भजन संहिता 120
पाठ
भजन 120 एक छोटी, तीखी प्रार्थना है। कवि कहता है कि संकट में उसने यहोवा को पुकारा और उत्तर मिला, और फिर वह तुरंत अपनी असली पीड़ा खोलकर रख देता है: "हे यहोवा, झूठ बोलनेवाले मुँह से और छली जीभ से मेरी रक्षा कर।" वह उस छली जीभ से सीधे बात करता है और पूछता है कि उसका उचित प्रतिफल क्या हो, और स्वयं उत्तर देता है: योद्धा के नुकीले तीर और झाऊ की जलती हुई अंगारें। अंत में वह अपनी स्थिति पर विलाप करता है, मानो वह मेशेक और केदार जैसे दूर, बर्बर इलाकों में परदेशी हो, ऐसे लोगों के बीच जो शांति से घृणा करते हैं। आखिरी पंक्ति सब कुछ कह देती है: "मैं तो मेल चाहता हूँ; परन्तु मेरे बोलते ही, वे लड़ना चाहते हैं।"
मर्म
यह भजन एक असुविधाजनक सच्चाई सामने रखता है: शब्द हथियार हैं, और उनसे लगे घाव असली होते हैं। कवि तलवार से नहीं, जीभ से घायल है, और वह इस चोट को इतना गंभीर मानता है कि वह इसे सीधे परमेश्वर के सामने ले जाता है। यहाँ परमेश्वर का चित्र यही है: वे उस न्यायी हैं जो झूठ को हल्के में नहीं लेते। ध्यान दीजिए, भजनकार बदला अपने हाथ में नहीं लेता; वह छली जीभ को शाप देने के बजाय पूछता है कि परमेश्वर उसे क्या देंगे। यही अंतर धार्मिकता और कड़वाहट के बीच की रेखा है। और सबसे चुभने वाली बात अंत में है: शांति चाहना आपको शांति की गारंटी नहीं देता। कभी-कभी मेल की इच्छा ही दूसरों में लड़ाई जगा देती है, और तब भी सच्चाई और शांति को छोड़ देना विकल्प नहीं है।
सूत्र
भजन 120 उन पंद्रह "यात्रा के गीतों" में पहला है जो यरूशलेम की ओर चढ़ते तीर्थयात्री गाते थे। यह क्रम अर्थपूर्ण है: परमेश्वर की ओर यात्रा वहीं से शुरू होती है जहाँ आप हैं, झूठ और शत्रुता के बीच, न कि किसी शुद्ध, शांत जगह से। पूरी बाइबल इसी दिशा में बहती है। और जब मसीह आते हैं, तो वे ठीक इसी भजन की स्थिति में खड़े होते हैं: झूठे गवाहों से घिरे, छली जीभों के निशाने पर, और फिर भी वे मेल के राजकुमार। जो कवि यहाँ केवल चाह सकता था, "मैं तो मेल चाहता हूँ," उसे मसीह ने अपने शरीर में पूरा किया, बिना लौटकर वार किए। यह भजन इसलिए केवल शिकायत नहीं, बल्कि उस मेल की प्यास है जो क्रूस पर उत्तर पाती है।
दर्पण
यह भजन आपसे एक असहज प्रश्न पूछता है: आप किस पक्ष में हैं? दफ्तर की उस बातचीत में जहाँ किसी सहकर्मी की छवि धीरे-धीरे बिगाड़ी जा रही है और आप चुप रहकर सहमत दिखते हैं; परिवार के उस समूह में जहाँ एक अधूरा सच भेज देना बहुत आसान है; पैसे के उस सौदे में जहाँ आप वह नहीं बताते जो बताना चाहिए। छली जीभ हमेशा दूसरों की नहीं होती। और दूसरी ओर, यदि आप सचमुच घायल हैं, तो यह भजन आपको अपनी पीड़ा को छोटा कहने की अनुमति नहीं देता, पर बदला लेने की भी नहीं। कवि अपना मुकदमा परमेश्वर के हाथ में सौंपता है और खुद मेल चाहता रहता है।
आज ही करें: जिस व्यक्ति के बारे में आपने पिछले हफ्ते कुछ ऐसा कहा जो पूरी तरह सच नहीं था, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, और उसी व्यक्ति से या जिससे आपने कहा था उससे एक वाक्य में कहिए, "जो मैंने कहा, वह सही नहीं था।"
मुख्य पात्र
इस भजन का बोलने वाला थका हुआ आदमी है, पर टूटा नहीं। उसकी भावनात्मक दुनिया को "हाय, हाय" शब्द खोल देते हैं: यह विलाप है, ठंडी प्रार्थना नहीं। वह अपने आसपास के लोगों से इतना अलग-थलग महसूस करता है कि खुद को दूर, असभ्य इलाकों में परदेशी कहता है, हालाँकि शायद वह अपने ही घर में बैठा है। यही अकेलापन सबसे भारी है: अपनों के बीच पराया होना। पर ध्यान दीजिए, वह न भागता है, न हथियार उठाता है। वह पुकारता है, और "उसने मेरी सुन ली" पहले ही वाक्य में खड़ा है, मानो वह जानता हो कि सुनवाई ही उसका सहारा है। यह विश्वास का कठोर, ज़िद्दी रूप है, जो बदले हालात से नहीं, सुनने वाले परमेश्वर से जीता है।
अंतर्पाठ
याकूब का पत्र इसी सच्चाई को दूसरी दिशा से पकड़ता है: जीभ छोटी है पर आग लगा देती है। भजन 120 पीड़ित की ओर से बोलता है, याकूब बोलने वाले की ओर से, और दोनों मिलकर हमें कहीं छिपने नहीं देते। दूसरी ओर, यीशु का वचन "धन्य हैं वे जो मेल कराते हैं" इस भजन की अंतिम पंक्ति पर नई रोशनी डालता है। कवि की शिकायत, कि उसके मेल चाहने पर भी लोग लड़ना चाहते हैं, मसीह के शिष्यों के लिए अपवाद नहीं बल्कि अपेक्षित अनुभव बन जाती है। मेल कराने वाला होना सुरक्षित पद नहीं है; यह अक्सर दोनों पक्षों से चोट खाने की जगह है, और फिर भी उसी को धन्य कहा गया।
पृष्ठभूमि
मेशेक उत्तर में, काले सागर के आसपास का क्षेत्र था; केदार दक्षिण-पूर्व के अरब मरुस्थल के खानाबदोश। एक ही समय में दोनों जगह रहना असंभव है, इसलिए यह भौगोलिक जानकारी नहीं, एक कड़वा मुहावरा है: "मैं ऐसे लोगों के बीच फँसा हूँ जिनकी भाषा और मूल्य मेरे नहीं हैं।" प्राचीन पूर्व में प्रतिष्ठा ही जीवन थी; किसी पर झूठा आरोप लगाना उसे सामाजिक और कानूनी रूप से मार डालने जैसा था, क्योंकि अदालत गवाहों के शब्दों पर चलती थी। इसीलिए तीरों और अंगारों की भाषा अतिशयोक्ति नहीं लगती। झाऊ की लकड़ी के कोयले असाधारण रूप से देर तक जलते हैं, जैसे झूठ के परिणाम, जो बहुत बाद तक सुलगते रहते हैं।
चिंतन
पिछले सात दिनों में आपने किसी के बारे में जो कहा, उसमें कितना हिस्सा आप उस व्यक्ति के सामने दोहरा सकते थे?
जब आपके मेल चाहने पर भी दूसरा लड़ना चाहता है, तो आप क्या करते हैं: पीछे हटते हैं, वार लौटाते हैं, या परमेश्वर के सामने मामला रखते हैं?
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Psalms 120 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 120 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 120 किस विषय में है?
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भजन संहिता 120 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 120 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब चारों ओर से मुश्किलें घेर लेती हैं, तब मेरी पहली आवाज़ तेरी ओर उठे। मैं जानता हूँ तू सुनता है, चाहे जवाब देर से आए। मेरे डर और बेचैनी को अपने हाथों में ले ले, और मुझे भरोसा दे कि मैं अकेला नहीं हूँ।
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