नीतिवचन 31
पाठ
अध्याय दो हिस्सों में खुलता है। पहले नौ पद एक रानी माँ की आवाज़ हैं, जो अपने बेटे लमूएल को चेताती है: दाखमधु और स्त्रियाँ राजा का बल चूस लेती हैं, और जो न्याय पीकर भूल जाता है, वह "किसी दुःखी के हक़" को मार देता है; इसलिए "गूँगे के लिये अपना मुँह खोल।" फिर पद 10 से आवाज़ बदल जाती है और एक स्तुति-गीत शुरू होता है: उस स्त्री का, जो ऊन और सन ढूँढ़ती है, खेत मोल लेती है, दासियों को काम बाँटती है, दीन के लिये मुट्ठी खोलती है, और जिसके बारे में अंत में कहा जाता है कि शोभा झूठी है पर यहोवा का भय मानने वाली की प्रशंसा होगी। दो चित्र, एक ही बात: बुद्धि सत्ता के गलियारों में और घर के आँगन में एक जैसी दिखती है।
मूल बात
कल्पना कीजिए उस समय के श्रोता को: धूल भरा फाटक, जहाँ पुरनिये बैठकर मुकदमे सुनते हैं, बकरियों की गंध, तराजू की खटपट, और कहीं पीछे एक विधवा जिसका खेत किसी ताकतवर ने हड़प लिया है। इस दुनिया में परमेश्वर की बुद्धि का पैमाना यह नहीं है कि आप कितना जानते हैं, बल्कि यह कि आपके हाथ किसके लिए खुलते हैं। राजा से कहा जाता है, "अपना मुँह खोल" गूँगे के लिये; स्त्री के बारे में कहा जाता है, "वह दीन के लिये मुट्ठी खोलती है।" वही क्रिया, वही करुणा, अलग-अलग जगहों पर। और यह सब पद 30 पर टिका है: यहोवा का भय। सौंदर्य और प्रतिष्ठा बाज़ार के भाव हैं, जो ऊपर-नीचे होते रहते हैं; परमेश्वर के सामने झुका हुआ जीवन ही वह पूँजी है जो मूँगों से महँगी है।
जोड़ने वाला सूत्र
नीतिवचन की शुरुआत में बुद्धि एक स्त्री की तरह गलियों और चौकों में पुकारती है, अध्याय 8 में तो वह सृष्टि के समय परमेश्वर के पास खड़ी है। और अब, किताब के आख़िरी पन्ने पर, वही बुद्धि माँस और हड्डी पहन लेती है: चरखा पकड़ती है, खेत का सौदा करती है, दासियों को काम बाँटती है। यह संयोग नहीं है। इस्राएल की बुद्धि कभी हवा में तैरने वाला विचार नहीं थी; वह रसोई, बाज़ार और फाटक में उतरती है। और यही पैटर्न मसीह में अपनी पूर्णता पाता है: परमेश्वर की बुद्धि देह बनकर हमारे बीच बसती है, गूँगों के लिये मुँह खोलती है, दीनों के लिये मुट्ठी खोलती है, और अंत में दुल्हन को महीन सन पहनाकर उसकी प्रशंसा करती है।
दर्पण
यह अध्याय अनगिनत स्त्रियों के लिये कोड़ा बन गया है। किसी ने पद 15 पढ़ा और सोचा कि उसे भी रात को उठना चाहिए, वरना वह विश्वासयोग्य नहीं। मगर ध्यान दीजिए: यह गीत किसी स्त्री को दी गई सूची नहीं है, यह एक बेटे को सिखाया गया भजन है, ताकि वह जान ले कि सम्मान किसके योग्य है। सवाल यह नहीं है, "क्या मैं इस स्तर पर पहुँचती हूँ?" सवाल यह है, "मैं किसकी कद्र करता हूँ?" उस सहकर्मी की, जो चुपचाप काम पूरा करती है? उस माँ की, जिसकी मेहनत की कोई रसीद नहीं बनती? और यदि आपके हाथ में कोई अधिकार है, चाहे कक्षा हो या दफ़्तर या कलीसिया की समिति, तो पद 8 आपके नाम है: मुँह खोलिए, उसके लिये जिसकी आवाज़ मेज़ पर नहीं है।
मुख्य पात्र
वह स्त्री कोई दबी-कुचली छाया नहीं है। मूल इब्रानी में उसे एशेत हयिल कहा गया है, और हयिल सेना का शब्द है: बल, पराक्रम, लड़ने की ताक़त। वह सौदेबाज़ी करती है, ज़मीन खरीदती है, व्यापारी को कमरबन्द बेचती है, और "परख लेती है कि मेरा व्यापार लाभदायक है।" उसका भीतरी परिदृश्य भी दिखता है: वह डरती नहीं, "हिम से नहीं डरती," और उसकी ज़ुबान पर कृपा है। उसकी सामर्थ्य का स्रोत उसका स्वभाव नहीं, बल्कि पद 30 है। जो परमेश्वर के आगे झुका है, वह और किसी के आगे काँपने की ज़रूरत नहीं समझता। यह रीढ़ है, गुण नहीं।
एक बारीकी
पद 25 का आधा हिस्सा हम जल्दी में पढ़ जाते हैं: "आनेवाले काल के विषय पर हँसती है।" उस दुनिया में यह हँसी लगभग गुस्ताख़ी थी। एक ख़राब फ़सल, एक टूटी बरसात, पति की एक बीमारी, और पूरा परिवार क़र्ज़ या गुलामी में। इसलिए तो उसका दिया रात को नहीं बुझता और घर में लाल ऊनी कपड़े रखे हैं: वह भविष्य की तैयारी करती है। मगर तैयारी और हँसी दोनों साथ हैं। तैयारी के बिना हँसी लापरवाही होती, और हँसी के बिना तैयारी घबराहट। जो परमेश्वर पर भरोसा रखता है, वह कल की चिंता में जमा नहीं करता; वह कल का मुँह देखकर मुस्कुराता है।
कठिन सवाल
फिर भी एक काँटा रह जाता है: इस स्त्री का नाम नहीं है। उसकी प्रशंसा तब खुलकर होती है जब पति फाटक पर बैठता है, और उसका मूल्य उसके उत्पादन में गिना जाता है। क्या यह पुरुष-केंद्रित दुनिया का ही आत्म-चित्र नहीं? ईमानदारी से: यह पाठ उसी दुनिया में लिखा गया, और उसे साफ़ करने की कोशिश बेईमानी होगी। मगर इसे पढ़ने वाले पहले श्रोताओं के लिए झटका कहीं और था। फाटक पर, जहाँ पुरुष निर्णय सुनाते थे, वहाँ अंतिम पद कहता है कि उसके कार्यों से "सभा में उसकी प्रशंसा होगी।" जिस जगह उसकी गिनती नहीं थी, वहीं उसका नाम गूँजेगा। पूरा जवाब नहीं मिलता, पर दरवाज़ा खुल जाता है।
चिंतन के लिये
आपके जीवन में वह कौन है जिसकी मेहनत आप देखते हैं पर कभी बोलकर उसका सम्मान नहीं करते, और इस हफ़्ते आप उसे क्या कहेंगे?
"आनेवाले काल के विषय पर हँसती है": आपके भीतर वह कौन-सा डर है जिसे आप तैयारी से नहीं, केवल परमेश्वर के भय से जीत पाएँगे?
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