यूहन्ना 7:37
मूल पाठ
झोपड़ियों के पर्व का आखिरी और सबसे बड़ा दिन है, मन्दिर का प्रांगण भीड़ से भरा है, और उसी शोर के बीच यीशु खड़े होते हैं और चिल्लाकर कहते हैं: "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आए और पीए।" कोई लम्बी दलील नहीं, कोई शर्त नहीं, कोई योग्यता की सूची नहीं। सिर्फ एक हालत बताई गई है, प्यास, और एक ही पता दिया गया है, "मेरे पास।" जो अध्याय अब तक उनकी उत्पत्ति, उनके अधिकार और उनके समय को लेकर बहस से भरा था, वह अचानक एक खुले निमंत्रण पर आ ठहरता है, जो किसी भी सुननेवाले को छाँटता नहीं।
केंद्रीय बात
इस एक वाक्य में परमेश्वर के काम करने का पूरा ढंग सिमट आया है। पहले ज़रूरत, फिर व्यक्ति, फिर तृप्ति। यीशु यह नहीं कहते कि जो पवित्र हो वह आए, या जो व्यवस्था जानता हो वह आए; पर्व के उसी दिन धार्मिक अगुवे उन लोगों को "श्रापित" कहनेवाले थे "जो व्यवस्था नहीं जानते" (पद 49)। यीशु ठीक उन्हीं को पुकारते हैं। अनुग्रह यहाँ कोई कोमल भावना नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी पुनर्व्यवस्था है: पात्रता की जगह प्यास ले लेती है। और ध्यान दीजिए कि वे किसी शिक्षा, किसी विधि या किसी मन्दिर की ओर संकेत नहीं करते, बल्कि अपनी ओर। जीवन कोई वस्तु नहीं जो वे बाँटते हैं; जीवन वे स्वयं हैं। यही यूहन्ना की पूरी पुस्तक का दावा है, और यहाँ वह एक बुलावे का रूप ले लेता है।
सूत्र
बाइबल की कहानी पानी के साथ शुरू होती है और पानी के साथ खत्म होती है। सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मँडराता है; जलप्रलय में पानी न्याय बनकर आता है; मरुभूमि में इस्राएल प्यास से मरने को होता है और चट्टान से पानी फूट पड़ता है; भविष्यद्वक्ता उस दिन का सपना देखते हैं जब यरूशलेम से जीवित जल बहेगा और सूखी धरती हरी होगी। यह सिर्फ एक सुन्दर चित्र नहीं, यह वाचा का चित्र है: परमेश्वर अपने लोगों को उस जगह ले जाते हैं जहाँ वे अपने बल पर जी नहीं सकते, ताकि वे उन्हीं से जीना सीखें। पर्व के आखिरी दिन यीशु खड़े होकर जो कहते हैं, वह इस पूरी धारा को अपने ऊपर मोड़ देता है। चट्टान अब एक व्यक्ति है। मरुभूमि की वह प्यास, निर्वासन की वह तड़प, भविष्यद्वाणियों की वह प्रतीक्षा, सब एक ही जगह पर आकर खुलती है।
दर्पण
प्यास एक ऐसी चीज़ है जिसे छिपाया नहीं जा सकता, पर हम कोशिश ज़रूर करते हैं। हम उसे व्यस्तता कहते हैं, महत्वाकांक्षा कहते हैं, थकान कहते हैं। आप सुबह जल्दी उठकर काम पर निकलते हैं, बच्चों की फीस का हिसाब लगाते हैं, अपने विभाग में अपनी जगह बचाए रखते हैं, रविवार को चर्च जाते हैं, और फिर भी रात में एक खालीपन बचा रह जाता है जिसके लिए आपके पास नाम नहीं। यीशु उस खालीपन को शर्म की बात नहीं मानते; वे उसे पता मानते हैं। जो आदमी कहता है "मुझे कुछ नहीं चाहिए" वह इस निमंत्रण के बाहर खड़ा है, इसलिए नहीं कि उसे मना किया गया, बल्कि इसलिए कि उसने खुद को प्यासों की सूची से काट दिया। धार्मिक लोगों का सबसे बड़ा खतरा यही है: हम पानी बाँटने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि खुद पीना भूल जाते हैं।
आज एक गिलास पानी भरकर अपने सामने रखिए, और पीने से पहले ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से कहिए कि आप किस बात के लिए सचमुच प्यासे हैं, एक वाक्य में, बिना उसे आध्यात्मिक भाषा में सजाए।
संदर्भ
झोपड़ियों का पर्व साल का सबसे उल्लासमय सप्ताह था। लोग अपने घर छोड़कर पत्तों की कच्ची झोपड़ियों में रहते थे, यह याद करने के लिए कि उनके पुरखे मरुभूमि में बिना छत, बिना खेत, सिर्फ परमेश्वर के भरोसे जिए थे। यह फसल कट जाने के बाद का पर्व था, यानी कृतज्ञता का, पर साथ ही अगली बारिश की प्रार्थना का भी। हर सुबह याजक सोने के घड़े में शीलोह के कुंड से पानी भरकर लाता, जुलूस के साथ मन्दिर लौटता, और वह पानी वेदी पर उँडेल देता, जबकि भीड़ खजूर की डालियाँ हिलाकर गाती थी। सातवें और आखिरी दिन यह जुलूस सात बार वेदी के चारों ओर घूमता था। ठीक उसी माहौल में, जब पानी की स्मृति और पानी की प्रार्थना दोनों हवा में थीं, यीशु खड़े होते हैं।
एक बारीकी
पाठ कहता है कि यीशु "खड़ा हुआ और पुकारकर कहा।" यूहन्ना में यीशु आमतौर पर बैठकर सिखाते हैं, शान्त स्वर में, अक्सर एक-एक व्यक्ति से। यहाँ वे खड़े होते हैं और चिल्लाते हैं। यह रब्बी की मुद्रा नहीं, यह भविष्यद्वक्ता की मुद्रा है, वही जो पुराने नियम में चौक पर खड़ा होकर पुकारता था। और यह पुकार भीड़ की आवाज़ के ऊपर उठाई गई है, वेदी पर उँडेले गए पानी के ठीक बाद या उसकी जगह पर। अनुग्रह यहाँ फुसफुसाता नहीं, वह चिल्लाता है। जो परमेश्वर छिपे रहने का इल्ज़ाम झेलते हैं, वे अपने निमंत्रण को इतना ज़ोर से बोलते हैं कि पर्व का शोर भी उसे दबा न सके। और यह पुकार अन्धाधुन्ध है: किसी नाम की सूची नहीं, बस "यदि कोई।"
मुख्य पात्र
इस अध्याय में यीशु लगातार सवालों के घेरे में हैं। उनके अपने भाई उन पर विश्वास नहीं करते, भीड़ बँटी हुई है, अगुवे सिपाही भेज चुके हैं, और पद 30 कहता है कि लोग उन्हें पकड़ना चाहते थे। एक ऐसे आदमी से आप सतर्कता की उम्मीद करेंगे, नपे-तुले शब्दों की, शायद थोड़ी कड़वाहट की। इसके बजाय वह सबसे भरे हुए दिन, सबसे खुली जगह पर, सबसे ऊँची आवाज़ में खुद को उन्हीं लोगों के लिए खोल देते हैं जिनमें से कुछ उन्हें मार डालना चाहते हैं। यही यीशु का आन्तरिक परिदृश्य है: खतरा उन्हें सिकोड़ता नहीं, बल्कि उदार बनाता है। और वे अपने बारे में एक असम्भव दावा करते हैं, कि मनुष्य की सबसे गहरी ज़रूरत उनके पास आकर पूरी होती है। कोई भला शिक्षक ऐसा नहीं कहता।
शास्त्र के भीतर गूँज
पाठ के हाशिये पर यशायाह 55:1 दिया गया है, और वह जान-बूझकर है। वहाँ परमेश्वर उन प्यासों को पुकारते हैं जिनके पास पैसा नहीं, और उन्हें बिना दाम पानी, दाखरस और दूध लेने को कहते हैं; यह बाबुल के निर्वासन में टूटे हुए लोगों से कहा गया था, यानी उनसे जो अपनी हालत के लिए खुद जिम्मेदार थे। यीशु उसी पुकार को अपने मुँह में रख लेते हैं, और यहीं वह बात खुलती है जो यूहन्ना पूरी पुस्तक में कह रहा है: जो आवाज़ भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा आई थी, वह अब शरीर में खड़ी है। दूसरी गूँज ज़करयाह की है, जिसने कहा था कि उस अन्तिम दिन यरूशलेम से जीवित जल निकलेगा और सब जातियाँ झोपड़ियों का पर्व मनाने आएँगी। यीशु उस पर्व के आखिरी दिन खड़े होकर कहते हैं कि वह स्रोत आ चुका है।
पहले सुननेवाले
वहाँ खड़ी भीड़ के कानों में उस सुबह का पानी अभी ताज़ा था। उन्होंने अभी-अभी याजक को वेदी पर घड़ा उँडेलते देखा था और बारिश के लिए प्रार्थना की थी, क्योंकि उनकी अगली फसल उसी पर टिकी थी। उनके लिए यह प्रतीक भूखे पेट से जुड़ा हुआ था, हमारी तरह सिर्फ भावना से नहीं। साथ ही वे रोम के अधीन जी रहे थे और हर पर्व पर यह याद आता था कि लौटने की भविष्यद्वाणियाँ अभी पूरी नहीं हुईं। जब एक गलीली कारीगर खड़ा होकर मन्दिर के प्रांगण में खुद को उस पानी की जगह रख देता है, तो यह उनके लिए केवल धर्मशास्त्रीय दावा नहीं था, यह उनके सूखे खेतों, उनकी दबी हुई आज़ादी और उनके अधूरे इतिहास पर किया गया दावा था। तभी पद 43 कहता है कि लोगों में फूट पड़ गई। ऐसी बात पर तटस्थ रहना सम्भव नहीं था।
कठिन प्रश्न
अगर निमंत्रण इतना खुला है, तो फिर भी इतने लोग प्यासे क्यों रह जाते हैं? हम में से बहुतों ने यीशु के पास आकर पिया है और फिर भी अगले हफ्ते वही सूखापन लौट आता है। पाठ इस पर झूठा आराम नहीं देता। वह दो शर्तें छिपाए हुए है जो शर्तें नहीं, पर सच हैं: आपको प्यासा होना कबूल करना पड़ता है, और आपको आना पड़ता है। दोनों बातें हमें भारी लगती हैं, क्योंकि पहली में हार माननी पड़ती है और दूसरी में जगह छोड़नी पड़ती है। शायद हमारा असली सवाल यह नहीं कि परमेश्वर पानी देते हैं या नहीं, बल्कि यह कि क्या हम रोज़ लौटकर पीने को तैयार हैं, या हम एक बार का ऐसा घूँट चाहते हैं जिसके बाद फिर कभी उनकी ज़रूरत न पड़े। उस अन्तिम तृप्ति का वादा है, पर वह अभी का नहीं है।
मनन के प्रश्न
आप अपनी प्यास को आमतौर पर किस नाम से पुकारते हैं, ताकि उसे प्यास न कहना पड़े?
झोपड़ियों का पर्व मरुभूमि की असुरक्षा को याद करता था; आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा इस समय बिना छत का है, और क्या आप उसे परमेश्वर पर निर्भरता के रूप में देख पा रहे हैं?
यीशु ने यह बुलावा चिल्लाकर दिया था, चुपके से नहीं; आपके आसपास कौन है जिसके सामने आप अपनी प्यास और उसका उत्तर खुलकर कहने से हिचकते हैं?
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प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
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John 7:37 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 7:37 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 7:37 किस विषय में है?
यूहन्ना 7:37 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 7:37 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 7:37 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि यीशु अपने भाइयों के दबाव में नहीं आए, बल्कि "गलील ही में रह गया।" आपके बेटे ने आपके ठहराए समय का इंतज़ार किया। इसके लिए आपका शुक्रिया, क्योंकि मेरी ज़िंदगी की देर भी आपके हाथ में है, और मुझे भीड़ की जल्दबाज़ी के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं।
पिता, धन्यवाद कि जब "सब कोई अपने अपने घर चले गए," तब भी आपकी योजना रुकी नहीं। धन्यवाद उस छत के लिए जो आपने हमें दी है, और इस बात के लिए कि जिनका इस जगत में कोई ठिकाना नहीं, उनके लिए मसीह स्वयं घर बन गए। हमारे विवाद और थकान के बाद भी आप जागते रहते हैं।
क्योंकि उसके भाई भी उस पर विश्वास नहीं करते थे।" जिन्होंने उसे बचपन से देखा, उसी घर में पले, वही उसे नहीं पहचान पाए। सोचो, यीशु भी अपने ही लोगों के बीच अकेला रहा। अगर तुम्हारा परिवार आज तुम्हारे विश्वास पर हँसता है, तो तुम अजीब नहीं हो। तुम उसी रास्ते पर हो जिस पर वह पहले चल चुका है। और याद रखो, बाद में यही याकूब कलीसिया का खम्भा बना।
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