यूहन्ना 11
दो दिन की चुप्पी
खबर आती है: "हे प्रभु, देख, जिससे तू प्यार करता है, वह बीमार है।" संदेश में कोई माँग नहीं है, बस एक तथ्य। बहनें जानती हैं कि यीशु को बताना काफी है। और फिर वह वाक्य आता है जो पाठक की साँस रोक देता है: "यीशु मार्था और उसकी बहन और लाज़र से प्रेम रखता था। जब उसने सुना, कि वह बीमार है, तो जिस स्थान पर वह था, वहाँ दो दिन और ठहर गया।" प्रेम और देरी, एक ही साँस में। यूहन्ना यहाँ किसी उदासीन मसीह की तस्वीर नहीं दे रहा, बल्कि हमें उस गहरी बेचैनी के करीब ले जा रहा है जिसे हर विश्वासी कभी न कभी जानता है, कि प्रभु ने सुना, और फिर भी नहीं आए।
पाठ
बैतनिय्याह में लाज़र बीमार पड़ता है और मर जाता है। यीशु जान-बूझकर देर से पहुँचते हैं, चार दिन बाद, जब कब्र सील हो चुकी है। मार्था और मरियम दोनों अलग-अलग उससे मिलकर एक ही बात कहती हैं, "यदि तू यहाँ होता।" यीशु रोते हैं, फिर कब्र पर जाकर पत्थर हटवाते हैं और लाज़र को नाम लेकर बाहर बुलाते हैं। यह चिन्ह देखकर बहुत से विश्वास करते हैं, पर महासभा उसी दिन से उसे मार डालने की योजना बनाने लगती है।
मर्म
यह अध्याय एक चमत्कार से कहीं अधिक है। यीशु मार्था से कहते हैं, "पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ।" ध्यान दीजिए, वे यह नहीं कहते कि "मैं पुनरुत्थान दूँगा।" वे स्वयं वह पुनरुत्थान हैं। मार्था ने अपना विश्वास "अन्तिम दिन" पर टिका रखा था, एक दूर की धार्मिक आशा। यीशु उस आशा को दूर के भविष्य से खींचकर उसके सामने खड़ा कर देते हैं। मृत्यु अब भी वास्तविक है, लाज़र वास्तव में मरा, यीशु वास्तव में रोए, दुर्गन्ध वास्तविक थी। पर मृत्यु अब अन्तिम शब्द नहीं है। परमेश्वर की महिमा ठीक उसी जगह प्रकट होती है जहाँ मानवीय हर उम्मीद खत्म हो चुकी है, सील की गई कब्र के सामने।
सूत्र
लाज़र की कब्र से यीशु की अपनी कब्र तक की दूरी बहुत कम है। यह चिन्ह ही उन्हें मार डालने के निर्णय की ओर धकेलता है (पद 53)। जो दूसरों को जीवन देता है, वह स्वयं मरने की राह पर चल पड़ता है। कैफा की भविष्यद्वाणी, "एक मनुष्य लोगों के लिये मरे," इसी अध्याय में आती है, अनजाने में सुसमाचार का सार बोल दिया गया। लाज़र कफन में लिपटा हुआ बाहर आता है और उसे खोलना पड़ता है; कुछ हफ्तों बाद यीशु की कब्र में कफन तह किया हुआ पड़ा मिलेगा, किसी को उसे खोलने की जरूरत न होगी। लाज़र फिर मरेगा। यीशु फिर नहीं।
दर्पण
"यदि तू यहाँ होता।" यह वाक्य हर उस व्यक्ति के होंठों पर आता है जिसने प्रार्थना की और उत्तर देर से आया, या नहीं आया जैसा चाहा था। कैंसर की रिपोर्ट, टूटा हुआ विवाह, बेरोजगारी का लंबा दौर, बच्चा जो नास्तिक हो गया। हम मार्था की तरह धर्मशास्त्रीय रूप से सही उत्तर जानते हैं, "अन्तिम दिन में सब ठीक होगा।" पर यीशु उस सही उत्तर से संतुष्ट नहीं होते। वे उससे व्यक्तिगत विश्वास माँगते हैं, यहीं, अभी, इस बंद कब्र के सामने। और वे रोते हैं। यह छोटा-सा पद 35, "यीशु रोया," हमारे उस झूठ को तोड़ता है कि विश्वासी को दुख नहीं होना चाहिए। जो जिलाने वाला है, वही सबसे पहले रोता है।
अन्तर्पाठ
यहेजकेल 37 में सूखी हड्डियों की घाटी याद आती है, जहाँ परमेश्वर पूछते हैं, "क्या ये हड्डियाँ जी सकती हैं?" वहाँ भी शब्द से जीवन आया। लाज़र उस भविष्यद्वाणी का व्यक्तिगत, नाटकीय रूप है। दूसरी ओर, थोमा का वाक्य, "आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें," विडंबना से भरा है। थोमा नहीं जानता कि वह क्या कह रहा है, पर शिष्यत्व की परिभाषा उसने दे दी है। बाद में यही थोमा जी उठे प्रभु से कहेगा, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर।" जो मरने को तैयार था, वही जीवन को पहचानेगा।
संदर्भ
यूहन्ना के पहले पाठक ऐसे यहूदी और अन्यजाति विश्वासी थे जो मंदिर के विनाश के बाद जी रहे थे, जब यह प्रश्न जलता था, "क्या यीशु वाकई वह मसीहा है, या हमने गलत दाँव लगाया?" उनके लिए कैफा की गणना, "रोमी आकर हमारी जगह और जाति दोनों पर अधिकार कर लेंगे," कड़वी विडंबना थी, क्योंकि रोमी आ ही चुके थे, यरूशलेम गिर चुका था। मंदिर बचाने के लिए मसीह को मारा गया, पर मंदिर भी न बचा। पहले पाठकों ने समझा, असली मंदिर, असली जीवन, कब्र से बाहर निकलकर आया था, ईंटों में नहीं।
प्रश्न
यीशु ने जान-बूझकर देरी क्यों की? पद 15 में वे कहते हैं, "मैं तुम्हारे कारण आनन्दित हूँ कि मैं वहाँ न था।" यह वाक्य असहज करता है। क्या शिक्षा के लिए किसी मित्र को मरने देना उचित है? पाठ यहाँ हमें आसान उत्तर नहीं देता। शायद हमें यह मानना पड़ेगा कि परमेश्वर का समय हमारे समय जैसा नहीं है, और उनकी महिमा कभी-कभी हमारी राहत से बड़ी होती है। पर यह मानना उस दर्द को नहीं मिटाता जो
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John 11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 11 का क्या अर्थ है?
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यूहन्ना 11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
प्रभु यीशु, धन्यवाद कि मार्था जैसे आप का समाचार सुनते ही सब कुछ छोड़कर आपसे मिलने दौड़ पड़ी, वैसे ही आज मेरे दुःख की घड़ी में भी आप मुझसे मिलने आते हैं। धन्यवाद कि आप शोक में डूबे दिलों से दूर नहीं रहते, बल्कि पास आते हैं।
चेलों ने राहत की साँस ली, "हे प्रभु, यदि वह सो गया है, तो बच जाएगा।" उन्हें लगा अब यहूदिया जाने की जरूरत नहीं, खतरा टल गया। पर यीशु मौत की बात कर रहे थे। कितनी बार हम भी उसकी बातों में वही अर्थ ढूँढ़ते हैं जो हमें आसान रास्ता दे। सोचो, आज उसका कौन सा वचन तुमने अपनी सुविधा के हिसाब से समझ लिया है?
कैसा विचित्र दृश्य है। कैफा, जो उस साल का महायाजक था, परिषद में खड़ा होकर कहता है, "तुम कुछ भी नहीं जानते।" वह सोचता है कि वह यीशु की हत्या की योजना बना रहा है, पर असल में परमेश्वर उसके होठों से भविष्यवाणी करवा रहा है कि यीशु पूरी जाति के लिए मरेगा।
कभी सोचा है? जो लोग खुद को सबसे बुद्धिमान समझते हैं, वे अक्सर सबसे कम समझते हैं। और परमेश्वर इतना बड़ा है कि विरोधियों की जीभ से भी अपनी सच्चाई बोल देता है।
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