विषय

उद्धार क्या है और कैसे प्राप्त होता है

परिचय

एक अस्पताल के बरामदे में एक स्त्री बैठी थी। उसका बेटा भीतर वेंटिलेटर पर था। किसी ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, "चिंता न करो, तुम्हारे कर्म अच्छे हैं, परमेश्वर देख रहा है।" उसने सिर उठाकर पूछा, "और अगर मेरे कर्म अच्छे नहीं हैं तो?" उस एक सवाल में मनुष्य का सबसे पुराना डर छिपा है। हम सब भीतर से जानते हैं कि हमारे भीतर कुछ टूटा हुआ है, और हम सब चुपचाप उम्मीद करते हैं कि कोई हमें बचा ले।

बाइबल इस उम्मीद को खारिज नहीं करती। वह उसे नाम देती है: उद्धार। इस पृष्ठ पर आप जानेंगे कि उद्धार असल में क्या है, बाइबल के पहले पन्ने से अंतिम पन्ने तक यह कहानी कैसे बढ़ती है, कौन-सी गलतफहमियाँ लोगों को उलझाए रखती हैं, और सबसे ज़रूरी बात, यह उद्धार आज, इस समय, आपको कैसे मिल सकता है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लोग उद्धार को आत्म-सुधार की सीढ़ी समझते हैं: थोड़ा और सुधर जाओ, थोड़े और अच्छे बन जाओ, तो परमेश्वर मान जाएँगे। यह पृष्ठ एक दूसरे कोण से लिखा गया है: उद्धार सुधरने का नाम नहीं, बचाए जाने का नाम है। इब्रानी और यूनानी भाषा में जिन शब्दों से "उद्धार" बना है, उनका मूल अर्थ ही है छुड़ाना, खींचकर बाहर निकालना, बचा लेना। डूबते हुए आदमी को तैराकी का पाठ नहीं दिया जाता, उसे हाथ पकड़कर बाहर खींचा जाता है। बाइबल हमें बीमार नहीं, बल्कि पापों में मरा हुआ कहती है। और मुर्दा अपने आप को नहीं सुधार सकता; उसे जिलाया जाना पड़ता है। यही फर्क सब कुछ बदल देता है।

बाइबल उद्धार के बारे में क्या कहती है?

बाइबल उद्धार की बात कभी हवा में नहीं करती। वह पहले बताती है कि खतरा क्या है। रोमियों 6:23 इस खतरे को एक वाक्य में रख देता है: "क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन है।" ध्यान दीजिए, यहाँ दो शब्द आमने-सामने खड़े हैं: मजदूरी और वरदान। मजदूरी वह है जो हम कमाते हैं; वरदान वह है जो हमें दिया जाता है। पाप की कमाई हमारे हाथ में है, और वह कमाई मृत्यु है। जीवन हमारी कमाई नहीं हो सकता, वह केवल भेंट हो सकता है।

फिर बाइबल बताती है कि बचाने वाला कौन है। यूहन्ना 3:16 कहता है: "क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा, कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।" यह पद उद्धार को परमेश्वर के हृदय से जोड़ता है। उद्धार किसी सौदे का नतीजा नहीं है, न किसी दबाव का। यह प्रेम की पहल है। परमेश्वर ने कुछ माँगा नहीं, उन्होंने दिया, और जो दिया वह अपना एकलौता पुत्र था।

तीसरी बात, बाइबल साफ करती है कि यह उद्धार किस तरह हमारे पास आता है। इफिसियों 2:8 में लिखा है: "क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है।" यहाँ तीन चीज़ें एक साथ हैं: अनुग्रह वह स्रोत है, विश्वास वह हाथ है जो पकड़ता है, और दान वह स्वभाव है जिससे यह मिलता है। ध्यान रहे, विश्वास भी हमारी उपलब्धि नहीं है; यह उस भिखारी का खुला हाथ है जिसके पास देने को कुछ नहीं। तीतुस 3:5 इसे और स्पष्ट करता है: "उसने हमारा उद्धार किया: और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार, नये जन्म के स्नान, और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ।" यह पद हमारे दृष्टिकोण की जड़ है। परमेश्वर हमें मरम्मत नहीं करते, वे नया जन्म देते हैं।

चौथी बात, बाइबल उद्धार के मार्गों की गिनती नहीं करती, वह एक ही नाम पर उँगली रखती है। प्रेरितों के काम 4:12 में पतरस यरूशलेम की सभा के सामने खड़ा होकर कहता है: "और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं, क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।" यह वाक्य आज के कानों को कठोर लगता है, पर बचाव-कार्य में यही सबसे बड़ी दया होती है: डूबते हुए व्यक्ति को यह बताना कि रस्सी किस तरफ लटक रही है।

और अंत में, बाइबल यह भी बताती है कि उद्धार हमारे मुँह और मन तक कैसे पहुँचता है। रोमियों 10:9 कहता है: "कि यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा।" मन का विश्वास और मुँह का अंगीकार, भीतर की सच्चाई और बाहर की स्वीकृति। इसी क्रम में मरकुस 16:16 का वचन आता है: "जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करे वह दोषी ठहराया जाएगा।" गौर कीजिए, दोषी ठहराए जाने का कारण बपतिस्मा न लेना नहीं, विश्वास न करना बताया गया है। बपतिस्मा उस विश्वास का सार्वजनिक चिह्न है, जैसे अँगूठी विवाह का चिह्न होती है।

डूबते हुए को तैराकी का पाठ नहीं, एक हाथ चाहिए।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

उद्धार बाइबल का कोई एक अध्याय नहीं, यह उसका पूरा कथानक है। और यह कथानक हर बार एक ही ढाँचे में चलता है: मनुष्य फँसता है, परमेश्वर आते हैं और छुड़ाते हैं।

उत्पत्ति के तीसरे अध्याय में मनुष्य गिरता है, और वहीं परमेश्वर पहला वादा करते हैं कि स्त्री का वंश सर्प के सिर को कुचल डालेगा। पाप की खबर के साथ ही बचाव की खबर आ जाती है। जलप्रलय के समय नूह ने अपने आप को पानी से नहीं बचाया; उसे एक जहाज़ का नक्शा दिया गया और उसमें बुलाया गया। मिस्र में इस्राएल ने अपनी गुलामी से खुद को आज़ाद नहीं किया; उन्होंने मेम्ने का लहू द्वार की चौखट पर लगाया और भीतर बैठे रहे, और मृत्यु उनके घर के ऊपर से निकल गई। लाल समुद्र के किनारे मूसा ने लोगों को हथियार उठाने को नहीं कहा, उन्होंने कहा कि चुप रहकर देखो कि परमेश्वर तुम्हारे लिये क्या करते हैं। यह पूरे पुराने नियम की भाषा है: उद्धार कुछ ऐसा है जो परमेश्वर करते हैं और मनुष्य ग्रहण करता है।

रूत की पुस्तक में यह चित्र और कोमल हो जाता है। एक विधवा, विदेशी, बिना अधिकार, बिना भविष्य। उसे बोअज़ नाम का "छुड़ानेवाला कुटुम्बी" मिलता है, जो कीमत चुकाकर उसे अपने घर में ले आता है। यह शब्द बाइबल की शब्दावली में गहरा है, क्योंकि यही काम मसीह हमारे लिए करते हैं: कीमत चुकाकर अपना बना लेना।

भविष्यद्वक्ताओं के पास आते ही यह सूत्र एक व्यक्ति की ओर मुड़ जाता है। यशायाह 53:5 में लिखा है: "परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे ही अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; उसी के मार खाने से हमें शान्ति मिली, और उसी के कोड़े खाने से हम चंगे हुए।" सात सौ साल पहले लिखे ये शब्द उस दिन की ओर इशारा करते हैं जब उद्धार का काम मंदिर की वेदी पर नहीं, गुलगुता की एक लकड़ी पर पूरा हुआ।

नया नियम इस सूत्र को नाम दे देता है। स्वर्गदूत यूसुफ से कहता है कि बालक का नाम यीशु रखा जाए, "क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा" (मत्ती 1:21)। यीशु स्वयं अपने आने का उद्देश्य बताते हैं: "क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया है" (लूका 19:10)। क्रूस पर उनके अंतिम शब्द "पूरा हुआ" किसी हार की आह नहीं, एक पूरे हुए बचाव-कार्य की घोषणा है। इसके बाद प्रेरितों के काम में यह खबर यरूशलेम से निकलकर रोम तक फैलती है, और फिलिप्पी के जेलर के सवाल का जवाब बहुत सीधा है: "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा" (प्रेरितों के काम 16:31)।

और अंत में प्रकाशितवाक्य में हर जाति और भाषा की एक अनगिनत भीड़ खड़ी होकर पुकारती है, "उद्धार के लिये हमारे परमेश्वर का, जो सिंहासन पर बैठा है, और मेम्ने का जय-जयकार हो" (प्रकाशितवाक्य 7:10)। ध्यान दीजिए, अनंतकाल में भी कोई अपनी उपलब्धि की गिनती नहीं गिनाता। उद्धार का सारा श्रेय बचानेवाले को जाता है, बचाए गए को नहीं।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति: "मैं अच्छा इंसान हूँ, मेरा उद्धार हो जाएगा।" यह सबसे मीठी और सबसे खतरनाक गलतफहमी है। बाइबल अच्छाई को अस्वीकार नहीं करती, वह अच्छाई को नापने का पैमाना बदल देती है। रोमियों 3:23 कहता है, "इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।" पैमाना पड़ोसी नहीं, परमेश्वर की महिमा है। इफिसियों 2:9 इसी बात को आगे बढ़ाता है: "और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।" अगर उद्धार कर्मों से मिलता, तो स्वर्ग में प्रशंसा के गीत नहीं, आत्म-प्रशंसा के भाषण होते। अपने दृष्टिकोण की भाषा में कहें तो: मुर्दा अच्छे व्यवहार से जीवित नहीं होता।

दूसरी भ्रांति: "उद्धार का मतलब है मरने के बाद स्वर्ग जाना।" यह आधा सच है, और आधा सच अक्सर पूरे झूठ से ज़्यादा नुकसान करता है। बाइबल में उद्धार तीन काल में फैला है। यह अतीत में पूरा हुआ, जब मसीह ने क्रूस पर आपके दोष की कीमत चुकाई और आपने विश्वास किया। यह वर्तमान में चल रहा है, क्योंकि पवित्र आत्मा आपको भीतर से बदल रहे हैं; इसीलिए फिलिप्पियों 2:12 कहता है कि "डरते और काँपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।" और यह भविष्य में पूरा होगा, जब शरीर भी नया किया जाएगा। जो उद्धार को केवल मृत्यु के बाद का बीमा समझते हैं, वे आज की मुक्ति खो देते हैं: क्रोध से, नशे से, कड़वाहट से, आत्म-घृणा से आज ही छुटकारा मिलना शुरू होता है।

तीसरी भ्रांति: "रीति-रिवाज और बपतिस्मा अपने आप बचाते हैं।" मरकुस 16:16 को ध्यान से पढ़िए: "जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करे वह दोषी ठहराया जाएगा।" यीशु ने दूसरे हिस्से में बपतिस्मा को दोहराया नहीं। पानी विश्वास की गवाही है, विश्वास का विकल्प नहीं। क्रूस पर लटके डाकू ने बपतिस्मा नहीं लिया था, फिर भी उसे यह वचन मिला: "आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा" (लूका 23:43)। साथ ही, जिसने सच में विश्वास किया है वह बपतिस्मे से भागेगा भी नहीं, क्योंकि प्रेम आज्ञा मानना चाहता है।

चौथी भ्रांति: "अनुग्रह मुफ़्त है, तो जीवन जैसा चाहे जिओ।" यह उद्धार को समझने में सबसे बड़ी भूल है, क्योंकि यह मानती है कि परमेश्वर ने केवल हमारा रिकॉर्ड साफ किया, हमारा हृदय नहीं। पर तीतुस 3:5 "नये जन्म" और "नया बनाने" की भाषा बोलता है, और 2 कुरिन्थियों 5:17 घोषणा करता है: "इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गई हैं।" इसलिए याकूब 2:17 का वाक्य विरोध नहीं, पुष्टि है: "विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।" कर्म उद्धार की जड़ नहीं, उसका फल हैं।

अनुग्रह मुफ़्त है, पर सस्ता नहीं।

आज इसे जीवन में उतारना

अगर उद्धार बचाया जाना है, तो उसे ग्रहण करने का तरीका भी बचाए जाने वाले का तरीका होगा, न कि प्रदर्शन करने वाले का। इसका पहला कदम है ईमानदारी। जब तक हम मानते हैं कि हम अपने बल पर किनारे तक पहुँच सकते हैं, हम रस्सी नहीं पकड़ते। इसलिए प्रार्थना में परमेश्वर से अपनी असल हालत के बारे में झूठ बोलना बंद कीजिए। बाइबल इसे मन फिराना कहती है: यह केवल पछतावा नहीं, दिशा बदलना है।

दूसरा कदम है विश्वास, और विश्वास का मतलब भावना नहीं, भरोसा है। रोमियों 10:9 के अनुसार यह भरोसा दो बातों पर टिका है: यीशु प्रभु हैं, और परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया। आप इसे अपने शब्दों में कह सकते हैं, आँसुओं के साथ या बिना आँसुओं के, अस्पताल के बरामदे में या रसोई में खड़े होकर: "प्रभु यीशु, मैं अपने आप को नहीं बचा सकता। मैं आप पर भरोसा करता हूँ। मुझे अपना बना लीजिए।" रोमियों 10:13 का वादा साफ है: "क्योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।"

तीसरा कदम है इसे खुले में लाना, क्योंकि अंगीकार विश्वास का हिस्सा है। घर में बताइए, कलीसिया में बताइए, बपतिस्मा लीजिए। छिपा हुआ विश्वास लंबे समय तक जीवित नहीं रहता।

और फिर वह हिस्सा शुरू होता है जो जीवनभर चलता है। सोमवार की सुबह जब दफ़्तर में कोई आपका श्रेय ले लेता है, उद्धार पाया व्यक्ति बदला लेने की मजबूरी से आज़ाद है, क्योंकि उसकी पहचान उसके पद पर नहीं टिकी। जब पैसे की कमी गले तक आ जाती है, वह डर से लड़ सकता है, क्योंकि उसके पास वह भेंट है जो कोई बाज़ार नहीं दे सकता। जब परिवार में वही पुराना झगड़ा फिर उठता है, वह पहले क्षमा माँग सकता है, क्योंकि जिसे बहुत माफ़ किया गया है उसके लिए माफ़ करना असंभव नहीं रहता। जब अकेलेपन की रात लंबी हो जाती है, वह जानता है कि यूहन्ना 1:12 के अनुसार उसे "परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार" दिया गया है, और अनाथ होने का एहसास झूठ बोल रहा है। और जब शरीर बीमार पड़ता है और वह अपनी सीमाओं से टकराता है, तो उसकी आशा उसकी सेहत पर नहीं, उस पुनरुत्थान पर टिकी है जिसने उसे बचाया।

दर्पण

अब मैं सीधे आपसे बात करता हूँ। आपके भीतर कहीं एक तराज़ू लगा हुआ है, और आप बरसों से उसमें अपने अच्छे काम डालते आए हैं, यह उम्मीद करते हुए कि किसी दिन पलड़ा भारी हो जाएगा। सच बताइए, वह पलड़ा कभी भारी हुआ? या हर बार जब आप थोड़ा और नेक बनते हैं, आपके भीतर का दूसरा पलड़ा भी थोड़ा और भर जाता है?

यह पृष्ठ आपसे कह रहा है कि उस तराज़ू को उतार दीजिए। यह आपका नहीं है। आपने अपने बच्चों पर चिल्लाकर जो पछतावा किया, अपने जीवनसाथी से जो बात छिपाई, दफ़्तर के हिसाब में जो थोड़ी हेराफेरी की, इंटरनेट पर देर रात जो देखा और सुबह भूल जाने की कोशिश की, आपके शरीर से जो नफ़रत आप करते हैं, वह सब आपकी पहुँच से बाहर पहुँच चुका है, पर परमेश्वर की पहुँच से बाहर नहीं। रोमियों 5:8 का वाक्य आपके नाम के साथ पढ़िए: "परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम को इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।"

अब दूसरी तरफ भी देखिए, क्योंकि दर्पण दोनों तरफ दिखाता है। हो सकता है आप बरसों पहले उद्धार पा चुके हैं और अब उसे बीमे के कागज़ की तरह किसी अलमारी में रखकर भूल गए हैं। आपका रविवार सुरक्षित है, पर आपका बटुआ, आपका कैलेंडर और आपकी ज़ुबान अभी भी पुराने मालिक की सेवा कर रही है। बचाया जाना केवल डूबने से बचना नहीं है; यह किनारे पर लाकर एक नया काम सौंपा जाना भी है।

तो आज आप कहाँ खड़े हैं? पानी में, यह मानने से इनकार करते हुए कि आप डूब रहे हैं? या किनारे पर, यह भूलकर कि आपको किसने खींचा था?

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को उद्धार समझाने में सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम डर से शुरू करते हैं। बाइबल प्रेम से शुरू करती है, और हमें भी वहीं से शुरू करना चाहिए।

छोटे बच्चों के लिए सबसे सरल तस्वीर बचाव की है। एक बच्चा गहरे पानी में गिर जाता है और तैर नहीं सकता; कोई मज़बूत इंसान उसमें कूदकर उसे बाहर निकाल लाता है। फिर आप कह सकते हैं कि हमारे भीतर एक ऐसी गड़बड़ है जिसे हम खुद ठीक नहीं कर सकते, उसे बाइबल पाप कहती है, और यीशु हमें बचाने के लिए आए। यूहन्ना 3:16 की भाषा बच्चों के लिए बनी हुई लगती है: परमेश्वर ने प्रेम किया, परमेश्वर ने दिया, और जो भरोसा करता है वह जीवन पाता है। बच्चों को यह भी बताइए कि यह उपहार कमाया नहीं जाता, इसलिए उन्हें "काफ़ी अच्छा" बनने की दौड़ में नहीं दौड़ना है।

एक बात से बचिए: बच्चे से यह न कहिए कि परमेश्वर उसे तभी प्यार करेंगे जब वह आज्ञा मानेगा। इसे उलट दीजिए। परमेश्वर पहले प्यार करते हैं, और उस प्यार के कारण हम आज्ञा मानना चाहते हैं। यही अनुग्रह का व्याकरण है, और बचपन में सीखा गया यह क्रम जीवनभर काम आता है।

फेथ नेटवर्क पर इस विषय की अलग-अलग उम्र के अनुसार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के बच्चों के लिए, और बारह साल से बड़े किशोरों के लिए, जो अक्सर कठिन सवाल पूछते हैं और सीधे जवाब के हकदार हैं। परिवार में एक साथ पढ़ने के लिए वही सामग्री सबसे उपयोगी होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उद्धार का सही अर्थ क्या है?

बाइबल में उद्धार का मूल अर्थ है छुड़ाया जाना, बचाया जाना, खतरे से बाहर निकाला जाना। यह पाप के दोष से छुटकारा है, पाप की शक्ति से आज़ादी है, और अंत में मृत्यु से पूरी विजय है। रोमियों 6:23 इसे दो हिस्सों में रखता है: पाप की मजदूरी मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान मसीह में अनंत जीवन है। इसलिए उद्धार कोई धार्मिक उपाधि नहीं, बल्कि एक बचाव-कार्य का नतीजा है जिसमें बचाने वाला परमेश्वर हैं और बचाया जाने वाला मनुष्य।

क्या अच्छे कर्मों से उद्धार मिल सकता है?

नहीं, और यह बाइबल के सबसे स्पष्ट उत्तरों में से एक है। इफिसियों 2:8 कहता है कि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से उद्धार हुआ है, और यह हमारी ओर से नहीं, परमेश्वर का दान है। तीतुस 3:5 और साफ करता है कि यह "धर्म के कामों के कारण नहीं" हुआ। अच्छे कर्म बुरे नहीं हैं, वे बहुत ज़रूरी हैं, पर वे उद्धार की जड़ नहीं बल्कि फल हैं। जो पेड़ जीवित हो जाता है, वही फल लाता है।

मैं कैसे जान सकता हूँ कि मेरा उद्धार हो गया है?

निश्चय भावनाओं पर नहीं, परमेश्वर के वचन पर टिका है। 1 यूहन्ना 5:13 कहता है कि ये बातें इसलिए लिखी गई हैं कि विश्वास करने वाले जानें कि अनंत जीवन उनका है। अपने आप से तीन सवाल पूछिए: क्या मैं मसीह पर भरोसा करता हूँ और अपने कामों पर नहीं, क्या मेरे भीतर पाप के प्रति नई बेचैनी और परमेश्वर के प्रति नई भूख है, और क्या मैं उनकी संतान की तरह जीना चाहता हूँ? अगर हाँ, तो पवित्र आत्मा आपके भीतर काम कर रहे हैं।

उद्धार पाने के लिए मुझे ठीक-ठीक क्या करना पड़ेगा?

रोमियों 10:9 इसे सबसे सीधे शब्दों में रखता है: अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करना और अपने मन से विश्वास करना कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया। इसमें अपने पाप को मानना, उससे मुड़ना, और मसीह पर पूरा भरोसा करना शामिल है। कोई निर्धारित प्रार्थना का सूत्र नहीं है; परमेश्वर शब्दों की सुंदरता नहीं, हृदय की सच्चाई देखते हैं। इसके बाद बपतिस्मा, कलीसिया की संगति और वचन का पाठ इस नए जीवन को जड़ पकड़ने में मदद करते हैं।

क्या बपतिस्मा लेना उद्धार के लिए ज़रूरी है?

मरकुस 16:16 विश्वास और बपतिस्मा को एक साथ रखता है, पर दोषी ठहराए जाने का कारण केवल अविश्वास बताता है, बपतिस्मा न लेना नहीं। इसका अर्थ है कि उद्धार विश्वास से मिलता है, और बपतिस्मा उस विश्वास की सार्वजनिक गवाही है। क्रूस पर लटके डाकू को बपतिस्मा के बिना ही स्वर्गलोक का वचन मिला। साथ ही, जो सच में मसीह पर विश्वास करता है वह बपतिस्मे से बचने का बहाना नहीं खोजेगा, क्योंकि यह प्रभु की आज्ञा है और नए जीवन की पहली आज्ञाकारिता है।

रोमियों 10:9 का मतलब क्या है?

यह पद उद्धार के दो पहलू जोड़ता है: भीतर का और बाहर का। मन का विश्वास कहता है कि यीशु का पुनरुत्थान सच है, यानी क्रूस पर उनका काम स्वीकार किया गया और मृत्यु हार गई। मुँह का अंगीकार कहता है कि यीशु प्रभु हैं, यानी अब मेरे जीवन का मालिक मैं नहीं, वे हैं। इसलिए यह पद न केवल एक स्वीकारोक्ति है, बल्कि सत्ता का हस्तांतरण है। और इसका वादा शर्तों में उलझा नहीं है: "तो तू निश्चय उद्धार पाएगा।"

क्या उद्धार पाने के बाद वह खो सकता है?

बाइबल विश्वासी को गहरी सुरक्षा देती है। यीशु कहते हैं कि उनकी भेड़ों को कोई उनके हाथ से छीन नहीं सकता, और रोमियों 8:1 घोषणा करता है कि जो मसीह यीशु में हैं उन पर दंड की आज्ञा नहीं। साथ ही बाइबल हमें चेतावनी भी देती है कि विश्वास में बने रहें और केवल नाम का ईसाई होकर धोखे में न रहें। इन दोनों को यों जोड़िए: सच्चा उद्धार परमेश्वर के हाथ की पकड़ पर टिका है, हमारी पकड़ पर नहीं, और वही पकड़ हमें अंत तक चलने की शक्ति भी देती है।

उद्धार और मोक्ष में क्या अंतर है?

दोनों शब्द छुटकारे की बात करते हैं, पर उनका रास्ता और मंज़िल अलग है। जिन परंपराओं में मोक्ष की बात होती है, वहाँ आमतौर पर मनुष्य अपने कर्म, ज्ञान या तपस्या से मुक्ति की ओर बढ़ता है, और लक्ष्य व्यक्तिगत अस्तित्व से मुक्ति है। बाइबल का उद्धार परमेश्वर की पहल से शुरू होता है, मसीह की कीमत से पूरा होता है, और उसका लक्ष्य विलीन होना नहीं बल्कि जीवित परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत, प्रेमपूर्ण संबंध और नए शरीर में अनंत जीवन है।

क्या यीशु मसीह के बिना भी उद्धार संभव है?

बाइबल इस पर बहुत स्पष्ट है। प्रेरितों के काम 4:12 कहता है कि किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं, क्योंकि स्वर्ग के नीचे और कोई नाम नहीं दिया गया जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें। यीशु ने स्वयं कहा कि मार्ग, सच्चाई और जीवन वही हैं और उनके द्वारा ही कोई पिता के पास पहुँच सकता है। यह घोषणा दूसरों के प्रति घृणा से नहीं, बल्कि उस एक ही रास्ते की सच्चाई से निकलती है जिस पर परमेश्वर ने स्वयं अपनी जान लगाई।

जिन्होंने यीशु के बारे में कभी नहीं सुना, उनका क्या होगा?

बाइबल हमें दो बातों पर टिकाती है। पहली, परमेश्वर पूर्ण न्यायी हैं और किसी के साथ अन्याय नहीं करेंगे; वे हर व्यक्ति के अंतःकरण और सृष्टि की गवाही को जानते हैं। दूसरी, वे हर उपलब्ध रास्ते से लोगों तक अपनी खबर पहुँचाते हैं, और इसीलिए उन्होंने कलीसिया को भेजा है। जो प्रश्न परमेश्वर ने अपने हाथ में रखा है, उसे उन पर छोड़ दीजिए; और जो काम उन्होंने हमारे हाथ में दिया है, यानी खबर पहुँचाना, उसे टालिए मत।

क्या मेरे पाप इतने बड़े हैं कि उद्धार न मिले?

नहीं। बाइबल में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जहाँ किसी पश्चातापी व्यक्ति को उसके पाप के आकार के कारण लौटा दिया गया हो। हत्या करने वाला मूसा, अपने प्रभु का इनकार करने वाला पतरस, कलीसिया को सताने वाला पौलुस, ये सब उसी अनुग्रह से बचाए गए। मसीह की मृत्यु का मूल्य आपके पाप के बोझ से बहुत बड़ा है। जो आपके भीतर यह फुसफुसाता है कि आपके लिए बहुत देर हो चुकी है, वह आवाज़ परमेश्वर की नहीं है।

उद्धार, धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण में क्या फर्क है?

उद्धार पूरे बचाव-कार्य का नाम है, और उसके भीतर कई कदम हैं। धर्मी ठहराया जाना वह क्षण है जब परमेश्वर मसीह के कारण आपको निर्दोष घोषित करते हैं; यह अदालत की भाषा है और एक ही बार में पूरी हो जाती है। पवित्रीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें पवित्र आत्मा आपको जीवनभर मसीह के स्वरूप में बदलते हैं। और महिमा वह अंतिम कदम है जब शरीर भी नया किया जाएगा। शुरुआत, बीच और अंत, तीनों परमेश्वर के हाथ का काम हैं।

अंत में

अगर इस पूरे पृष्ठ से आपको एक ही बात याद रखनी हो, तो यह याद रखिए: उद्धार वह चीज़ नहीं जो आप बनकर कमाते हैं, वह वह चीज़ है जो आपके साथ की जाती है। परमेश्वर ने आपको सुधारने का प्रोजेक्ट शुरू नहीं किया, उन्होंने आपको जिलाने का काम किया। इसीलिए बाइबल पहले पन्ने से अंतिम पन्ने तक वही एक कहानी दोहराती है: मनुष्य फँसता है, और परमेश्वर उतरकर आते हैं।

उद्धार पाया नहीं जाता; वह दिया जाता है।

अब आगे कहाँ जाएँ? रोमियों की पत्री के तीसरे से आठवें अध्याय को धीरे-धीरे, कुछ हफ़्तों में पढ़िए, कलम हाथ में लेकर। यूहन्ना 3:16, इफिसियों 2:8, रोमियों 6:23, रोमियों 10:9, तीतुस 3:5 और प्रेरितों के काम 4:12 को कंठस्थ कर लीजिए, ताकि जब संदेह की रात आए तो अंधेरे में हाथ खाली न हो। और अगर आपने अभी तक वह हाथ पकड़ा नहीं है जो आपकी ओर बढ़ा हुआ है, तो इस पृष्ठ को बंद करने से पहले, अपने ही शब्दों में, प्रभु यीशु से कह दीजिए कि आप उन पर भरोसा करते हैं। वे इंतज़ार कर रहे हैं, और उनका वादा है कि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।

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अंतर्दृष्टि संपादकीय पर 2 राजाओं 21:26

अमोन अपने पिता की ही बारी में दफनाया गया, "उज्जा की बारी में अपनी कब्र में।" वही जगह, वही पाप,…

धन्यवाद संपादकीय पर 2 तीमुथियुस 2:12

पिता, धन्यवाद कि मेरा धीरज व्यर्थ नहीं जाता। तूने कहा है, "यदि हम धीरज से सहते रहेंगे, तो उसके साथ…

प्रार्थना संपादकीय पर हबक्कूक 2:9

पिता, मैं अक्सर अपनी सुरक्षा खुद बनाने की कोशिश करता हूँ, ऊँचा घोंसला, भरी हुई तिजोरी, और कभी कभी गलत…

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