भजन संहिता 115:1
पाठ
"हमारी नहीं, हमारी नहीं" — यह दोहराव ही इस पद की धड़कन है। भजनकार परमेश्वर के सामने खड़ा होकर महिमा को अपने हाथ से परे सरका देता है, मानो कोई जलता हुआ अंगारा दूसरे की हथेली में रख रहा हो, क्योंकि वह जानता है कि यह बोझ उसका नहीं है। वह कहता है: हे यहोवा, जो सम्मान, जो वाहवाही, जो नाम मिलना है, वह हमें नहीं, आपके ही नाम को मिले। और इसका कारण वह अपनी योग्यता में नहीं ढूँढ़ता, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव में: "अपनी करुणा और सच्चाई के निमित्त।" यानी महिमा इसलिए आपकी हो, क्योंकि करुणा आपकी है और वचन का पक्का होना आपका है। अगले पद में साफ हो जाता है कि यह प्रार्थना किसी शांत मंदिर में नहीं, बल्कि दबाव में फुसफुसाई गई है: जातियाँ ताना मार रही हैं, "उनका परमेश्वर कहाँ रहा?"
मूल बात
यह पद मनुष्य की सबसे गहरी बीमारी पर उँगली रखता है: हम हर अच्छी चीज़ पर अपना नाम लिख देना चाहते हैं। भजनकार इसका इलाज आत्म-निंदा में नहीं खोजता, वह यह नहीं कहता कि हम कीड़े-मकोड़े हैं; वह केवल दिशा बदलता है। महिमा का प्रवाह हमसे होकर गुज़रे, हममें ठहरे नहीं। और ध्यान दीजिए, यहाँ परमेश्वर की महिमा और उसके लोगों का उद्धार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू। "करुणा और सच्चाई" इब्रानी में वह जोड़ी है (हेसेद वेएमेत) जो परमेश्वर ने सीनै पर अपने नाम के साथ बाँधी थी: वाचा-निभाने वाला प्रेम और भरोसेमंद वफ़ादारी। इसका अर्थ है कि भजनकार परमेश्वर से उसकी प्रतिष्ठा की माँग करके असल में अपने बचाव की माँग कर रहा है। जब परमेश्वर अपने नाम के लिए काम करते हैं, तब दुर्बल लोग बचते हैं। अनुग्रह की जड़ यहीं है: हमारा उद्धार हमारी योग्यता पर नहीं, उनके नाम की साख पर टिका है।
साझा सूत्र
यह प्रार्थना पुराने नियम में अधूरी लटकी रहती है। इस्राएल चाहता था कि महिमा परमेश्वर की हो, पर बार-बार अपने ही नाम के पीछे भागा; मंदिर, राजा, सेना, सब कुछ उसने अपनी प्रतिष्ठा का सहारा बना लिया। "हमारी नहीं, हमारी नहीं" ऐसी प्रार्थना है जिसे पूरी तरह केवल एक ही व्यक्ति ने जिया। यीशु मसीह ने अपनी सेवकाई में बार-बार कहा कि वे अपनी नहीं, भेजने वाले की महिमा ढूँढ़ते हैं, और यूहन्ना में वे क्रूस के ठीक पहले पिता से यही माँगते हैं कि पिता अपने नाम की महिमा करें। जो भजनकार ने चाहा, वह गतसमनी में माँस और लहू बन गया। और इससे भी गहरा यह है: क्रूस पर परमेश्वर की "करुणा और सच्चाई" आपस में मिलती हैं, क्योंकि वहाँ वाचा का प्रेम और वाचा की सच्चाई दोनों एक साथ निभाई जाती हैं। मसीह ने महिमा अपने हाथ से परे सरकाई, और पिता ने उन्हें जिला कर वही महिमा लौटा दी।
दर्पण
यह पद उस जगह चुभता है जहाँ हम सबसे कम चुभन चाहते हैं: उस ईमेल में जिसमें आपने "मैंने" शब्द तीन बार डाला, उस सभा में जहाँ किसी और की तारीफ़ सुनकर भीतर कुछ सिकुड़ गया, उस सेवकाई में जहाँ आपका मन चाहता है कि लोग जानें कि यह काम किसके पीछे था। और इसका उल्टा पहलू भी है: जब कोई आपका नाम बिगाड़ देता है, तब बेचैनी इसलिए होती है क्योंकि हमने अपनी सुरक्षा अपने नाम की साख पर रखी थी। भजनकार एक दूसरा सहारा देता है। आपकी हिफ़ाज़त आपकी प्रतिष्ठा में नहीं, परमेश्वर की प्रतिष्ठा में है, और वह प्रतिष्ठा कभी नहीं गिरती। आज यह कीजिए: इस हफ़्ते का एक काम कागज़ पर लिखिए जिसके लिए आप चाहते थे कि कोई आपको श्रेय दे, और उस लिखे हुए वाक्य के ऊपर ज़ोर से कहिए, "हे यहोवा, हमारी नहीं, हमारी नहीं, वरन् अपने ही नाम की महिमा।"
श्रोता
इस भजन के पहले सुनने वाले शायद निर्वासन से लौटे वे लोग थे जिनका मंदिर छोटा था, शहर अधबना, और पड़ोसी ताक़तवर। उनके कानों में पद 2 का ताना रोज़ गूँजता था: "उनका परमेश्वर कहाँ रहा?" यह कोई दार्शनिक सवाल नहीं था, यह राजनीतिक मज़ाक था। जिस जाति का देवता हारता है, उसकी इज़्ज़त नहीं रहती। बाबेल के भव्य जुलूसों में सोने-चाँदी की मूरतें कंधों पर ढोई जाती थीं, और इस्राएल के पास दिखाने को कुछ नहीं था, कोई मूरत नहीं, कोई साम्राज्य नहीं, केवल एक नाम। इसीलिए यह पद ऐसे लोगों के मुँह से निकला है जिनके पास अपनी महिमा बची ही नहीं थी। जब सब कुछ छिन जाए, तब "हमारी नहीं" कहना त्याग नहीं, सच बोलना है।
एक बारीकी
दोहराव को हल्के में मत लीजिए। इब्रानी में "लो लानू, लो लानू" दो बार आता है, और भाषा में दोहराव ज़ोर देने का तरीक़ा है, जैसे कोई अपनी बात पर मुहर लगा रहा हो। पर यहाँ एक और बात है: पहली बार कहने पर मन पूरी तरह राज़ी नहीं होता। हमें दूसरी बार कहना पड़ता है, क्योंकि भीतर का कोई हिस्सा अब भी थोड़ी-सी महिमा अपने लिए बचा रखना चाहता है। यह प्रार्थना एक बार की घोषणा नहीं, बार-बार की जाने वाली लड़ाई है। और ध्यान दीजिए कि भजन इसी से शुरू होता है, मानो परमेश्वर की स्तुति तक पहुँचने से पहले कुछ साफ़ करना ज़रूरी हो। जब तक हमारा नाम रास्ते के बीच खड़ा है, हम उपासना नहीं, प्रदर्शन करते हैं।
शास्त्र-संवाद
यहेजकेल 36 में परमेश्वर कहते हैं कि वे इस्राएल को उसकी भलाई के कारण नहीं, बल्कि अपने पवित्र नाम के कारण बहाल करेंगे; यह भजन 115:1 का दूसरा पहलू है, जहाँ भजनकार वही माँग रहा है जो परमेश्वर पहले से करने का वचन दे चुके हैं। और इसी भजन के भीतर एक तीखा विरोधाभास बैठा है: पद 8 कहता है, "जैसी वे हैं वैसे ही उनके बनानेवाले हैं; और उन पर सब भरोसा रखनेवाले भी वैसे ही हो जाएँगे।" जिस चीज़ को आप महिमा देते हैं, आप उसी के जैसे बनते जाते हैं। गूँगी मूरत पूजने वाला गूँगा हो जाता है। जीवित परमेश्वर के नाम को महिमा देने वाला जीवित होता जाता है, और इसीलिए भजन पद 18 में इस वादे पर ख़त्म होता है कि हम सर्वदा तक उन्हें धन्य कहते रहेंगे।
मनन के प्रश्न
इस हफ़्ते आपने किस काम या किस रिश्ते में चुपचाप यह चाहा कि लोग आपका नाम जानें, और वहाँ "हमारी नहीं" कहने की असल क़ीमत क्या होगी?
यदि आपकी सुरक्षा आपकी अपनी साख पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की करुणा और सच्चाई पर टिकी है, तो किस डर को आज ढीला छोड़ा जा सकता है?
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Psalms 115:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 115:1 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 115:1 किस विषय में है?
भजन संहिता 115:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 115:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 115:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 115 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, आप ही बढ़ाने वाले हैं। मेरे हाथ के काम में, मेरे घर में और मेरे बच्चों के जीवन में अपनी आशीष बरसाइए। जहाँ मुझे लगता है कि कुछ कम पड़ रहा है, वहाँ आप पर भरोसा रखना सिखाइए। जो आप देते हैं, वही काफी है, और वही पीढ़ियों तक बना रहता है।
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