, वह नौकरी जो बिना कारण छिन गई, वह प्रार्थना जिसका उत्तर किसी और को मिला। और आपने, अय्यूब की तरह, मन में एक अदालत सजा रखी है जिसमें परमेश्वर को कठघरे में आना चाहिए। यह अध्याय उस अदालत को भंग नहीं करता, वह उसे बड़ा कर देता है। जिस संसार में वर्षा उस उजाड़ पर भी बरसती है जहाँ कोई देखने वाला नहीं, वहाँ आपकी बिना देखी पीड़ा भी बिना देखी नहीं है। अभिमान यह है कि हम समझे बिना भरोसा नहीं करना चाहते; कौवे के बच्चे बिना समझे भी खिलाए जाते हैं। आज शाम दस मिनट के लिए बाहर जाइए, आकाश की ओर देखिए, और ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से वह एक प्रश्न कहिए जो आपने कभी शब्दों में नहीं कहा; फिर पद 41 पढ़कर लौट आइए।
प्रश्न
ईमानदारी से: परमेश्वर अय्यूब को उत्तर नहीं देते। हमें पहले दो अध्यायों में पता है कि पर्दे के पीछे क्या हुआ, अय्यूब को कभी नहीं बताया जाता। क्या हिम के भण्डार और सिंहनी का अहेर किसी माँ के लिए पर्याप्त उत्तर हैं जिसका बेटा दफनाया गया? नहीं, तर्क के स्तर पर नहीं। इस पाठ को चिकना करने की जल्दी मत कीजिए। यहाँ जो मिलता है वह उत्तर नहीं, गवाही है: यह ब्रह्माण्ड किसी अंधे संयोग से नहीं, एक व्यक्ति की बुद्धि से चलता है, और वह व्यक्ति बोलता है। रहस्य बना रहता है। पर क्रूस के बाद रहस्य का रंग बदल जाता है: अब हम जानते हैं कि जो पूछताछ में हमसे ऊपर हैं, वे पीड़ा में हमसे नीचे उतर चुके हैं।
अंतर्पाठ
मरकुस 4 में झील पर आया तूफान इस अध्याय का सबसे सीधा प्रतिध्वनि है; शिष्य पूछते हैं कि यह कौन है जिसकी आज्ञा हवा और पानी मानते हैं, और अय्यूब 38 इसका उत्तर पहले ही दे चुका है, क्योंकि समुद्र को बेंड़े और किवाड़ लगाने वाला केवल एक है। दूसरा सूत्र यीशु के अपने मुँह से आता है: लूका 12 में वे चिंतित लोगों से कहते हैं कि कौवों को देखो, परमेश्वर उन्हें पालते हैं। यीशु अय्यूब 38 के अंतिम पद को उठाकर उसे सांत्वना में बदल देते हैं। जिस प्रश्न ने अय्यूब को चुप कराया था, वही वाक्य मसीह के मुँह में भयभीत मनुष्य के लिए आश्वासन बन जाता है।
श्रोता
पहले पाठकों के लिए समुद्र केवल पानी नहीं था, वह अराजकता का जीवित प्रतीक था; आसपास की जातियों की कहानियों में देवता समुद्र से लड़ते और मुश्किल से जीतते थे। यहाँ यहोवा लड़ते नहीं, वे समुद्र को नवजात शिशु की तरह बादल पहनाते हैं। यह सुनकर श्रोता के भीतर कुछ ढीला पड़ता होगा। इसी तरह कचपचिया और मृगशिरा, जिनके उदय-अस्त से लोग भाग्य पढ़ते थे, यहाँ केवल परमेश्वर के हाथ की डोर हैं; कोई अंधा भाग्यचक्र आपके जीवन पर शासन नहीं करता। और जिन्होंने अकाल और युद्ध देखे थे, उनके लिए यह सुनना कि ओले "संकट के समय और युद्ध और लड़ाई के दिन के लिये" रखे गए हैं, इतिहास को किसी के हाथ में रख देना था।
चिंतन
आप परमेश्वर से कौन सा प्रश्न पूछ रहे हैं, और यदि उत्तर के बदले केवल उनकी उपस्थिति मिले, तो क्या वह आपके लिए पर्याप्त होगी?
जिस समुद्र से आप डरते हैं, यदि मसीह उसी से कहते हैं "यहीं तक आ, और आगे न बढ़", तो आज आपके जीवन में उसकी सीमा कहाँ खिंचनी चाहिए?
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Job 38 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 38 का क्या अर्थ है?
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अय्यूब 38 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 38 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 38 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मैं बादलों को बुलाकर बारिश नहीं बरसा सकता, न अपनी ज़िंदगी की एक भी बात अपने हाथ में रख सकता हूँ। आज मैं यह मान लेता हूँ कि तू ही सब सँभालता है। जहाँ मेरी समझ खत्म होती है, वहाँ मुझे तुझ पर भरोसा करना सिखा।
पिता, धन्यवाद कि बिजलियाँ भी तेरी आज्ञा पर जाती हैं और तुझसे कहती हैं, "हम उपस्थित हैं।" जिस शक्ति को मैं थाम भी नहीं सकता, वह तेरे हाथ में है। इसलिए तूफ़ानी दिनों में भी मेरा मन शांत रह सकता है, क्योंकि सब कुछ तेरी आवाज़ सुनता है।
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