यहूदा 1:20
पाठ
उन्नीसवीं आयत में यहूदा ने जिन लोगों का चित्र खींचा है, वे फूट डालनेवाले हैं, "शारीरिक लोग हैं, जिनमें आत्मा नहीं।" और ठीक उसी सांस में वह मुड़कर कहता है: "पर हे प्रियों।" यह मोड़ इस आयत की जान है। जो विनाश कर रहे हैं उनके सामने यहूदा अपने पाठकों को निर्माण का काम सौंपता है: अपने अति पवित्र विश्वास पर अपने आपको बनाते चले जाओ, और पवित्र आत्मा में प्रार्थना करते रहो। वाक्य यहाँ पूरा नहीं होता; यह आयत 21 की ओर झुकी हुई है, जहाँ असली आदेश आता है, "अपने आपको परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखो।" यानी बीसवीं आयत बताती है कि प्रेम में टिके रहना किस तरह दिखता है: निर्माण और प्रार्थना, दोनों साथ-साथ।
मूल भाव
यहाँ दो समूहों के बीच का अंतर नैतिकता का नहीं, आत्मा का है। जिनमें आत्मा नहीं, वे तोड़ते हैं; जिनमें आत्मा है, वे बनाते हैं और प्रार्थना करते हैं। ध्यान दें कि नींव वे स्वयं नहीं डालते। "अति पवित्र विश्वास" वही है जो आयत 3 में "पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था": यह परमेश्वर की ओर से दी गई सच्चाई है, कलीसिया की अपनी खोज नहीं। कृपा पहले आती है, परिश्रम बाद में, पर परिश्रम आता अवश्य है। और "पवित्र आत्मा में प्रार्थना" यह स्वीकारना है कि हम अपने ही बल से उस नींव पर खड़े नहीं रह सकते; जो परमेश्वर हमें सत्य देते हैं, वही हमें उस सत्य में साँस लेने की शक्ति भी देते हैं। बचाव का उत्तर बहस नहीं, बढ़ना है।
सूत्र
बाइबल में "बनाना" कोई तटस्थ शब्द नहीं है। परमेश्वर मंदिर बनवाते हैं, फिर वह मंदिर गिरता है, फिर भविष्यद्वक्ता एक नए घर का वादा करते हैं जिसे परमेश्वर स्वयं खड़ा करेंगे। यीशु मसीह इस चित्र को अपने ऊपर ले लेते हैं: वे कहते हैं कि वे अपनी कलीसिया बनाएँगे, और प्रेरित इसी भाषा में कलीसिया को एक इमारत कहते हैं जिसकी नींव मसीह हैं। यहूदा इसी परंपरा में खड़ा है। उसके विरोधी "जड़ से उखड़ गए" पेड़ हैं और "डाँवाडोल तारे" हैं, यानी बिना नींव के, बिना कक्षा के। उनके बीच विश्वासियों का काम यही है कि वे उसी नींव पर, जो एक ही बार सौंपी गई, चिनाई करते रहें। उद्धार का इतिहास एक निर्माणकार्य है जिसे परमेश्वर शुरू करते हैं और जिसमें वे हमें मजदूरी पर लगा देते हैं।
दर्पण
यहूदा की चिट्ठी उस समुदाय को लिखी गई है जहाँ गलत लोग अंदर घुस आए हैं, और ऐसे माहौल में सबसे स्वाभाविक बात यह होती है कि हमारी सारी ऊर्जा दूसरों की जाँच-पड़ताल में खर्च होने लगे। आप अपनी कलीसिया के बारे में सोचिए, अपने छोटे समूह के बारे में, अपने परिवार के उस रिश्ते के बारे में जो जहरीला हो गया है। कितना समय आपने पिछले महीने यह समझाने में लगाया कि कौन गलत है, और कितना समय अपने विश्वास की चिनाई में? यहूदा यह नहीं कहता कि खतरा काल्पनिक है; वह पंद्रह आयतें उसी खतरे पर खर्च करता है। पर जब वह उपाय बताता है, तो वह उँगली उठाने को नहीं कहता, बनाने को कहता है। आज उस एक व्यक्ति को, जिसके बारे में आपने इस हफ्ते शिकायत की थी, एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें केवल वह बात हो जो उसे मजबूत करे।
एक बारीकी
"अपनी उन्नति करते हुए" के पीछे जो शब्द है, वह चिनाई का शब्द है: किसी पड़ी हुई नींव के ऊपर पत्थर जोड़ते जाना। और यह बहुवचन में है। अंग्रेजी या हिंदी में पढ़ते हुए लगता है जैसे हर व्यक्ति अपने भीतर अकेले कुछ खड़ा कर रहा हो, पर यहूदा एक समुदाय को संबोधित कर रहा है जो एक-दूसरे को बनाता है। ईंट अकेली दीवार नहीं होती। आयत 12 में वही लोग "प्रेम-भोजों" में साथ खाते हैं पर केवल "अपना ही पेट" भरते हैं; वह भी सामूहिक जीवन है, पर उलटी दिशा में। एक ही मेज पर दो तरह के लोग बैठ सकते हैं: वे जो लेते हैं और वे जो चिनते हैं।
अंतर्पाठ
यहूदा की यह जोड़ी, निर्माण और आत्मा में प्रार्थना, इफिसियों की चिट्ठी में लगभग शब्दशः लौटती है। वहाँ पौलुस कलीसिया को परमेश्वर का भवन कहता है और अध्याय छह में, हथियारों की सूची के अंत में, कहता है कि हर समय आत्मा में प्रार्थना करते रहो। दोनों जगह संदर्भ एक-सा है: विरोध के बीच खड़ा रहना। यह संयोग नहीं कि आत्मा में प्रार्थना वहीं उभरती है जहाँ आक्रमण हो रहा हो। दूसरा प्रतिध्वनि रोमियों आठ में है, जहाँ पौलुस स्वीकार करता है कि हम नहीं जानते कि किस बात के लिए प्रार्थना करें, पर आत्मा हमारे भीतर से कराहकर विनती करते हैं। यहूदा के पाठकों की हालत ठीक वही है: वे भ्रमित हैं, उनके बीच फूट है, उन्हें शब्द नहीं सूझते। "पवित्र आत्मा में प्रार्थना" कोई विशिष्ट अनुभव का दावा नहीं, बल्कि उन लोगों की राहत है जिनके पास अपनी प्रार्थना भी पूरी नहीं है।
कठिन प्रश्न
यदि विश्वास "एक ही बार सौंपा गया" है, तो उस पर हम कैसे कुछ बना सकते हैं? और अगर हम खुद को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखते हैं, तो आयत 24 के उस परमेश्वर का क्या, जो "तुम्हें ठोकर खाने से बचा सकता है"? यहूदा इस तनाव को सुलझाता नहीं। वह दोनों वाक्य पाँच आयतों की दूरी पर रख देता है और हमें उनके बीच जीने के लिए छोड़ देता है। मुझे लगता है यह ईमानदारी है, चतुराई नहीं। जो सचमुच किसी को थामे हुए है, वह जानता है कि उसे थामने के लिए हाथ भी कसने पड़ते हैं, और यह भी जानता है कि अगर ऊपरवाला हाथ छूट जाए तो उसकी अपनी पकड़ किसी काम की नहीं। दोनों सच एक साथ रहते हैं।
मनन
आपका विश्वास पिछले साल में किस एक ठोस बात में "बना" है, और वह ईंट किसने रखी?
जब आपके पास प्रार्थना के शब्द नहीं होते, तब आप क्या करते हैं: चुप हो जाते हैं, या आत्मा पर भरोसा करके बैठे रहते हैं?
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Jude 1:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यहूदा 1:20 का क्या अर्थ है?
यहूदा 1:20 किस विषय में है?
यहूदा 1:20 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यहूदा 1:20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहूदा 1:20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jude 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने कुड़कुड़ाने की जगह मेरे मन में संतोष रखा है। धन्यवाद कि मुझे लाभ के लिये मुँह देखा व्यवहार करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मेरी ज़रूरतें आप पूरी करते हैं। धन्यवाद कि घमण्ड की बातों के बदले आपने सच्चाई और नम्रता से बोलना सिखाया।
चुपके से हम में आ मिले हैं" यहूदा लिखता है। बाहर से हमला नहीं, भीतर की कुर्सियों पर बैठकर। खतरा यह था कि अनुग्रह को लुचपन में बदल दिया गया, यानी जिस क्षमा ने हमें आज़ाद किया, उसी को पाप का बहाना बना लिया गया। अपने आप से पूछो: क्या मैं किसी आदत को इसलिए पाले हूँ क्योंकि "परमेश्वर तो माफ कर ही देगा"? वह सोच बाहर से नहीं, मेरे अपने मन से चुपके से आती है।
पिता, मुझे ऐसा दिल दीजिए जो जोड़े, तोड़े नहीं। जहाँ मेरी बातों से दरार पड़ी हो, वहाँ मुझे माफी माँगने की हिम्मत दीजिए। मेरे भीतर अपनी आत्मा का काम कीजिए, ताकि मैं सिर्फ अपनी समझ और अपने स्वार्थ से न जिऊँ, बल्कि आपकी अगुवाई में चलूँ।
पिता, बीते समय की चेतावनियाँ मुझे डराने नहीं, जगाने के लिए हैं। जहाँ मेरा मन गलत राहों की ओर खिंचता है, वहाँ मुझे थाम ले। मुझे ऐसा जीवन दे जो तेरी पवित्रता से मेल खाए, और तेरी दया पर भरोसा करना सिखा।
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