बाइबल व्याख्या

फिलिप्पियों 2:10

बाइबल
यह वचन CONGREGATIONAL CHURCH OF INDIA (MARALAND) द्वारा समर्पित है

पाठ

पौलुस लिखता है कि क्रूस तक झुक जाने वाले यीशु को परमेश्वर ने अति महान किया और उन्हें वह नाम दिया जो सब नामों से श्रेष्ठ है, और इसका उद्देश्य एक ही है: कि सृष्टि का हर कोना, स्वर्ग, पृथ्वी और पृथ्वी के नीचे का लोक, यीशु के नाम पर घुटना टेके। यह कोई भविष्य की धुंधली संभावना नहीं, बल्कि वह लक्ष्य है जिसके लिए परमेश्वर ने अपने पुत्र को ऊँचा उठाया।

मर्म

ध्यान दीजिए कि यहाँ घुटना किसके आगे टेका जाता है। उस व्यक्ति के आगे जिसने "दास का स्वरूप धारण किया" और जो "क्रूस की मृत्यु भी सह ली।" ब्रह्मांड का केंद्र एक सिंहासन नहीं, एक फाँसी का खंभा है। परमेश्वर ने अपनी संप्रभुता को उस व्यक्ति में प्रकट किया जिसने स्वयं को शून्य कर दिया। इसका अर्थ यह है कि सत्ता का स्वभाव ही यहाँ पलट दिया गया है: जो नीचे गया, वही सबसे ऊपर है। और इसलिए यीशु के सामने झुकना किसी तानाशाह के सामने गिड़गिड़ाना नहीं है, बल्कि उस प्रेम को सही ठहराना है जो अंत तक गया। उद्धार का अर्थ यही है कि हम उस प्रभु के अधीन आते हैं जो हमारे लिए मरा।

सूत्र

पौलुस यहाँ कोई नया वाक्य नहीं गढ़ रहा। यशायाह की पुस्तक के पैंतालीसवें अध्याय में परमेश्वर स्वयं शपथ खाकर कहते हैं कि हर घुटना उनके सामने झुकेगा और हर जीभ उन्हीं की शपथ खाएगी, और वह पूरा खंड इस घोषणा पर टिका है कि उनके सिवा कोई परमेश्वर नहीं। पौलुस उस वाक्य को उठाकर सीधे यीशु पर लगा देता है। एक यहूदी के लिए यह कदम असंभव के बराबर था, और फिर भी वह इसे बिना हिचक के उठाता है। यही पूरी बाइबल का सूत्र है: जिस अद्वितीय परमेश्वर की आराधना इस्राएल करता आया, वही अब नासरत के उस व्यक्ति के चेहरे में पहचाना जाता है। वादा और पूर्ति एक ही नाम में मिल जाते हैं।

दर्पण

हम में से अधिकतर लोग खुले विद्रोह में नहीं जीते; हम बस कुछ क्षेत्रों को अपने अधिकार में रखे रहते हैं। पैसे का हिसाब मेरा अपना मामला है। अपने बच्चों के बारे में मेरी महत्वाकांक्षाएँ मेरी अपनी हैं। दफ्तर में अपनी जगह बचाए रखने के लिए मैं जो समझौते करता हूँ, उन पर किसी का दखल नहीं। घुटना टेकने का अर्थ यही है कि इन कोनों में भी कोई और प्रभु है। पौलुस यह भी स्पष्ट करता है कि घुटना टेकना स्वैच्छिक हो या अनिच्छुक, होगा अवश्य; प्रश्न केवल यह है कि आज या अंत में। आज ही, अकेले में, अपने कमरे में सचमुच घुटनों पर बैठिए, अपने जीवन का वह एक क्षेत्र नाम लेकर बोलिए जिसे आप अपने वश में रखे हुए हैं, और ऊँची आवाज़ में कहिए: यीशु मसीह ही प्रभु है।

संदर्भ

फिलिप्पी रोमी साम्राज्य की एक उपनिवेश नगरी थी, जहाँ सेवानिवृत्त सैनिक बसाए गए थे और रोमी नागरिकता का गर्व हवा में घुला रहता था। वहाँ सम्राट की उपाधि थी "कुरियोस", अर्थात प्रभु, और उसके सम्मान में झुकना नागरिक निष्ठा का प्रमाण था। इसी नगर की एक छोटी कलीसिया को पौलुस कैद से लिख रहा है, स्वयं जंजीरों में, एक ऐसी व्यवस्था के अधीन जो उसके जीवन पर निर्णय ले सकती थी। और वह लिखता है कि जिस नाम के आगे अंततः सब झुकेंगे, वह सम्राट का नहीं बल्कि एक सूली चढ़े यहूदी का है। यह केवल धार्मिक भावना नहीं थी, यह राजनीतिक रूप से खतरनाक वाक्य था। कलीसिया के भीतर की फूट के बीच पौलुस उन्हें यही याद दिलाता है कि असली सिंहासन कहाँ है।

बारीकी

"पृथ्वी के नीचे" वाला वाक्यांश अक्सर पढ़ते समय फिसल जाता है। पौलुस तीन तलों की बात करता है: स्वर्ग, पृथ्वी, और अधोलोक। प्राचीन मन के लिए यह पूरी वास्तविकता का नक्शा था, ऊपर की आत्मिक शक्तियाँ, बीच में जीवित मनुष्य, और नीचे मरे हुए तथा वे शक्तियाँ जिनसे लोग डरते थे। पौलुस कह रहा है कि यीशु के अधिकार से बाहर कोई क्षेत्र नहीं बचा, न वह जो हमसे ऊपर है, न वह जो हमारे नीचे अंधकार में है। जिन शक्तियों के नाम लेने से फिलिप्पी के लोग घबराते थे, वे भी उसी नाम पर घुटना टेकती हैं। जहाँ आपका डर सबसे गहरा है, वहाँ भी मसीह की प्रभुता पहले से पहुँची हुई है।

अंतर्पाठ

यशायाह का वह वचन, जिसे पौलुस यहाँ उठाता है, मूल रूप से उन जातियों के लिए निमंत्रण था जो मूरतों के पीछे भटक रही थीं: लौट आओ और उद्धार पाओ, क्योंकि अंत में सब झुकेंगे ही। पौलुस उस निमंत्रण का स्वर बनाए रखता है, क्योंकि अगला पद कहता है कि यह सब "परमेश्वर पिता की महिमा के लिये" होता है। झुकना पराजय नहीं, घर लौटना है। और इसी पत्र के भीतर एक और प्रतिध्वनि है: पद पाँच में पौलुस कहता है, "जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।" जो मसीह के आगे झुकता है, वह दूसरों के सामने भी झुकना सीखता है। आराधना और विनम्रता एक ही गति के दो सिरे हैं।

चिंतन

आपके जीवन का कौन सा क्षेत्र अब भी ऐसा है जहाँ आप स्वयं अपने प्रभु बने हुए हैं, और आप वहाँ किससे डरते हैं?

यदि जिसके आगे आप झुकते हैं वह स्वयं दास बना, तो यह आपके अधीनस्थों, आपके परिवार और आपके विरोधियों के साथ आपके व्यवहार को कैसे बदलना चाहिए?

Philippians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Philippians

Alec Motyer

Joy in every circumstance, traced through Paul's warmest letter.

Paul For Everyone: The Prison Letters

N.T. Wright

Ephesians, Philippians, Colossians and Philemon in short daily readings.

Philippians: An Introduction and Commentary

Ralph Martin

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Philippians

Frank Thielman

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Philippians 2:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

फिलिप्पियों 2:10 का क्या अर्थ है?
पौलुस लिखता है कि क्रूस तक झुक जाने वाले यीशु को परमेश्वर ने अति महान किया और उन्हें वह नाम दिया जो सब नामों से श्रेष्ठ है, और इसका उद्देश्य एक ही है: कि सृष्टि का हर कोना, स्वर्ग, पृथ्वी और पृथ्वी के नीचे का लोक, यीशु के नाम पर घुटना टेके। यह कोई भविष्य की धुंधली संभावना नहीं, बल्कि वह लक्ष्य है जिसके लिए परमेश्वर ने अपने पुत्र को ऊँचा उठाया।
फिलिप्पियों 2:10 किस विषय में है?
पौलुस यहाँ कोई नया वाक्य नहीं गढ़ रहा। यशायाह की पुस्तक के पैंतालीसवें अध्याय में परमेश्वर स्वयं शपथ खाकर कहते हैं कि हर घुटना उनके सामने झुकेगा और हर जीभ उन्हीं की शपथ खाएगी, और वह पूरा खंड इस घोषणा पर टिका है कि उनके सिवा कोई परमेश्वर नहीं। पौलुस उस वाक्य को उठाकर सीधे यीशु पर लगा देता है। एक यहूदी के लिए यह कदम असंभव के बराबर था, और फिर भी वह इसे बिना हिचक के उठाता है। यही पूरी बाइबल का सूत्र है: जिस अद्वितीय परमेश्वर की आराधना इस्राएल करता आया, वही अब नासरत के उस व्यक्ति के चेहरे में पहचाना जाता है। वादा और पूर्ति एक ही नाम में मिल जाते हैं।
फिलिप्पियों 2:10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
फिलिप्पी रोमी साम्राज्य की एक उपनिवेश नगरी थी, जहाँ सेवानिवृत्त सैनिक बसाए गए थे और रोमी नागरिकता का गर्व हवा में घुला रहता था। वहाँ सम्राट की उपाधि थी "कुरियोस", अर्थात प्रभु, और उसके सम्मान में झुकना नागरिक निष्ठा का प्रमाण था। इसी नगर की एक छोटी कलीसिया को पौलुस कैद से लिख रहा है, स्वयं जंजीरों में, एक ऐसी व्यवस्था के अधीन जो उसके जीवन पर निर्णय ले सकती थी। और वह लिखता है कि जिस नाम के आगे अंततः सब झुकेंगे, वह सम्राट का नहीं बल्कि एक सूली चढ़े यहूदी का है। यह केवल धार्मिक भावना नहीं थी, यह राजनीतिक रूप से खतरनाक वाक्य था। कलीसिया के भीतर की फूट के बीच पौलुस उन्हें यही याद दिलाता है कि असली सिंहासन कहाँ है।
फिलिप्पियों 2:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह का वह वचन, जिसे पौलुस यहाँ उठाता है, मूल रूप से उन जातियों के लिए निमंत्रण था जो मूरतों के पीछे भटक रही थीं: लौट आओ और उद्धार पाओ, क्योंकि अंत में सब झुकेंगे ही। पौलुस उस निमंत्रण का स्वर बनाए रखता है, क्योंकि अगला पद कहता है कि यह सब "परमेश्वर पिता की महिमा के लिये" होता है। झुकना पराजय नहीं, घर लौटना है। और इसी पत्र के भीतर एक और प्रतिध्वनि है: पद पाँच में पौलुस कहता है, "जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।" जो मसीह के आगे झुकता है, वह दूसरों के सामने भी झुकना सीखता है। आराधना और विनम्रता एक ही गति के दो सिरे हैं।
फिलिप्पियों 2:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि जिसके आगे आप झुकते हैं वह स्वयं दास बना, तो यह आपके अधीनस्थों, आपके परिवार और आपके विरोधियों के साथ आपके व्यवहार को कैसे बदलना चाहिए?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Philippians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 24

पिता, मेरी योजनाएँ मेरे हाथ में नहीं हैं, यह मैं जानता हूँ। फिर भी पौलुस की तरह मैं तुझ पर भरोसा रखना चाहता हूँ कि जो आगे है, वह तेरे हाथ में सुरक्षित है। जिनसे मिलने की आशा दिल में है, उन मुलाक़ातों को तू अपने समय पर पूरा कर। मुझे इंतज़ार में भी शांत रहना सिखा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।" पौलुस यह जेल से लिख रहा है, और मसीह के झुकने की बात कहने से पहले कह रहा है। ध्यान दे, वह कहता है "समझो", यानी यह मन की बात है, दिखावे की नहीं। आज जिस व्यक्ति से तुलना करके तुम जलते हो, उसी को मन ही मन अपने से अच्छा समझकर देखो। क्या तुम्हारा दिल इसके लिए तैयार है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

इपफ्रुदीतुस बीमार पड़ा, मरते मरते बचा, और खाली हाथ लौटा नहीं, पर शायद लोग सोचते कि वह जल्दी लौट आया। पौलुस पहले ही कह देता है, "इसलिए तुम प्रभु में उससे बहुत आनन्द के साथ भेंट करना, और ऐसों का आदर किया करो।"

जो चुपचाप तेरे लिए घिसते रहे, क्या तूने कभी उन्हें आनन्द से अपनाया? या बस उनसे काम लिया और आगे बढ़ गया?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।" ध्यान दो, यह "इस कारण" कहाँ से आता है। क्रूस से। नीचे उतरने से। जिस रास्ते को दुनिया हार कहती है, परमेश्वर उसी को ऊँचा उठाता है।

तो जहाँ तुम आज झुक रहे हो, और किसी को दिख भी नहीं रहा, वहाँ परमेश्वर की नज़र है। वह भूलता नहीं।

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