न्यायियों 20
पाठ
गिबा में हुए घिनौने अपराध के बाद दान से बेर्शेबा तक का सारा इस्राएल मिस्पा में इकट्ठा होता है, चार लाख तलवार चलानेवाले, और लेवीय अपनी कहानी सुनाता है। बिन्यामीन अपने अपराधियों को सौंपने से इन्कार करता है, और भाइयों के बीच युद्ध छिड़ जाता है: दो दिन इस्राएल हारता है और चालीस हजार पुरुष खो देता है, तीसरे दिन घात लगाकर गिबा को फूँक देता है। अंत में बिन्यामीन के केवल छः सौ पुरुष रिम्मोन नामक चट्टान में बचे रह जाते हैं।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर "चढ़ाई करो" कहते हैं और इस्राएल फिर भी हारता है। पहले दिन बाईस हजार, दूसरे दिन अठारह हजार। यह किसी सूत्र को तोड़ देता है जिसे हम चुपचाप मानते हैं: कि परमेश्वर की आज्ञा पर चलने का अर्थ है तुरंत जीत। इस्राएल का उद्देश्य सही था, "हम इस्राएल में से बुराई का नाश करें", पर जो हाथ सफाई करने आए थे वे स्वयं साफ नहीं थे। परमेश्वर केवल एक पक्ष नहीं लेते; वे दोनों पक्षों को तौलते हैं। और जब जीत आती है, तब पाठ बहुत सावधानी से कहता है: "तब यहोवा ने बिन्यामीनियों को इस्राएल से हरवा दिया।" फैसला सेना का नहीं, परमेश्वर का था। चार लाख की संख्या ने कुछ नहीं जीता।
सूत्र
बेतेल में पूछे गए प्रश्न का उत्तर है "यहूदा पहले चढ़ाई करे", ठीक वही शब्द जिनसे न्यायियों की पुस्तक शुरू होती है। पर अब यहूदा कनानियों के विरुद्ध नहीं, अपने भाई के विरुद्ध आगे बढ़ता है, और पहले लहू बहाता है। यहीं एक गहरा विरोधाभास खुलता है। लेवीय ने अपनी रखैल के टुकड़े-टुकड़े करके इस्राएल के हर भाग में भेजे, ताकि लोग युद्ध के लिए इकट्ठे हों। यहूदा के गोत्र से आनेवाले मसीह ने अपनी ही देह तुड़वाकर लोगों में बाँटी, ताकि लोग मेल के लिए इकट्ठे हों। एक ही चेष्टा, ठीक उलटी दिशा। और वे छः सौ बचे हुए पुरुष? उसी मिटने योग्य गोत्र से बाद में पौलुस आया, जो अपने को बिन्यामीनी कहता था। जो अनुग्रह न्याय को पूरी तरह पूरा होने से रोक देता है, वही अनुग्रह क्रूस का तर्क है।
दर्पण
इस अध्याय की सबसे खतरनाक बात उसका सबसे धार्मिक शब्द है: "एकमत"। जब कोई स्पष्ट रूप से गलत होता है, तब एकजुट होना बहुत सस्ता और बहुत नशीला लगता है। कलीसिया की समिति में, परिवार के उस झगड़े में जो बारह साल से चल रहा है, दफ्तर के उस समूह में जो एक व्यक्ति को अलग कर चुका है, या फोन पर उस बातचीत में जहाँ आप और आपका भाई मिलकर तीसरे का मूल्यांकन करते हैं। आप सही हो सकते हैं और फिर भी हार सकते हैं, क्योंकि जो चीज परमेश्वर तौलते हैं वह केवल आपका पक्ष नहीं, आपका हृदय भी है। आज यह कीजिए: उस व्यक्ति या समूह का नाम कागज पर लिखिए जिसे आप स्पष्ट रूप से दोषी मानते हैं, उसके लिए दो वाक्य की प्रार्थना कीजिए, और नीचे एक बात लिखिए जिसमें आप उसी जैसे हैं।
प्रश्न
परमेश्वर ने दो बार "चढ़ाई करो" कहा और दोनों बार इस्राएल कटकर गिरा। क्यों? पाठ नहीं बताता। और आयत 48 और भी भारी है: लौटकर इस्राएलियों ने नगरों में "क्या मनुष्य, क्या पशु" सब नाश कर डाला। यह वह आदेश है जो कनानी नगरों के लिए दिया गया था, और अब वह अपने भाई पर लागू किया जा रहा है। परमेश्वर ने अनुमति दी, पर कहीं यह नहीं लिखा कि उन्होंने इस सीमा तक जाने को कहा। न्यायियों की पुस्तक बहुत बार बताती है कि क्या हुआ, यह कहे बिना कि वह अच्छा था। इस बेचैनी को शांत करने का कोई ईमानदार रास्ता मुझे नहीं मिलता। परमेश्वर की सहमति और परमेश्वर की स्वीकृति एक ही चीज नहीं हैं, और यह अंतर पचाने में कड़वा है।
प्रसंग
राजा नहीं है। कोई केंद्रीय सत्ता नहीं, कोई न्यायालय नहीं, केवल गोत्रों का ढीला संघ जो संकट में मिस्पा या बेतेल में इकट्ठा होता है। वाचा का सन्दूक बेतेल में है और पीनहास सेवा कर रहा है, हारून का पोता, जो बताता है कि यह घटना न्यायियों के काल में बहुत आरंभ की है, यानी पुस्तक के अंत के ये अध्याय समय में पीछे ले जाते हैं। उस समाज में अतिथि की रक्षा पवित्र कर्तव्य थी और लहू का बदला गोत्र की जिम्मेदारी। इसीलिए गिबा का अपराध केवल अपराध नहीं, पूरे संघ की व्यवस्था पर हमला था। पर बिन्यामीन ने वंश की वफादारी को न्याय से ऊपर रखा, और वहीं से सब कुछ ढह गया।
विवरण
पूरी लड़ाई का मोड़ एक चिन्ह पर टिका है: "बहुत बड़ा धुएँ का खम्भा"। बिन्यामीनी पीछे मुड़कर देखते हैं और उनका नगर आकाश की ओर उड़ रहा है। इस्राएल की स्मृति में धुएँ का खम्भा एक और चीज थी, वह खम्भा जो मिस्र से निकलने पर आगे-आगे चलता था और मार्ग दिखाता था। तब वह उपस्थिति का चिन्ह था; यहाँ वही आकार न्याय का चिन्ह बन गया है। यही धुआँ बता रहा है कि परमेश्वर अपनी ही प्रजा के भीतर की बुराई को अनदेखा नहीं करते। और यही कारण है कि क्रूस पर उठा हुआ चिन्ह इतना आवश्यक है: वहाँ न्याय किसी नगर पर नहीं, स्वयं परमेश्वर के पुत्र पर गिरा।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सा झगड़ा है जिसमें आप निश्चित हैं कि आप सही हैं, और उस निश्चितता ने आपको क्या करने की छूट दे दी है?
यदि परमेश्वर की अनुमति और परमेश्वर की स्वीकृति एक नहीं हैं, तो आप अपने अगले बड़े निर्णय को कैसे परखेंगे?
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Judges 20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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न्यायियों 20 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
न्यायियों 20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Judges 20 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
प्रभु, जब अपने ही आमने सामने खड़े हो जाते हैं, तो दिल टूट जाता है। मुझे ऐसी लड़ाइयों में मत जाने दे जो बस गुस्से से शुरू होती हैं। मेरे मन को ठंडा कर, और जहाँ मेल कराना मुमकिन है, वहाँ मुझे पहला कदम उठाने की हिम्मत दे।
धन्यवाद, प्रभु, कि गिबा से उठता धुएँ का खम्भा आज भी हमें चेताता है कि पाप का अंत उजड़ना ही है। धन्यवाद कि आप न्यायी हैं और बुराई को सदा छिपी नहीं रहने देते। धन्यवाद कि हमें आज ही लौटने का अवसर दिया है, पीछे मुड़कर देखने से पहले।
इस प्रकार सब इस्राएली पुरुष उस नगर के विरुद्ध एकमत होकर एक पुरुष के समान इकट्ठे हुए।" न्यायियों की पूरी किताब में इस्राएल कभी इतना एक नहीं हुआ, न परमेश्वर की आराधना के लिए, न पाप से मुँह मोड़ने के लिए। पर अपने ही भाई के विरुद्ध लड़ने के लिए सब एक हो गए। सोचो, तुम्हारी एकता किस बात पर टिकी है? किसी के विरोध में जुड़ना आसान है, मसीह में जुड़े रहना कठिन।
पिता, हममें साहस दे कि हम पूछ सकें कि यह बुराई कैसे हुई, और सच को छिपाने के बजाय सामने रखें। जहाँ चुप्पी घाव को गहरा करती है, वहाँ हमें सच्चाई से बोलना सिखा, और टूटी बातों को सुधारने की समझ दे।
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