रोमियों 8:32
यह पाठ
पौलुस एक ऐसे वाक्य पर पहुँचता है जो तर्क कम और गवाही ज़्यादा लगता है: परमेश्वर ने अपने ही पुत्र को अपने पास सुरक्षित नहीं रखा, बचाकर नहीं रखा, बल्कि "हम सब के लिये दे दिया।" और फिर वह इसी से एक निष्कर्ष खींचता है, प्रश्न के रूप में, उत्तर के रूप में नहीं: "वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?" यह पिछले वचन की धारा में बहता है, जहाँ उसने पूछा था, "यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?" वचन 32 उस दावे का सबूत है। परमेश्वर हमारी ओर हैं, यह भावना नहीं, यह इतिहास है, और उसका नाम क्रूस है।
मूल बात
यहाँ तर्क बड़े से छोटे की ओर चलता है, और उसी में इसकी ताकत है। यदि परमेश्वर ने सबसे कीमती चीज़ रोक नहीं रखी, तो बाकी सब रोकने का कोई कारण नहीं बचता। ध्यान दीजिए, पौलुस हमारी योग्यता पर एक शब्द नहीं कहता। निश्चय की जड़ हमारे भीतर नहीं, परमेश्वर के पहले किए गए काम में है। और यह "सब कुछ" कोई खुला चेक नहीं है जिसे हम अपनी इच्छाओं से भर लें; यह "उसके साथ" दिया जाता है, अर्थात् मसीह के साथ, उसी में लिपटा हुआ। जो पुत्र को पाता है, वह वारिस भी बनता है, जैसा वचन 17 कह चुका है। इसलिए यह पद हमें समृद्धि का वादा नहीं, बल्कि एक ऐसे पिता का चेहरा दिखाता है जो कंजूस नहीं, और जिसकी उदारता की कीमत उन्होंने स्वयं चुकाई।
सामान्य सूत्र
"न रख छोड़ा" वाली भाषा अचानक नहीं आती। उत्पत्ति 22 में मोरिय्याह पहाड़ पर परमेश्वर अब्राहम से यही कहते हैं कि उसने अपने इकलौते पुत्र को रोक नहीं रखा। वहाँ अंतिम क्षण में छुरी रुक जाती है और एक मेढ़ा झाड़ी में फँसा मिलता है। पौलुस उसी छवि को उठाता है और उलट देता है: इस बार पिता स्वयं हैं, और इस बार कोई हाथ नहीं रोकता, कोई विकल्प झाड़ी में नहीं मिलता। इसहाक बचा, पुत्र नहीं बचाया गया। यह जोड़ अलंकार नहीं, बल्कि वह धागा है जो पूरे इतिहास में खिंचा है: परमेश्वर जो माँगते हैं, वही अंततः स्वयं देते हैं। बलिदान की पूरी व्यवस्था, हर मेमना, हर वेदी, इसी एक दिन की ओर उँगली उठाती रही, जब तक वचन 3 का वाक्य सच नहीं हो गया कि उन्होंने अपने ही पुत्र को पाप के बलिदान होने के लिये भेजा।
दर्पण
हमारे भीतर एक चुपचाप बैठा संदेह है कि परमेश्वर कंजूस हैं। वह संदेह तब बोलता है जब महीने के अंत में हिसाब नहीं बैठता, जब रिपोर्ट दोबारा करानी पड़ती है, जब बच्चा फ़ोन नहीं उठाता, जब वही प्रार्थना तीसरे साल भी बिना उत्तर के पड़ी है। तब मन कहता है कि परमेश्वर देते तो हैं, पर नापकर, और शायद मेरा हिस्सा खत्म हो चुका है। पौलुस इस संदेह से बहस नहीं करता, वह उसे क्रूस के सामने खड़ा कर देता है। जिसने सबसे कीमती चीज़ बिना हिचक दे दी, उसके बारे में यह मान लेना कि वह अब छोटी चीज़ों में हाथ खींच रहा है, तर्क की दृष्टि से भी बेतुका है। आज एक काम कीजिए: एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसे देने से आपको डर है कि परमेश्वर इनकार कर देंगे, और उसके नीचे लिखिए, "उन्होंने अपने पुत्र को नहीं रोका," फिर वह वाक्य ज़ोर से पढ़िए।
प्रोफ़ाइल
रोम की कलीसिया साम्राज्य की राजधानी में बैठी थी, जहाँ सत्ता का मतलब था तलवार, और तलवार वचन 35 में यूँ ही नहीं आती। इनमें से कई यहूदी विश्वासी कुछ ही साल पहले क्लौदियुस के आदेश से शहर से निकाले गए थे और अब लौटे थे, अपनी जगह खोकर, संदेह की निगाह में। कई अन्यजाति विश्वासी घरों के दास थे, जिनके पास कानूनी रूप से कुछ भी अपना नहीं था। ऐसे लोगों के कानों में "वारिस" और "लेपालकपन" शब्द बिजली की तरह गिरते होंगे, क्योंकि रोमी कानून में गोद लिया गया पुत्र पूरा हकदार बनता था, बिना किसी शर्त के। पौलुस उन्हें यह नहीं कह रहा कि सताव खत्म हो जाएगा। वह कह रहा है कि जिसने पुत्र दे दिया, वह अदालत में, बाज़ार में, अखाड़े में भी तुम्हारी ओर है।
बारीकी
"दे दिया" शब्द पर रुकिए। यूनानी में यह παρέδωκεν (परेदोकेन) है, वही क्रिया जो सुसमाचारों में तब आती है जब यहूदा यीशु को पकड़वाता है और जब पिलातुस उसे भीड़ के हवाले करता है। विश्वासघात और अन्याय की भाषा। पौलुस जानबूझकर यही शब्द चुनता है और उसका कर्ता बदल देता है: सबसे गहरे स्तर पर यह यहूदा का काम नहीं था, न पिलातुस का, न रोम का। पिता ने सौंपा। यह सोचने में असहज है, और होना भी चाहिए। क्रूस कोई दुर्घटना नहीं थी जिसे परमेश्वर ने बाद में सुधार लिया; वह वही जगह है जहाँ उनका प्रेम सबसे साफ़ दिखता है। और जो सौंपा गया, वह अब वचन 34 के अनुसार दाहिनी ओर बैठा हमारे लिये निवेदन कर रहा है।
अंतर्पाठ
यशायाह 53 में वह दास है जिसे हमारे अपराधों के कारण कुचला गया, और वहाँ भी यह कहा जाता है कि यह परमेश्वर की इच्छा थी। पौलुस उसी धारा में बोल रहा है, इसलिए उसका "दे दिया" क्रूरता नहीं, बल्कि पूर्वघोषित उद्धार है। और फिर भजन संहिता 44, जिसे पौलुस वचन 36 में उद्धृत करता है: "तेरे लिये हम दिन भर मार डाले जाते हैं।" यह जोड़ महत्वपूर्ण है, क्योंकि "सब कुछ" पाने वाले लोग वही हैं जिन्हें "वध होनेवाली भेड़ों के समान" गिना जाता है। वचन 32 का वादा कठिनाई को मिटाता नहीं, उसे घेर लेता है। इसी से वचन 37 का दावा टिकता है कि हम विजेता से भी बढ़कर हैं, हार के बीच में नहीं, हार के बावजूद भी नहीं, बल्कि उसके द्वारा जिसने हमसे प्रेम किया।
चिंतन
आप किस विशेष चीज़ में मन ही मन मानते हैं कि परमेश्वर आपके साथ कंजूसी कर रहे हैं, और क्रूस उस मान्यता से क्या कहता है?
"सब कुछ" जो मसीह के साथ दिया जाता है, उसमें क्या-क्या शामिल है, और आपकी माँगों की सूची से वह कहाँ अलग दिखती है?
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Romans 8:32 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
रोमियों 8:32 का क्या अर्थ है?
रोमियों 8:32 किस विषय में है?
रोमियों 8:32 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 8:32 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 8:32 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 8 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मैं अक्सर उन्हीं पुरानी जंजीरों में लौट जाता हूँ, जिनसे तूने मुझे छुड़ाया है। आज मुझे याद दिला कि तेरे आत्मा ने मुझे मसीह में आज़ाद कर दिया है। मेरे डर और अपराधबोध पर तेरा जीवन भारी पड़े, और मैं सचमुच स्वतंत्र होकर जीऊँ।
पिता, तू मेरे मन की गहराई तक देखता है, वहाँ भी जहाँ मैं खुद नहीं देख पाता। जब शब्द नहीं मिलते और प्रार्थना अधूरी रह जाती है, तेरा आत्मा मेरे लिए बोलता है। यह जानकर मेरा बोझ हल्का हो जाता है। मुझे भरोसा दे कि तू मेरी चुप्पी भी समझता है।
शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो वह परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है और न हो सकता है।"
ध्यान दे, पौलुस यह नहीं कहता कि शरीरिक मन परमेश्वर के अधीन होता नहीं, वह कहता है हो ही नहीं सकता। यही बात हमें तोड़ती है। हम सोचते हैं थोड़ी और कोशिश, थोड़ा और संकल्प। पर यहाँ बात ताकत की नहीं, स्वभाव की है। तुझे सुधार नहीं, नया जीवन चाहिए। और वही तो मसीह देने आया है।
पौलुस ने पहले गिनाया था: क्लेश, संकट, उपद्रव, अकाल, नंगाई, संकट, तलवार। और फिर लिखा, "परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया है, जयवन्तों से भी बढ़कर हैं।"
ध्यान दे, वह नहीं कहता कि इन बातों से बाहर निकलकर, बल्कि इन्हीं के बीच में। तेरी जीत तेरी परिस्थिति बदलने से नहीं, उस प्रेम से आती है जो आग में तेरे साथ खड़ा है।
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