मत्ती 6:9
पाठ
पहाड़ की ढलान पर बैठे लोगों ने अभी-अभी सुना है कि दिखावे की प्रार्थना का प्रतिफल चुक चुका है, और बड़बड़ाहट से स्वर्ग नहीं खुलता। एक ठहराव। फिर यीशु कहते हैं: "अतः तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो।" और जो पहला शब्द उनके मुँह से निकलता है, वह माँग नहीं, सम्बोधन है: "हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है।" इसके बाद पहली विनती अपने लिए कुछ नहीं माँगती, बल्कि परमेश्वर के लिए माँगती है: "तेरा नाम पवित्र माना जाए।" यानी प्रार्थना का आरम्भ इस चाह से होता है कि इस पृथ्वी पर परमेश्वर का नाम वैसा ही आदर पाए जैसा उसके योग्य है। पहले वे, फिर हम। पहले उनका नाम, फिर हमारी रोटी।
मूल मर्म
दो शब्द यहाँ आपस में टकराते हैं और उसी टकराव से यह प्रार्थना जन्म लेती है: "पिता" और "स्वर्ग में।" पिता का अर्थ है निकटता, वह पहुँच जो एक बच्चे को घर में मिलती है; स्वर्ग का अर्थ है कि यह पिता हमारी जेब का देवता नहीं, बल्कि वह है जिसके सामने सृष्टि झुकती है। जो केवल पिता कहता है, वह परमेश्वर को घरेलू बना देता है; जो केवल स्वर्ग कहता है, वह उन्हें दूर कर देता है। यीशु दोनों को एक साँस में जोड़ते हैं। और इसीलिए पहली विनती यह नहीं कि "मेरी ज़रूरत पूरी कर," बल्कि "तेरा नाम पवित्र माना जाए।" नाम का अर्थ बाइबल में केवल पुकारने का शब्द नहीं, बल्कि व्यक्ति का प्रकट स्वरूप है। हम माँग रहे हैं कि परमेश्वर जैसे हैं, वैसे ही जाने और आदर पाएँ, हमारे बीच से शुरू करके।
साझा सूत्र
यह प्रार्थना आसमान से नहीं टपकी; इसकी जड़ें इस्राएल की कहानी में गहरी हैं। परमेश्वर ने अपने लोगों को नाम दिया था और उस नाम के साथ जोड़ दिया था: तुम्हारे जीने से मेरा नाम या तो आदर पाएगा या मिट्टी में मिलेगा। यहेजकेल के दिनों में निर्वासित इस्राएल ने जातियों के बीच उस नाम को अपवित्र किया, और परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की कि वे स्वयं अपने बड़े नाम को पवित्र ठहराएँगे। यीशु उसी प्रतिज्ञा को अपने शिष्यों के होठों पर रख देते हैं, पर एक नए सम्बोधन के साथ। जिस नाम को मूसा जूते उतारकर सुनते हैं, उसी को यीशु "पिता" कहकर पुकारते हैं, और अपने चेलों को भी वही अधिकार सौंप देते हैं। मसीह का पूरा जीवन इसी पहली विनती की जीवित प्रतिध्वनि है: एक पुत्र जो कहता है, तेरी इच्छा पूरी हो, और क्रूस तक उस नाम को अपवित्र नहीं होने देता। हम उधार के अधिकार से यह प्रार्थना करते हैं, उन्हीं के मुँह से।
दर्पण
ईमानदारी से पूछिए: आपकी प्रार्थना कहाँ से शुरू होती है? अधिकतर बार बिजली के बिल से, बच्चे के नतीजे से, उस रिपोर्ट से जो कल जमा करनी है, उस गाँठ से जो डॉक्टर ने बताई है। यह गलत नहीं है, यीशु स्वयं आगे रोटी माँगना सिखाते हैं। पर वे क्रम बदलते हैं, और क्रम बदलना दिल बदलना है। "हमारे" शब्द पर भी अटकिए। आप अकेले प्रार्थना नहीं कर सकते; उस भाई के साथ, जिससे बातचीत बन्द है, आपको एक ही पिता को पुकारना है। और "तेरा नाम पवित्र माना जाए" का सबसे चुभने वाला पक्ष यह है कि दफ्तर में आपके व्यवहार से, पैसे के लेन-देन में आपकी सफाई से, घर में आपकी आवाज़ के लहजे से लोग तय करते हैं कि यह नाम कैसा है।
आज ही करें: प्रार्थना में बैठकर पहले वाक्य को धीरे-धीरे ज़ोर से बोलिए, "हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है," और फिर पूरे एक मिनट तक कुछ भी न माँगिए। बस चुप रहिए।
अन्तर्पाठ
इसी अध्याय की आठवीं आयत को साथ रखकर पढ़िए: "तुम्हारा पिता तुम्हारे माँगने से पहले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकताएँ है।" यह वाक्य प्रार्थना को बेकार नहीं ठहराता, बल्कि उसे जानकारी देने के बोझ से मुक्त करता है। हम परमेश्वर को सूचित करने नहीं, सम्बन्ध में खड़े होने आते हैं। और आगे बत्तीसवीं आयत वही बात दोहराती है: "तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए।" पूरे अध्याय में "पिता" शब्द बार-बार लौटता है, जैसे कोई धुन। दूसरी ओर यहेजकेल की वह भारी घोषणा खड़ी है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि उनके नाम को उनके ही लोगों ने जातियों के बीच अपवित्र किया। दोनों को साथ रखिए और यह विनती चुभने लगती है: जिस पिता को हम पुकारते हैं, उनका नाम हमारे ही जीवन में सबसे ज़्यादा दाँव पर लगा है।
श्रोता
पहाड़ पर बैठे वे लोग आराधनालय की प्रार्थनाओं से परिचित थे, जहाँ नियमित रूप से यही माँगा जाता था कि परमेश्वर का महान नाम महिमित और पवित्र ठहरे। यीशु उन्हें कुछ बिलकुल नया नहीं सिखा रहे; वे उनकी परिचित प्रार्थना को छोटा, तीखा और आश्चर्यजनक रूप से पारिवारिक बना रहे हैं। रोमी सिपाही सड़कों पर थे, कर वसूलने वाले घर आते थे, और सम्राट स्वयं को देवता का पुत्र कहलवाता था। ऐसे माहौल में मिट्टी में बैठे किसानों और मछुआरों को यह कहना कि स्वर्ग का परमेश्वर उनका पिता है, राजनीतिक रूप से भी विस्फोटक था। और "हमारे" शब्द ने सामाजिक सीढ़ी को गिरा दिया: फरीसी और मज़दूर, दोनों एक ही सम्बोधन से शुरू करते हैं।
सन्दर्भ
यह पहाड़ी उपदेश का बीचोंबीच है, और छठे अध्याय की बनावट साफ है: दान, प्रार्थना, उपवास, तीनों वे काम जिन पर यहूदी भक्ति टिकी थी, और तीनों बार वही चेतावनी कि दिखावा प्रतिफल खा जाता है। उस समाज में सम्मान सार्वजनिक मुद्रा थी; कौन कितना दान देता है, कौन चौराहे पर कब खड़ा होकर प्रार्थना करता है, इस पर प्रतिष्ठा बनती थी। यीशु इस पूरी अर्थव्यवस्था को उलट देते हैं और प्रार्थना को बन्द दरवाज़े के पीछे ले जाते हैं, जहाँ केवल एक दर्शक है। ठीक इसी गुप्त कोठरी में वे यह नमूना रखते हैं। ध्यान दीजिए, यह "प्रार्थना" नहीं, "रीति" है: शब्दों की माला नहीं, दिशा-सूचक। पहले वे, फिर हम, यही पूरे उपदेश का ढाँचा है।
चिंतन
आपकी पिछली दस प्रार्थनाओं में से कितनी परमेश्वर के नाम से शुरू हुईं और कितनी आपकी ज़रूरत से? यह क्रम आपके बारे में क्या कहता है?
आपके जीवन का कौन-सा एक क्षेत्र ऐसा है जहाँ लोग आपको देखकर परमेश्वर के नाम को हल्का समझ सकते हैं?
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Matthew 6:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मत्ती 6:9 का क्या अर्थ है?
मत्ती 6:9 किस विषय में है?
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मत्ती 6:9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 6:9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 6 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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