मरकुस 7:9
पाठ
यीशु फरीसियों और शास्त्रियों की ओर मुड़कर एक ऐसा वाक्य कहते हैं जो प्रशंसा जैसा सुनाई देता है पर असल में चोट है: "तुम अपनी परम्पराओं को मानने के लिये परमेश्वर की आज्ञा कैसी अच्छी तरह टाल देते हो!" यह तंज है, और तीखा तंज है। बात हाथ धोने से शुरू हुई थी, पर यीशु उसे वहीं नहीं छोड़ते; वे दिखाते हैं कि जो व्यवस्था परमेश्वर के वचन की रक्षा के लिए खड़ी की गई थी, वह व्यवहार में उसी वचन को दरकिनार करने का सुव्यवस्थित तरीका बन चुकी है। अगली आयतों में वे उदाहरण भी देते हैं: "कुरबान" की प्रतिज्ञा करके कोई अपने बूढ़े माता-पिता की सहायता से हाथ खींच सकता है, और वह धर्मनिष्ठ भी दिखता रहे। यीशु इसे मानवीय चालाकी नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन को रद्द करना कहते हैं।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यीशु ने कौन-सी आज्ञा चुनी। वे शब्बत या बलिदान का उदाहरण नहीं देते, बल्कि दस आज्ञाओं में से पाँचवीं: "अपने पिता और अपनी माता का आदर कर।" यह वही आज्ञा है जो परिवार के भीतर सबसे कमजोर व्यक्ति की रक्षा करती है, उस बूढ़े माँ-बाप की जिनके पास न कमाई है, न पेंशन, न आवाज़। धर्म का सबसे ख़तरनाक रूप यही है: जब वह पवित्रता की भाषा में बोलता हुआ किसी असहाय को भूखा छोड़ देता है। यशायाह का उद्धरण, जो यीशु ने अभी-अभी दिया था, ठीक इसी घाव पर उँगली रखता है: "ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझसे दूर रहता है।" परमेश्वर का वचन आज्ञापालन के लिए दिया गया है, बचाव की दीवार खड़ी करने के लिए नहीं; और जो वचन को अपनी सुविधा का औज़ार बना ले, वह उपासना नहीं, केवल उपासना का अभिनय कर रहा है।
साझा सूत्र
यीशु यहाँ कोई नई शिकायत नहीं उठा रहे। इस्राएल के भविष्यद्वक्ता सदियों से यही कहते आए थे कि परमेश्वर बलिदान से ज़्यादा आज्ञा मानना चाहते हैं; शमूएल ने शाऊल से ठीक यही कहा था, जब शाऊल ने अवज्ञा को उपासना के कपड़े पहनाकर पेश किया। परम्परा का दुरुपयोग बलिदान के दुरुपयोग का ही नया संस्करण है। और इसी कारण यीशु इस बहस को हृदय तक ले जाते हैं: थोड़ी देर बाद वे कहते हैं कि अशुद्धता बाहर से नहीं, "मनुष्य के मन से" निकलती है। यही यिर्मयाह की उस प्रतिज्ञा की दिशा है, जहाँ परमेश्वर व्यवस्था को पत्थर पर नहीं, मन पर लिखने का वादा करते हैं। मसीह उस वादे को पूरा करने आए हैं: वे नियमों की मरम्मत नहीं करते, वे उस जगह पर हाथ रखते हैं जहाँ से सारी अवज्ञा और सारी धार्मिक चालाकी जन्म लेती है।
दर्पण
हम में से कोई "कुरबान" शब्द इस्तेमाल नहीं करता, पर तरीका जाना-पहचाना है। सेवकाई की व्यस्तता के नाम पर घर में उपेक्षित पत्नी। "मैंने चर्च को दे दिया" कहकर बहन की आर्थिक ज़रूरत से मुँह मोड़ लेना। बूढ़े पिता का फोन, जिसे हम "अभी समय नहीं है" कहकर टालते हैं, जबकि समय उस चीज़ के लिए है जिसे हम आत्मिक कहते हैं। यीशु की चोट यही है: हमारी सबसे ऊँची भाषा अक्सर हमारी सबसे नीच उपेक्षा को ढँकने के काम आती है। और सबसे डरावनी बात यह कि यह सब बिल्कुल ईमानदारी से महसूस होता है, क्योंकि परम्परा हमें भीतर से सही ठहरा देती है। आज ही उस बुज़ुर्ग को, जिसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी असल में आपकी है, फोन कीजिए और पूछिए कि इस हफ़्ते उन्हें किस ठोस चीज़ की ज़रूरत है।
मुख्य पात्र
इस आयत में यीशु का लहजा चौंकाने वाला है। यह वही यीशु हैं जो थोड़ी देर बाद एक अन्यजाति स्त्री की ज़िद के आगे झुक जाते हैं और एक बहरे व्यक्ति के लिए "आह" भरते हैं; पर धर्म के रखवालों के सामने वे नरम नहीं होते। "कैसी अच्छी तरह" में जो व्यंग्य है, वह क्रोध नहीं, निदान है: वे देख रहे हैं कि यह कोई भूल नहीं, यह कौशल है, अभ्यास से निखारा हुआ। यीशु के हृदय में परमेश्वर के वचन के लिए वह जलन है जो हर उस चीज़ के ख़िलाफ़ खड़ी होती है जो उस वचन और साधारण लोगों के बीच दीवार बनकर आ खड़ी होती है। जो यीशु को केवल कोमल समझते हैं, उन्हें यह आयत असहज करेगी, और करनी भी चाहिए।
संदर्भ
यह टकराव गलील में हो रहा है, पर आरोप लगाने वाले "यरूशलेम से आए थे"। यह मामूली बात नहीं: राजधानी से आई एक तरह की जाँच-टोली गाँव के रब्बी को नाप रही है। "प्राचीन परम्परा" कोई मनगढ़ंत बोझ नहीं थी; वह व्यवस्था के चारों ओर बनाई गई सुरक्षा-बाड़ थी, ताकि कोई ग़लती से भी आज्ञा न तोड़े, और उसमें सच्ची श्रद्धा थी। मरकुस अपने ग़ैर-यहूदी पाठकों के लिए हाथ धोने, कटोरों और तांबे के बरतनों की व्याख्या तक करते हैं, क्योंकि उन्हें यह सब अजनबी लगता। "कुरबान" प्रतिज्ञा एक कानूनी उपाय था: संपत्ति को मंदिर के लिए समर्पित घोषित कर दो, और वह माता-पिता की पहुँच से बाहर। कागज़ पर पवित्र, व्यवहार में क्रूर।
प्रश्न
तो क्या हर परम्परा संदिग्ध है? यीशु ऐसा नहीं कहते, और यही असली कठिनाई है। वे परम्परा को नहीं, उसके उस बिंदु को तोड़ते हैं जहाँ वह आज्ञा को रद्द करने लगती है; पर वह बिंदु कहाँ है, इसकी कोई साफ़ सूची वे नहीं देते। हमारी हर व्यवस्था, हर चर्च-परंपरा, हर पारिवारिक नियम अच्छे इरादे से शुरू होता है और चुपचाप अपनी जगह से आगे बढ़ जाता है, और भीतर से यह दिखाई नहीं देता। यहाँ आसान राहत नहीं है। केवल एक कसौटी बचती है, और वह असुविधाजनक है: पूछिए कि आपकी धार्मिकता की कीमत कौन चुका रहा है। अगर उत्तर में कोई कमज़ोर चेहरा दिखे, तो जवाब मिल गया।
चिंतन
आपके जीवन की कौन-सी "अच्छी" आदत या ज़िम्मेदारी इस समय किसी ठोस आज्ञा को टालने का सम्मानजनक बहाना बनी हुई है?
अगर आपके परिवार का सबसे कमज़ोर सदस्य आपकी आत्मिकता का मूल्यांकन करता, तो वह क्या कहता?
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Mark 7:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Mark 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यरूशलेम से इतनी दूर चलकर वे आए, और उनकी आँखें रुकीं कहाँ? किसी के हाथों पर। "उन्होंने उसके कुछ चेलों को अशुद्ध अर्थात् बिना हाथ धोए रोटी खाते देखा।" यीशु वहीं खड़े थे, पर वे चेलों की उँगलियाँ गिन रहे थे।
कभी सोचो, तुम किसी मण्डली में बैठकर क्या ढूँढ़ते हो? मसीह को, या किसी की चूक को? जो आँखें गलती खोजने निकलती हैं, वे प्रभु को देखकर भी पहचान नहीं पातीं।
पिता, मुझे ऐसा बनने से बचा जो भक्ति की बातें करके अपनों की ज़रूरतों से मुँह मोड़ ले। मेरे माता पिता, मेरे परिवार, मेरे पड़ोसी की पुकार मेरे कानों तक पहुँचे। जो तुझे चढ़ाने की बात करूँ, वह पहले प्रेम में उतरे। मेरा दिल और मेरे शब्द एक हों।
पिता, कई बार मैं भी उन लोगों जैसा हूँ जो यीशु के पास सवाल और शक लेकर आए, कमी ढूँढ़ने की नज़र से देखते हुए। मेरे मन को नरम कर दे। मुझे सिखा कि मैं तेरे पास दोष खोजने नहीं, बल्कि सुनने और बदलने के लिए आऊँ।
इस बात के कारण जा; दुष्टात्मा तेरी बेटी में से निकल गई है।" यीशु ने उसे कोई चिन्ह नहीं दिया, कोई छूना नहीं, बस एक वचन। उस माँ को घर तक का पूरा रास्ता खाली हाथ चलना पड़ा, सिर्फ भरोसे के सहारे। तेरी प्रार्थना का जवाब भी कभी ऐसा ही मिलता है, दिखाई कुछ नहीं देता, पर काम हो चुका होता है। क्या तू उस वचन पर घर लौट सकेगा?
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