यहूदा 1:24
पाठ
यहूदा अपनी पूरी चिट्ठी भटकाने वालों, झूठे शिक्षकों और न्याय की चेतावनियों से भरकर लिखता है, और अन्त में अचानक स्वर बदल जाता है। वह कहता है: "अब जो तुम्हें ठोकर खाने से बचा सकता है, और अपनी महिमा की भरपूरी के सामने मगन और निर्दोष करके खड़ा कर सकता है।" यानी जिस विश्वास के लिये उसने पाठकों से "पूरा यत्न" करने को कहा था, उसे थामे रखने की अन्तिम जिम्मेदारी उनके अपने कंधों पर नहीं टिकी है। कोई और है जो गिरने से रोकता है, और वही एक दिन उन्हें परमेश्वर की तेजोमय उपस्थिति में बिना किसी दोष के, और आनन्द से भरकर, खड़ा कर देगा। चेतावनी का पत्र आश्वासन के घुटनों पर आकर समाप्त होता है।
मूल मर्म
यह एक वाक्य में पूरा उद्धार-शास्त्र है। ध्यान दीजिए कि क्रिया का कर्ता कौन है: तुम नहीं, परमेश्वर। सारे पत्र में यहूदा ने मनुष्य की जिम्मेदारी पर जोर दिया है, विश्वास में उन्नति करो, प्रार्थना करो, अपने आपको परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो, दूसरों को आग में से झपटकर निकालो। और फिर वह वह रस्सी दिखा देता है जिससे ये सब लटके हुए हैं: वही परमेश्वर जो सुरक्षित रखता है (पद 1 में वे "यीशु मसीह के लिये सुरक्षित" हैं)। अनुग्रह यहाँ केवल क्षमा नहीं, बल्कि थामे रखने की शक्ति है। और लक्ष्य केवल नरक से बचना नहीं, बल्कि "निर्दोष" होकर महिमा के सामने खड़ा होना है, वह पवित्रता जो न्याय के दिन टिक सके। जिन्हें आग की चेतावनी दी गई, उन्हीं से कहा जा रहा है: तुम आनन्द के साथ खड़े किए जाओगे।
साझा सूत्र
यह पद परमेश्वर की बचाने की कहानी के दो सिरों को एक साथ पकड़ता है। पद 5 में यहूदा ने याद दिलाया कि प्रभु ने एक कुल को मिस्र से छुड़ाया, पर फिर विश्वास न लाने वालों को नाश कर दिया। छुटकारा शुरू हुआ था, पूरा नहीं हुआ। जंगल में गिरी हुई लाशें पूरे पत्र के पीछे खड़ी हैं। और अब, अन्तिम वाक्य में, यहूदा एक ऐसे परमेश्वर की ओर इशारा करता है जो केवल मिस्र से निकालता ही नहीं, बल्कि पूरे रास्ते थामे रखता है और अन्त में मंजिल पर पहुँचा देता है। वाचा का परमेश्वर वही है जो अपनी ओर से किया हुआ वादा निभाता है। मसीह में वह यात्रा अधूरी नहीं छूटती: जिसने बुलाया, वही "यीशु मसीह के लिये सुरक्षित" रखता है, और वही महिमा के सामने खड़ा करता है। निर्गमन का अधूरा सफर यहाँ पूरा होता है।
दर्पण
आप जानते हैं कि गिरना कैसा दिखता है। वह आदमी जो बीस साल कलीसिया में अगुआ रहा और फिर एक ईमेल, एक रिश्ता, एक झूठ के कारण सब खो बैठा। वह दोस्त जिसने बेटे की मृत्यु के बाद प्रार्थना करना छोड़ दिया। और रात के तीन बजे वह चुपचाप सवाल जो आपके भीतर भी उठता है: क्या मेरा विश्वास अन्त तक टिकेगा? क्या मैं ही वह न निकलूँ जो बीच रास्ते में लुढ़क जाए? इस डर का एक जुड़वाँ भाई है, घमंड: यह भरोसा कि मैं अनुशासित हूँ, मैं रोज़ पढ़ता हूँ, मुझे कोई खतरा नहीं। यहूदा दोनों को एक ही वाक्य से काटता है। जो बचाता है, वह आप नहीं हैं। और यही कारण है कि डरने की भी जरूरत नहीं।
आज रात सोने से पहले इस वाक्य को अपने नाम के साथ ऊँचे स्वर में कहिए: "परमेश्वर मुझे, [अपना नाम], ठोकर खाने से बचा सकते हैं, और मुझे निर्दोष करके खड़ा कर सकते हैं।" बस एक बार, पर आवाज़ निकालकर।
संदर्भ
यहूदा अपने आप को "यीशु मसीह का दास और याकूब का भाई" कहता है, यानी वह यीशु का सगा भाई है जो अपने को भाई नहीं, दास कहता है। वह किसी एक शहर की कलीसिया को नहीं, बल्कि ऐसी मंडलियों को लिख रहा है जहाँ घूमते-फिरते शिक्षक "चुपके से" भीतर आ गए हैं। ये लोग प्रेम-भोजों में साथ खाते-पीते हैं, यानी वे बाहर के दुश्मन नहीं, भीतर के मेहमान हैं। पहली सदी की छोटी घरेलू कलीसियाओं में पहचान-पत्र नहीं थे; आतिथ्य ही विश्वास का चिह्न था, और यही उसकी कमजोरी भी थी। इन झूठे शिक्षकों का संदेश आकर्षक था: अनुग्रह का मतलब है कि अब जीवन की पवित्रता से कोई फर्क नहीं पड़ता। इस वातावरण में, जहाँ डर और भ्रम दोनों थे, यहूदा का अन्तिम वाक्य किसी दीवार की तरह खड़ा किया गया है।
एक बारीकी
"निर्दोष" शब्द पर रुकिए। मूल यूनानी में यहाँ ἄμωμος (आमोमोस) है, और यह मंदिर की भाषा है: वह बलि का पशु जिसमें कोई दाग, कोई टूटी हड्डी, कोई खोट न हो। पुराने नियम में याजक बलि को उठाकर जाँचता था, और खोट वाला पशु वेदी पर नहीं चढ़ सकता था। अब यहूदा उसी शब्द को आप पर लगा देता है। पद 23 में उसने अभी-अभी "कलंकित" वस्त्र से घृणा करने को कहा था; दाग असली हैं, उन्हें हल्का नहीं किया जा रहा। पर वह जो आपको महिमा के सामने रखेगा, वही आपको बिना दाग का बनाएगा। आप जाँच में पास होने के लिए अपने आप को साफ नहीं कर रहे; आप उन हाथों में हैं जो साफ करते हैं और फिर प्रस्तुत करते हैं।
मुख्य पात्र
इस पद का नायक निस्संदेह परमेश्वर हैं, और यहूदा उनका परिचय एक ही विशेषता से कराता है: सामर्थ्य। "जो बचा सकता है", "जो खड़ा कर सकता है"। यह कोई इच्छा नहीं, क्षमता है। पद 25 में वे "हमारे उद्धारकर्ता" कहलाते हैं, और सारी महिमा और पराक्रम "हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा" उनका है। यानी वह सामर्थ्य हवा में नहीं तैरती, वह क्रूस और पुनरुत्थान से होकर हम तक आती है। ध्यान दीजिए, जिस परमेश्वर ने स्वर्गदूतों को अंधकार में बाँध रखा और सदोम को दृष्टान्त बना दिया, वही परमेश्वर हैं जो थामते हैं। न्याय करने वाली शक्ति और थामने वाली शक्ति दो अलग परमेश्वर नहीं हैं। यही इस वाक्य को सस्ता होने से बचाता है।
अन्तर्पाठ
पौलुस कुलुस्सियों को लिखता है कि मसीह ने अपनी देह की मृत्यु के द्वारा उन्हें पवित्र, निष्कलंक और निर्दोष बनाकर परमेश्वर के सामने उपस्थित करने के लिए मेल कराया; वही चित्र, वही न्यायालय, वही वेदी की भाषा। और इफिसियों में कलीसिया को ऐसी दुल्हन कहा गया है जिसमें कोई धब्बा या झुर्री न हो। मैं ये दोनों इसलिए जोड़ रहा हूँ क्योंकि वे दिखाते हैं कि यहूदा कोई निजी काव्य नहीं रच रहा; यह आरम्भिक कलीसिया का साझा विश्वास था कि उद्धार का अन्तिम दृश्य एक प्रस्तुति है। कोई आपको सामने लाता है। आप खुद चलकर नहीं आते, आप खड़े किए जाते हैं।
पहले पाठक
कल्पना कीजिए कि यह चिट्ठी किसी के घर में ऊँचे स्वर में पढ़ी जा रही है। कैन, बिलाम, कोरह, सदोम, अंधकार में बँधे स्वर्गदूत, डाँवाडोल तारे। सुनने वाले सिकुड़ते जा रहे हैं, क्योंकि जिन लोगों का वर्णन हो रहा है वे पिछले हफ्ते उनके साथ रोटी तोड़ रहे थे। और फिर वाक्य पलटता है। उनके कानों में "खड़ा करना" राजदरबार की भाषा थी: अभियुक्त राजा के सामने खड़ा किया जाता है, और वहाँ खड़े रहना ही जीवन है। जो गिर गया, वह दोषी है। यहूदा कहता है कि उस दिन तुम खड़े रहोगे, और गर्दन झुकाए नहीं, "मगन", यानी उछलते हुए आनन्द के साथ। चेतावनी सुनकर काँपते लोगों को अन्त में आशीर्वाद की तरह यह वाक्य दिया गया, और वे इसी के साथ घर लौटे।
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर ठोकर से बचा सकते हैं, तो मिस्र से छुड़ाए गए वे लोग क्यों नाश हुए? यहूदा स्वयं यह विरोधाभास सामने रखता है और उसे सुलझाता नहीं। ध्यान दीजिए कि पद 24 में "सकता है" लिखा है, "करेगा चाहे तुम कुछ भी करो" नहीं। और पद 21 में साफ कहा गया, "अपने आपको परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो।" दोनों वाक्य एक ही पत्र में, कुछ पंक्तियों के अन्तर पर। बाइबल इन्हें कभी एक-दूसरे में घोलकर आसान नहीं बनाती। मुझे लगता है इसका कारण यह है कि ये दोनों सत्य दो अलग जगहों पर काम करते हैं: घमंड के सामने चेतावनी खड़ी होती है, और डर के सामने आश्वासन। जो सोचता है कि वह गिर नहीं सकता, उसे पद 5 चाहिए। जो सोचता है कि वह टिक नहीं पाएगा, उसे पद 24 चाहिए। सवाल यह नहीं कि सिद्धान्त कैसे मिलते हैं, बल्कि यह कि आज आप कहाँ खड़े हैं।
चिंतन
आप अपने विश्वास के टिके रहने का श्रेय चुपचाप किसे देते हैं, अपने अनुशासन को या परमेश्वर के थामने को? आपकी प्रार्थनाओं की भाषा इसका क्या जवाब देती है?
"निर्दोष" शब्द सुनकर आपके मन में कौन सा दाग सबसे पहले आता है, और क्या आप मानते हैं कि परमेश्वर उसी को हटाकर आपको प्रस्तुत करेंगे?
यहूदा पद 22-23 में शंका करने वालों पर दया करने को कहता है। आपके आसपास वह कौन है जो इस समय लड़खड़ा रहा है, और इस सप्ताह आप उसके लिए पद 24 किस तरह बन सकते हैं?
Jude में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
The Message of 2 Peter and Jude
Contending for truth when false teaching sounds convincing.
2 Peter and Jude: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Early Christian Letters For Everyone
James, Peter, John and Jude in short accessible readings.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Jude 1:24 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यहूदा 1:24 का क्या अर्थ है?
यहूदा 1:24 किस विषय में है?
यहूदा 1:24 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यहूदा 1:24 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहूदा 1:24 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jude 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने कुड़कुड़ाने की जगह मेरे मन में संतोष रखा है। धन्यवाद कि मुझे लाभ के लिये मुँह देखा व्यवहार करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मेरी ज़रूरतें आप पूरी करते हैं। धन्यवाद कि घमण्ड की बातों के बदले आपने सच्चाई और नम्रता से बोलना सिखाया।
चुपके से हम में आ मिले हैं" यहूदा लिखता है। बाहर से हमला नहीं, भीतर की कुर्सियों पर बैठकर। खतरा यह था कि अनुग्रह को लुचपन में बदल दिया गया, यानी जिस क्षमा ने हमें आज़ाद किया, उसी को पाप का बहाना बना लिया गया। अपने आप से पूछो: क्या मैं किसी आदत को इसलिए पाले हूँ क्योंकि "परमेश्वर तो माफ कर ही देगा"? वह सोच बाहर से नहीं, मेरे अपने मन से चुपके से आती है।
पिता, मुझे ऐसा दिल दीजिए जो जोड़े, तोड़े नहीं। जहाँ मेरी बातों से दरार पड़ी हो, वहाँ मुझे माफी माँगने की हिम्मत दीजिए। मेरे भीतर अपनी आत्मा का काम कीजिए, ताकि मैं सिर्फ अपनी समझ और अपने स्वार्थ से न जिऊँ, बल्कि आपकी अगुवाई में चलूँ।
पिता, बीते समय की चेतावनियाँ मुझे डराने नहीं, जगाने के लिए हैं। जहाँ मेरा मन गलत राहों की ओर खिंचता है, वहाँ मुझे थाम ले। मुझे ऐसा जीवन दे जो तेरी पवित्रता से मेल खाए, और तेरी दया पर भरोसा करना सिखा।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें