बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 107:35

बाइबल

पाठ

पद 35 एक ही साँस में नक्शा बदल देता है: जहाँ बंजर, सूखा, निर्जन जंगल था, वहाँ परमेश्वर पानी का ताल बना देते हैं; जहाँ एक बूँद नहीं थी, वहाँ सोते फूट पड़ते हैं। यह वाक्य अकेला खड़ा नहीं है। ठीक इससे पहले उल्टी दिशा में वही हाथ काम कर रहा था: "वह नदियों को जंगल बना डालता है, और जल के सोतों को सूखी भूमि कर देता है।" और उसका कारण भी बताया गया, "वहाँ के रहनेवालों की दुष्टता के कारण।" पद 35 इसी का प्रतिबिंब है, पर विपरीत दिशा में, और ध्यान दीजिए, यहाँ कोई कारण नहीं दिया गया। उजाड़ने के पीछे मनुष्य की दुष्टता है; हरा करने के पीछे केवल परमेश्वर की करुणा।

मूल

यही असमानता इस पद का धार्मिक हृदय है। भजन 107 बार-बार एक ही ढाँचा दोहराता है: संकट, दुहाई, छुटकारा, धन्यवाद। पर पद 35 में कोई दुहाई नहीं सुनाई देती। जंगल पुकार नहीं सकता; सूखी ज़मीन प्रार्थना नहीं करती। फिर भी परमेश्वर वहाँ सोते खोल देते हैं। इसी चित्र को यशायाह बार-बार उठाता है, जब वह बँधुआई से लौटते लोगों के आगे मरुभूमि में जल और रेगिस्तान में नदियाँ देखता है, और यहेजकेल भी, जब सूखी हड्डियों की घाटी में साँस लौटती है। तीनों जगह एक ही धर्मविज्ञान है: उद्धार सुधार नहीं, सृष्टि है। परमेश्वर उस पर काम करते हैं जिसके पास देने को कुछ नहीं, जो केवल खालीपन दे सकता है। अनुग्रह का अर्थ यही है, और यह पद उसे भूगोल की भाषा में लिखता है।

सूत्र

इस चित्र का सबसे लंबा धागा यीशु मसीह तक जाता है, और वह बिना खींचतान के जाता है। सूखी भूमि पर पानी देना परमेश्वर का हस्ताक्षर है, और जब यीशु सामरी स्त्री से कुएँ पर बात करते हैं, तब वे उसी हस्ताक्षर को अपने ऊपर लिख लेते हैं: वे पानी ढूँढ़ने नहीं आए, वे सोता बनकर आए। भजन कहता है परमेश्वर निर्जल देश को जल के सोते कर देते हैं; सुसमाचार कहता है कि वह सोता एक व्यक्ति है। और ध्यान दीजिए, मसीह भी उन्हीं के पास गए जिनके पास पुकारने तक की भाषा नहीं थी, कोढ़ियों, मुर्दों, चुंगी लेनेवालों के पास। पद 36 इसे आगे बढ़ाता है: "वहाँ वह भूखों को बसाता है।" पानी के बाद घर, घर के बाद फसल। उद्धार कभी केवल बचाव नहीं होता, वह हमेशा बसावट तक जाता है।

दर्पण

हम सब के पास एक ऐसा इलाका है जिसे हमने मन ही मन बंजर घोषित कर दिया है। वह विवाह जिसमें बातचीत सूख चुकी है। वह बेटा जिसके लिए प्रार्थना करते-करते शब्द घिस गए। वह नौकरी जो दस साल से वही है, या वह शरीर जो अब पहले जैसा नहीं लौटेगा। पद 34 कहता है कि कुछ उजाड़ हमारी अपनी दुष्टता से बने, और यह सच कड़वा है, पर पद 35 उसके बाद आता है, उससे पहले नहीं। परमेश्वर का काम वहीं से शुरू होता है जहाँ हमारी व्याख्या खत्म होती है। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर अपने जीवन के उस एक क्षेत्र का नाम लिखिए जिसे आपने भीतर से त्याग दिया है, और उस कागज़ पर ज़ोर से यह वाक्य पढ़िए, "वह जंगल को जल का ताल करता है।" बस इतना; कोई हल सुझाए बिना।

एक बारीकी

"ताल" शब्द पर रुकिए। इब्रानी में यह जो शब्द है, वह बहते सोते का नहीं, ठहरे हुए जल का है, झील या कुंड, जैसा मिस्र की नील घाटी के कुंडों के लिए प्रयोग होता है। रेगिस्तान में अचानक बारिश होना कोई अनोखी बात नहीं; वहाँ नालियाँ कुछ घंटों के लिए भर जाती हैं और फिर रेत उन्हें पी जाती है। पर ताल ठहरता है। और उसके साथ "जल के सोते" हैं, यानी ऐसा स्रोत जो भीतर से खुद भरता रहे। परमेश्वर यहाँ राहत नहीं भेजते, वे भूगोल बदल देते हैं। यही अंतर है सहायता और उद्धार के बीच, और यही कारण है कि अगले पद में लोग वहाँ बस सकते हैं, टिक सकते हैं, शहर बना सकते हैं।

पहले श्रोता

जो लोग यह भजन पहली बार गा रहे थे, वे उन्हीं में से थे जिन्हें परमेश्वर ने "पूरब-पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से इकट्ठा किया है।" बँधुआई से लौटे लोग। उन्होंने अपनी आँखों से यहूदा को उजड़ते देखा था, खेत झाड़ियों में बदलते, नगर मलबा बनते। उनके लिए पद 34 कोई सिद्धांत नहीं था, वह उनका राष्ट्रीय शोक था, और पद 35 कोई काव्य नहीं था, वह उनके पैरों के नीचे की मिट्टी थी जिसे वे दोबारा जोत रहे थे। जब वे गाते थे कि वहाँ भूखे बसाए जाते हैं और दाख की बारियाँ लगाते हैं, तब वे अपनी ही टूटी-फूटी बस्तियों का वर्णन कर रहे थे, और यह कह रहे थे: यह हमारी मेहनत का फल नहीं, यह करुणा है।

पृष्ठभूमि

यह भजन भजन-संहिता के पाँचवें खंड का द्वार है, और उसकी जगह मंदिर की धन्यवाद-बलि के पास है, जैसा पद 22 में साफ दिखता है। कनान मिस्र या बेबीलोन नहीं था; वहाँ खेती नहर पर नहीं, आकाश से आनेवाली बारिश पर टिकी थी। इसलिए सूखा वहाँ केवल मौसम नहीं, वाचा का मामला था, और पानी केवल संसाधन नहीं, आशीष का प्रमाण। इस पृष्ठभूमि में पद 40 और 41 की उलटफेर भी समझ आती है: हाकिम भटकाए जाते हैं और दरिद्र ऊँचे पर रखे जाते हैं। जो परमेश्वर ज़मीन का नक्शा बदल सकते हैं, वे समाज की सीढ़ी भी उलट सकते हैं। यह भजन उन लोगों का गीत है जो सत्ता की नहीं, करुणा की गिनती करना सीख रहे थे।

चिंतन के प्रश्न

आपके जीवन का कौन सा "निर्जल देश" इतना पुराना हो चुका है कि आपने उसके लिए प्रार्थना करना ही छोड़ दिया, और क्यों?

पद 43 कहता है कि बुद्धिमान यहोवा की करुणा के कामों पर ध्यान करेगा। पिछले एक साल में ऐसा कौन सा ताल बना जिसे आपने संयोग समझकर गिना ही नहीं?

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Psalms 107:35 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 107:35 का क्या अर्थ है?
पद 35 एक ही साँस में नक्शा बदल देता है: जहाँ बंजर, सूखा, निर्जन जंगल था, वहाँ परमेश्वर पानी का ताल बना देते हैं; जहाँ एक बूँद नहीं थी, वहाँ सोते फूट पड़ते हैं। यह वाक्य अकेला खड़ा नहीं है। ठीक इससे पहले उल्टी दिशा में वही हाथ काम कर रहा था: "वह नदियों को जंगल बना डालता है, और जल के सोतों को सूखी भूमि कर देता है।" और उसका कारण भी बताया गया, "वहाँ के रहनेवालों की दुष्टता के कारण।" पद 35 इसी का प्रतिबिंब है, पर विपरीत दिशा में, और ध्यान दीजिए, यहाँ कोई कारण नहीं दिया गया। उजाड़ने के पीछे मनुष्य की दुष्टता है; हरा करने के पीछे केवल परमेश्वर की करुणा।
भजन संहिता 107:35 किस विषय में है?
इस चित्र का सबसे लंबा धागा यीशु मसीह तक जाता है, और वह बिना खींचतान के जाता है। सूखी भूमि पर पानी देना परमेश्वर का हस्ताक्षर है, और जब यीशु सामरी स्त्री से कुएँ पर बात करते हैं, तब वे उसी हस्ताक्षर को अपने ऊपर लिख लेते हैं: वे पानी ढूँढ़ने नहीं आए, वे सोता बनकर आए। भजन कहता है परमेश्वर निर्जल देश को जल के सोते कर देते हैं; सुसमाचार कहता है कि वह सोता एक व्यक्ति है। और ध्यान दीजिए, मसीह भी उन्हीं के पास गए जिनके पास पुकारने तक की भाषा नहीं थी, कोढ़ियों, मुर्दों, चुंगी लेनेवालों के पास। पद 36 इसे आगे बढ़ाता है: "वहाँ वह भूखों को बसाता है।" पानी के बाद घर, घर के बाद फसल। उद्धार कभी केवल बचाव नहीं होता, वह हमेशा बसावट तक जाता है।
भजन संहिता 107:35 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
"ताल" शब्द पर रुकिए। इब्रानी में यह जो शब्द है, वह बहते सोते का नहीं, ठहरे हुए जल का है, झील या कुंड, जैसा मिस्र की नील घाटी के कुंडों के लिए प्रयोग होता है। रेगिस्तान में अचानक बारिश होना कोई अनोखी बात नहीं; वहाँ नालियाँ कुछ घंटों के लिए भर जाती हैं और फिर रेत उन्हें पी जाती है। पर ताल ठहरता है। और उसके साथ "जल के सोते" हैं, यानी ऐसा स्रोत जो भीतर से खुद भरता रहे। परमेश्वर यहाँ राहत नहीं भेजते, वे भूगोल बदल देते हैं। यही अंतर है सहायता और उद्धार के बीच, और यही कारण है कि अगले पद में लोग वहाँ बस सकते हैं, टिक सकते हैं, शहर बना सकते हैं।
भजन संहिता 107:35 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह भजन भजन-संहिता के पाँचवें खंड का द्वार है, और उसकी जगह मंदिर की धन्यवाद-बलि के पास है, जैसा पद 22 में साफ दिखता है। कनान मिस्र या बेबीलोन नहीं था; वहाँ खेती नहर पर नहीं, आकाश से आनेवाली बारिश पर टिकी थी। इसलिए सूखा वहाँ केवल मौसम नहीं, वाचा का मामला था, और पानी केवल संसाधन नहीं, आशीष का प्रमाण। इस पृष्ठभूमि में पद 40 और 41 की उलटफेर भी समझ आती है: हाकिम भटकाए जाते हैं और दरिद्र ऊँचे पर रखे जाते हैं। जो परमेश्वर ज़मीन का नक्शा बदल सकते हैं, वे समाज की सीढ़ी भी उलट सकते हैं। यह भजन उन लोगों का गीत है जो सत्ता की नहीं, करुणा की गिनती करना सीख रहे थे।
भजन संहिता 107:35 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पद 43 कहता है कि बुद्धिमान यहोवा की करुणा के कामों पर ध्यान करेगा। पिछले एक साल में ऐसा कौन सा ताल बना जिसे आपने संयोग समझकर गिना ही नहीं?
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Psalms 107 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 33

वह नदियों को जंगल बना देता है, और जल के सोतों को सूखी भूमि कर देता है।" जो कभी बहता था, वह सूख भी सकता है। पर अगली ही आयतों में परमेश्वर मरुभूमि को जल का ताल बना देता है। तेरी सूखी जगह उसके हाथ से बाहर नहीं है। पूछ खुद से: क्या मैंने धारा पर भरोसा किया, या धारा देनेवाले पर?

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