बाइबल व्याख्या

मत्ती 18

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

चेले एक ऐसा प्रश्न लेकर आते हैं जो हर दफ़्तर, हर परिवार, हर कलीसिया में गूँजता है: "स्वर्ग के राज्य में बड़ा कौन है?" यीशु नाम नहीं बताते; वे एक बालक को बीच में खड़ा कर देते हैं। इसके बाद पूरा अध्याय उसी बालक के इर्द-गिर्द घूमता है: ठोकर खिलाने की भयानक चेतावनी, भटकी हुई भेड़ की खोज, पाप में पड़े भाई से अकेले में बात करने की प्रक्रिया, और अंत में उस दास की कहानी जिसका असंभव कर्ज़ माफ़ हुआ मगर जिसने अपने संगी दास का गला घोंट दिया।

मूल बात

यह अध्याय बड़प्पन की परिभाषा उलट देता है। यीशु नहीं कहते कि बालक निर्दोष है या प्यारा है; उस समाज में बालक के पास कोई हक़, कोई दर्जा, कोई आवाज़ नहीं थी। "जो कोई अपने आपको इस बालक के समान छोटा करेगा, वह स्वर्ग के राज्य में बड़ा होगा।" यानी राज्य में ऊँचाई की माप है स्वेच्छा से नीचे उतरना। और परमेश्वर के बारे में यह कहता है: वे उन्हीं की तरफ़ झुके हुए हैं जिन्हें कोई नहीं गिनता। "इन छोटों में से एक भी नाश हो", यह उनकी इच्छा नहीं। इसलिए क्षमा कोई सज्जनता नहीं, बल्कि उस अर्थव्यवस्था में जीना है जहाँ हमारा पूरा कर्ज़ पहले ही चुका दिया गया।

बड़ी कहानी का सूत्र

भटकी भेड़ की खोज कोई मीठी तस्वीर नहीं, यह परमेश्वर के चरित्र की घोषणा है जो पूरे पुराने नियम में चलती आई है: चरवाहा जो अपने बिखरे झुंड को खुद ढूँढ़ने निकलता है, क्योंकि किराए के चरवाहे नाकाम रहे। यीशु उस खोज को अपने शरीर में उतार देते हैं, "मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को बचाने आया है।" और वह दस हज़ार तोड़े का कर्ज़, जो चुकाया ही नहीं जा सकता, क्रूस की ओर इशारा करता है: राजा उसे बट्टे खाते में नहीं डालता, वह उसे अपने ऊपर ले लेता है। "जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" वही इम्मानुएल है जिससे मत्ती की पुस्तक शुरू हुई थी।

आइना

आपके भीतर वह सवाल अभी भी ज़िंदा है: बड़ा कौन है? वह उस पल में सिर उठाता है जब बैठक में किसी और के सुझाव की तारीफ़ हो जाती है, जब छोटे भाई की तरक्की आपसे तेज़ हो जाती है, जब कलीसिया में आपका नाम धन्यवाद-सूची से छूट जाता है। और अध्याय का सबसे कड़वा हिस्सा यह है: वही आदमी, जिसने घुटनों पर गिरकर दया पाई थी, बाहर निकलते ही किसी का गला घोंट रहा है। हम ठीक यही करते हैं। परमेश्वर के सामने हम अपनी असमर्थता कबूल करते हैं, और फिर घर में उस एक वाक्य को याद रखते हैं जो पाँच साल पहले कहा गया था। ध्यान दीजिए, यीशु व्यंग्य नहीं कर रहे: "मन से क्षमा न करेगा" पर उनकी चेतावनी नर्क तक जाती है।

आज ही, दस मिनट के भीतर: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसका क़र्ज़ आप मन में गिनकर रखे हुए हैं, और उस नाम के ऊपर ज़ोर से कहिए, "जो कुछ तुझ पर मेरा है, मैंने छोड़ दिया", फिर काग़ज़ फाड़ दीजिए।

मुख्य पात्र

कहानी का राजा हमें असहज करता है, क्योंकि वह दोनों छोरों तक जाता है। पहले उसका "तरस खाकर" (यूनानी में यह शब्द आँतों के मुड़ जाने का चित्र है, ऊपरी दया नहीं, भीतर तक हिल जाना) उस दास का ऐसा कर्ज़ माफ़ करता है जो किसी जीवनकाल में नहीं चुकता। और फिर वही राजा क्रोध में आकर उसे दण्ड देनेवालों के हाथ सौंप देता है। यह विरोधाभास नहीं है। जो दया लेकर उसे अपने भीतर बंद कर लेता है, वह साबित करता है कि उसने दया को समझा ही नहीं, केवल इस्तेमाल किया। परमेश्वर की करुणा नरम है, कमज़ोर नहीं। "जैसा मैंने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?" यह प्रश्न आज भी बिना उत्तर लटका हुआ है।

शास्त्र के दूसरे स्वर

पतरस की गिनती के पीछे एक पुरानी गूँज है। उत्पत्ति 4 में लेमेक डींग मारता है कि वह सत्तर गुना बदला लेगा; यीशु उसी संख्या को उलटकर क्षमा का पैमाना बना देते हैं, "सात बार के सत्तर गुने तक।" मानव इतिहास बदले की गिनती से शुरू होता है, राज्य क्षमा की बेहिसाबी से। दूसरी गूँज यहेजकेल 34 है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि इस्राएल के चरवाहों ने झुंड को खा लिया, इसलिए अब वे स्वयं खोई हुई को ढूँढ़ेंगे। यीशु की भटकी भेड़ की कहानी उस प्रतिज्ञा का पूरा होना है, और साथ ही कलीसिया के अगुवों के लिए चेतावनी: छोटों को तुच्छ जाननेवाला अगुवा उन्हीं चरवाहों की कतार में खड़ा है।

पहले सुननेवाले

मत्ती जिनके लिए लिख रहे हैं, वे एक नई, टूटती-जुड़ती यहूदी-मसीही मंडली थे, जहाँ आपसी झगड़े असली थे: कौन सही मानी गई परंपरा में है, किसने किसे धोखा दिया, किसे संगति से बाहर करना है। "तो कलीसिया से कह दे" वाला यह कदमवार रास्ता उनके लिए सैद्धांतिक नहीं था, यह रोज़ का सवाल था। और "अन्यजाति और चुंगी लेनेवाले के जैसा जान" उनके कानों में और भी चुभा होगा, क्योंकि यह किताब लिखनेवाला स्वयं चुंगी लेनेवाला था, और यीशु उन्हीं के साथ खाते थे। यानी बहिष्कार भी दरवाज़ा बंद करना नहीं, फिर से खोज शुरू करना है। जिनके पास मंडली में कोई ओहदा नहीं था, उन्होंने सुना कि स्वर्ग में उनके स्वर्गदूत पिता का मुँह सदा देखते हैं।

मनन के प्रश्न

आपके भीतर वह "गिनती की बही" किसके नाम पर खुली है, और आप उसे बंद करने से किस डर के कारण बच रहे हैं?

आपकी संगति या परिवार में वह "छोटा" कौन है जिसकी आवाज़ पर आप सबसे कम ध्यान देते हैं, और इस हफ़्ते आप उसे कैसे ग्रहण करेंगे?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 18 का क्या अर्थ है?
चेले एक ऐसा प्रश्न लेकर आते हैं जो हर दफ़्तर, हर परिवार, हर कलीसिया में गूँजता है: "स्वर्ग के राज्य में बड़ा कौन है?" यीशु नाम नहीं बताते; वे एक बालक को बीच में खड़ा कर देते हैं। इसके बाद पूरा अध्याय उसी बालक के इर्द-गिर्द घूमता है: ठोकर खिलाने की भयानक चेतावनी, भटकी हुई भेड़ की खोज, पाप में पड़े भाई से अकेले में बात करने की प्रक्रिया, और अंत में उस दास की कहानी जिसका असंभव कर्ज़ माफ़ हुआ मगर जिसने अपने संगी दास का गला घोंट दिया।
मत्ती 18 किस विषय में है?
भटकी भेड़ की खोज कोई मीठी तस्वीर नहीं, यह परमेश्वर के चरित्र की घोषणा है जो पूरे पुराने नियम में चलती आई है: चरवाहा जो अपने बिखरे झुंड को खुद ढूँढ़ने निकलता है, क्योंकि किराए के चरवाहे नाकाम रहे। यीशु उस खोज को अपने शरीर में उतार देते हैं, "मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को बचाने आया है।" और वह दस हज़ार तोड़े का कर्ज़, जो चुकाया ही नहीं जा सकता, क्रूस की ओर इशारा करता है: राजा उसे बट्टे खाते में नहीं डालता, वह उसे अपने ऊपर ले लेता है। "जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ" वही इम्मानुएल है जिससे मत्ती की पुस्तक शुरू हुई थी।
मत्ती 18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही, दस मिनट के भीतर: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसका क़र्ज़ आप मन में गिनकर रखे हुए हैं, और उस नाम के ऊपर ज़ोर से कहिए, "जो कुछ तुझ पर मेरा है, मैंने छोड़ दिया", फिर काग़ज़ फाड़ दीजिए।
मत्ती 18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पतरस की गिनती के पीछे एक पुरानी गूँज है। उत्पत्ति 4 में लेमेक डींग मारता है कि वह सत्तर गुना बदला लेगा; यीशु उसी संख्या को उलटकर क्षमा का पैमाना बना देते हैं, "सात बार के सत्तर गुने तक।" मानव इतिहास बदले की गिनती से शुरू होता है, राज्य क्षमा की बेहिसाबी से। दूसरी गूँज यहेजकेल 34 है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि इस्राएल के चरवाहों ने झुंड को खा लिया, इसलिए अब वे स्वयं खोई हुई को ढूँढ़ेंगे। यीशु की भटकी भेड़ की कहानी उस प्रतिज्ञा का पूरा होना है, और साथ ही कलीसिया के अगुवों के लिए चेतावनी: छोटों को तुच्छ जाननेवाला अगुवा उन्हीं चरवाहों की कतार में खड़ा है।
मत्ती 18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके भीतर वह "गिनती की बही" किसके नाम पर खुली है, और आप उसे बंद करने से किस डर के कारण बच रहे हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Matthew 18 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 23

पिता, धन्यवाद कि तू वह राजा है जिसने "अपने दासों से लेखा लेना चाहा", और मेरा भारी कर्ज़ अनदेखा नहीं किया, बल्कि उसे अपने ऊपर ले लिया। धन्यवाद कि तेरे राज्य में हिसाब सच्चाई से होता है और दया से चुकाया जाता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे, वह स्वर्ग में बँधेगा और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे, वह स्वर्ग में खुलेगा।" यह बात यीशु ने भटके हुए भाई को खोजने की बात के बीच कही। यह अधिकार निन्दा करने के लिए नहीं, किसी को वापस लाने के लिए मिला है। सोच, जो दरवाज़ा तू आज किसी के लिए खोलता है, स्वर्ग उसे बन्द नहीं करता। और जो तू बन्द रखता है?

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