फिलिप्पियों 2:6
पाठ
पौलुस मसीह के विषय में कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वरूप में थे, यानी उनका अस्तित्व ही ईश्वरीय था। फिर भी परमेश्वर के तुल्य होने की उस स्थिति को उन्होंने ऐसी चीज़ नहीं समझा जिसे मुट्ठी में भींचकर रखा जाए, अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाए। यह वाक्य अधूरा है; यह अगली आयत में गिरता है, जहाँ वे स्वयं को शून्य कर देते हैं।
मर्म
यहाँ एक ऐसी बात कही जा रही है जो धर्मों की सामान्य कल्पना को उलट देती है। हम मानते हैं कि ईश्वरत्व का अर्थ है ऊपर बैठना, पकड़े रखना, न छोड़ना। पौलुस कहते हैं: नहीं। मसीह ने अपना ईश्वरत्व छिपाकर नहीं, बल्कि उसे उँडेलकर प्रकट किया। नीचे उतरना उनके स्वभाव के विरुद्ध नहीं था, वह उनके स्वभाव का सबसे शुद्ध प्रदर्शन था। इसका अर्थ यह है कि जब आप क्रूस पर लटके हुए उस व्यक्ति को देखते हैं, तो आप परमेश्वर के बावजूद नहीं, परमेश्वर के कारण वहाँ लटके हुए किसी को देख रहे हैं। परमेश्वर की महिमा कब्ज़े में नहीं, देने में है।
जोड़ने वाला सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में दो हाथ दिखाई देते हैं: एक हाथ जो पकड़ता है और एक हाथ जो खोलता है। अदन की वाटिका में मनुष्य ने वह छीनना चाहा जो उसे दिया नहीं गया था, और उसे खो बैठा जो उसके पास था। बाबेल में लोगों ने नाम कमाने के लिए मीनार बनाई। इस्राएल के राजा सिंहासन को कसकर पकड़ते रहे। और फिर एक आता है जो परमेश्वर के तुल्य होने पर भी उसे लूट का माल नहीं समझता, और इसी कारण आयत 9 में उसे वह नाम मिलता है जो सब नामों में श्रेष्ठ है। जो मनुष्य ने छीनकर पाना चाहा, वह पुत्र को झुकने के मार्ग से दिया गया।
दर्पण
आप जानते हैं कि किस चीज़ पर आपकी पकड़ है। शायद वह पद है जिस पर कोई युवा साथी नज़र गड़ाए है। शायद वह अधिकार है जो आपको घर में मिला हुआ है, वह अंतिम शब्द जो हमेशा आपका ही होता है। शायद वह श्रेय है जो किसी परियोजना में आपको मिलना चाहिए था। पौलुस यह नहीं कह रहे कि आपके पास कुछ नहीं है; वे कह रहे हैं कि मसीह के पास सब कुछ था और उन्होंने उसे मुट्ठी में नहीं भींचा। सवाल यह नहीं कि आपके अधिकार वास्तविक हैं या नहीं। सवाल यह है कि आप उन्हें किस चीज़ के लिए इस्तेमाल करते हैं, अपने बचाव के लिए या दूसरों के हित के लिए, जैसा आयत 4 कहती है।
पृष्ठभूमि
फिलिप्पी कोई साधारण शहर नहीं था। यह रोमी उपनिवेश था, जहाँ सेवानिवृत्त सैनिक बसाए गए थे, और जहाँ नागरिकता, पदवी और सामाजिक सीढ़ी पर चढ़ना जीवन का मुख्य व्याकरण था। वहाँ आदमी की पहचान इस बात से बनती थी कि सार्वजनिक जीवन में उसने कितने पायदान चढ़े। और इसी शहर को पौलुस, स्वयं जेल में बैठे हुए, एक ऐसे प्रभु का चित्र भेजते हैं जो सीढ़ी से नीचे उतरा। यह संभवतः कोई गीत था जिसे मंडली गाती थी। कल्पना कीजिए: रोमी सम्मान के इस माहौल में विश्वासी मिलकर उस राजा का गीत गा रहे हैं जिसने दास का स्वरूप धारण किया।
एक बारीकी
"अपने वश में रखने की वस्तु" के पीछे यूनानी शब्द है हरपागमोस, जिसका मूल अर्थ है लूट का माल, वह चीज़ जिसे झपटकर छीना जाए और फिर छाती से चिपकाकर रखा जाए। यह छवि युद्ध और डकैती की है, मंदिर की नहीं। पौलुस कह रहे हैं कि मसीह ने अपनी ईश्वरीय समानता को लुटेरे की तरह नहीं देखा। इसमें एक बारीक व्यंग्य छिपा है: जो चीज़ उनकी अपनी थी, उसे भी उन्होंने पकड़कर नहीं रखा, जबकि हम उन चीज़ों को भी जकड़ लेते हैं जो कभी हमारी थीं ही नहीं। छोड़ने की क्षमता कमज़ोरी नहीं, सुरक्षा का चिह्न है।
शास्त्र में गूँज
पहली गूँज उत्पत्ति 3 से आती है। साँप का वादा था कि फल खाकर मनुष्य परमेश्वर के समान हो जाएगा। हव्वा और आदम ने वही पकड़ना चाहा जो उन्हें दिया नहीं गया था। मसीह के पास वही समानता वास्तव में थी, और उन्होंने उसे नहीं भींचा। दूसरी गूँज यशायाह 45 से आती है, जहाँ परमेश्वर शपथ खाते हैं कि हर घुटना उनके सामने झुकेगा और हर जीभ अंगीकार करेगी। पौलुस आयत 10 और 11 में ठीक यही शब्द यीशु पर लगाते हैं: "वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें।" यह कोई ढीला संकेत नहीं है। एकेश्वरवादी यहूदी पौलुस उस वचन को, जिसे परमेश्वर ने किसी और को न देने की कसम खाई थी, बिना हिचक यीशु को सौंप देते हैं। और आयत 7 का "दास का स्वरूप" यशायाह के उस पीड़ित सेवक की ओर इशारा करता है जो दूसरों के लिए कुचला गया। दास और प्रभु, एक ही व्यक्ति में।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन में इस समय कौन सी चीज़ है जिसे आप "अपने वश में रखने की वस्तु" समझकर पकड़े हुए हैं, और यदि आप उसे खोल दें तो सबसे पहले किसे लाभ होगा?
यदि परमेश्वर का स्वभाव पकड़ने में नहीं बल्कि उँडेलने में प्रकट होता है, तो इससे आपकी उस प्रार्थना पर क्या असर पड़ता है जिसमें आप उनसे कुछ माँग रहे हैं?
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Philippians 2:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
फिलिप्पियों 2:6 का क्या अर्थ है?
फिलिप्पियों 2:6 किस विषय में है?
फिलिप्पियों 2:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
फिलिप्पियों 2:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिलिप्पियों 2:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें अपने मन के भरोसे नहीं छोड़ा, बल्कि यीशु का स्वभाव दिखाया, "जो स्वभाव मसीह यीशु का था, वही तुम्हारा भी हो।" उनकी दीनता, उनका झुकना, उनका सेवा करना, यही हमारे लिए नमूना है। धन्यवाद कि आपका आत्मा हमारे भीतर यही मन गढ़ रहा है।
जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी, परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।" मसीह के पास सब कुछ था, फिर भी उन्होंने कुछ भी कसकर नहीं पकड़ा। और हम? एक छोटा सा पद, एक तारीफ, एक अधिकार, इन्हें हम मुट्ठी में भींचे रहते हैं, इस डर से कि छूट गया तो हम कुछ भी नहीं रहेंगे। आज अपनी मुट्ठी देखिए। उसमें क्या है जिसे छोड़ना आपको मौत जैसा लगता है?
पौलुस जेल में है, और वह इपफ्रुदीतुस को केवल "तुम्हारा भेजा हुआ" कहकर नहीं छोड़ता। वह उसे "मेरा भाई, और सहकर्मी, और संगी योद्धा" कहता है। एक साधारण आदमी, जिसका नाम शायद किसी सूची में न होता, पौलुस उसे तीन बार सम्मान देता है।
तुम्हारे साथ कौन चुपचाप सेवा कर रहा है, जिसका नाम तुमने कभी ऊँची आवाज़ में नहीं कहा?
पिता, मुझे जीवन देनेवाले तेरे वचन को कसकर थामे रहने की ताकत दे। कई बार लगता है कि मेरी मेहनत बेकार जा रही है, फिर भी तू जानता है कि क्या फल लाएगा। मेरी दौड़ खाली न रहे, मेरा हर दिन तेरे लिए गिना जाए।
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