यूहन्ना 5
पाठ
बैतहसदा के कुण्ड के पाँच ओसारों में बीमारों की भीड़ पड़ी रहती है, और उनमें एक आदमी अड़तीस साल से। यीशु उससे एक अजीब सवाल पूछते हैं, उसे चंगा करते हैं, और चूँकि वह सब्त का दिन था, विवाद खड़ा हो जाता है। उसी विवाद में से यीशु का सबसे लंबा और सबसे साहसी भाषण निकलता है: पुत्र वही करता है जो पिता को करते देखता है, और उसका शब्द मुर्दों तक पहुँचता है।
मर्म
“क्या तू चंगा होना चाहता है?” यह सवाल पहली बार में लगभग निर्दयी लगता है। अड़तीस साल पड़े आदमी से पूछना कि क्या वह ठीक होना चाहता है? पर यीशु सूचना नहीं माँग रहे; वे कुछ जगा रहे हैं। आदमी का उत्तर भी सीधा “हाँ” नहीं है, बल्कि एक शिकायत है: “मेरे पास कोई मनुष्य नहीं।” और यहीं इस अध्याय का धर्मशास्त्र खुलता है। उद्धार पानी की हलचल में सबसे तेज़ दौड़नेवाले को नहीं मिलता। यहाँ कोई प्रतियोगिता नहीं जीती जाती। जीवन एक शब्द से आता है, बाहर से, बिना माँगे। बाद में यीशु कहते हैं कि “मृतक परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएँगे।” कुण्ड के किनारे जो हुआ, वह उसी बड़ी बात का छोटा नमूना है।
सूत्र
ध्यान दीजिए, यीशु अपने बचाव में सब्त के नियम की व्याख्या नहीं करते। वे कहते हैं: “मेरा पिता परमेश्वर अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूँ।” यह तर्क नहीं, दावा है। सृष्टि के सातवें दिन परमेश्वर ने विश्राम किया, पर उन्होंने संसार को चलाना बंद नहीं किया; वे आज भी जिलाते और सँभालते हैं। यीशु स्वयं को उसी अटूट कार्य के भीतर रखते हैं। और अंत में वे मूसा की ओर इशारा करते हैं: “उसने मेरे विषय में लिखा है।” पूरा पुराना नियम, कुण्ड के किनारे खड़े इस आदमी की तरह, किसी के आने की प्रतीक्षा में है। शास्त्र गवाही है, मंज़िल नहीं। मंज़िल एक व्यक्ति है।
दर्पण
“मेरे पहुँचते-पहुँचते दूसरा मुझसे पहले उतर जाता है।” यह वाक्य कितने लोगों की ज़िंदगी का सारांश है। दफ़्तर में वह पदोन्नति जो किसी और को मिली। वह रिश्ता, वह घर, वह स्वास्थ्य जो दूसरों को सहज मिला और आपको नहीं। धीरे-धीरे शिकायत पहचान बन जाती है, और खाट सुरक्षित लगने लगती है, क्योंकि उठने का मतलब है ज़िम्मेदारी। यीशु का सवाल आपकी ओर मुड़ता है: क्या आप सचमुच चंगे होना चाहते हैं, या आप उस पहचान से इतने जुड़ चुके हैं कि चंगाई डराती है? और दूसरा दर्पण उन धार्मिक लोगों में है जो चलते हुए आदमी को देखकर सिर्फ़ खाट देख पाए। शास्त्र में ढूँढ़ना, पर जीवन के पास आना न चाहना, यह आज भी संभव है।
आज ही, दस मिनट में: वह एक शिकायत जो आप वर्षों से मन में दोहराते आए हैं, उसे कागज़ पर एक वाक्य में लिखिए, और उसके नीचे लिखिए, “प्रभु, क्या आप मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या मैं चंगा होना चाहता हूँ?” फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
श्रोताओं का चेहरा
यूहन्ना का पहला पाठक-समूह ऐसे यहूदी विश्वासी थे जिन्हें आराधनालय से बाहर किया जा रहा था। उनके लिए यह अध्याय ठंडा इतिहास नहीं था। वे जानते थे कि सब्त तोड़ने का आरोप क्या वज़न रखता है, और यह भी कि “परमेश्वर को अपना पिता” कहना कान में कैसे चुभता है। उन्होंने पद 18 पढ़ते समय अपनी ही स्थिति पहचानी होगी: यीशु को मानने की क़ीमत समुदाय से कट जाना है। और पद 44 उन्हें सीधे चुभा होगा, “तुम जो एक दूसरे से आदर चाहते हो।” धार्मिक समाज में इज़्ज़त खोने का डर विश्वास का सबसे चुपचाप शत्रु है। उन्हें यही आश्वासन चाहिए था कि यीशु का शब्द कब्रों तक पहुँचता है, तो आराधनालय के दरवाज़े तक भी।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में यीशु का चित्र दो रंगों में है, और दोनों साथ रहते हैं। एक ओर वे भीड़ में से उस एक को चुनते हैं जिसका कोई नहीं, बिना उसके विश्वास की परीक्षा लिए, बिना शर्त। दूसरी ओर वे विवाद में पीछे नहीं हटते और ऐसे शब्द बोलते हैं जो उनकी मृत्यु का कारण बनेंगे। पर सबसे अनोखा यह है: “पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता।” जो व्यक्ति स्वयं को परमेश्वर के तुल्य ठहरा रहा है, वही अपनी पूर्ण निर्भरता स्वीकार करता है। यीशु का अधिकार स्वतंत्रता से नहीं, प्रेम में डूबी आज्ञाकारिता से निकलता है। पिता दिखाते हैं, पुत्र देखता है, पुत्र करता है। यह ईश्वरत्व की ऐसी छवि है जिस पर हम बहुत कम देर ठहरते हैं।
पृष्ठभूमि
घटना यरूशलेम में, किसी पर्व के समय, यानी उस शहर में जब वह तीर्थयात्रियों से भरा हो। बैतहसदा भेड़-फाटक के पास था, मंदिर के लिए बलि के पशु वहीं से लाए जाते थे। यानी बलि के जानवरों के रास्ते पर ही बीमारों का जमघट पड़ा रहता था, धर्म के केंद्र के इतने पास और उससे इतना बाहर। बीमारी उस समाज में सिर्फ़ शरीर की बात नहीं थी; वह अशुद्धता, भिक्षा और सामाजिक अदृश्यता भी थी। अड़तीस साल का अर्थ है: यह आदमी किसी की स्मृति में स्वस्थ नहीं रहा। और सब्त, जो इस्राएल की पहचान का चिह्न था, उसी दिन उसे उठकर चलने को कहा जाता है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन की कौन-सी “खाट” इतनी परिचित हो चुकी है कि उसे छोड़ने का विचार भी असहज लगता है, और क्यों?
पद 39 और 40 को धीरे से दोबारा पढ़िए: क्या आपका बाइबल पढ़ना आपको यीशु के पास ले जाता है, या उनके इर्द-गिर्द घुमाकर छोड़ देता है?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
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John 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यूहन्ना 5 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 5 किस विषय में है?
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यूहन्ना 5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 5 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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