भजन संहिता 3
पाठ
दाऊद गिनती कर रहा है, और गिनती डरावनी है: सतानेवाले बढ़ते जा रहे हैं, विरोध में उठनेवाले "बहुत हैं", और उनके मुँह से सबसे घातक वाक्य निकलता है, कि "उसका बचाव परमेश्वर की ओर से नहीं हो सकता।" इसी गिनती के बीच वह मुड़कर कहता है कि यहोवा उसकी ढाल हैं, उसकी महिमा हैं, उसके मस्तक को ऊँचा करनेवाले हैं; वह ऊँचे शब्द से पुकारता है और उत्तर पाता है। फिर वह वह करता है जो घिरा हुआ आदमी सबसे कम कर पाता है: लेट जाता है, सो जाता है, और जाग उठता है, क्योंकि यहोवा उसे सम्भालते हैं। अंत में वह परमेश्वर को उठने के लिए पुकारता है और घोषणा करता है, "उद्धार यहोवा ही की ओर से होता है।"
मूल बात
इस भजन का धड़कता हुआ केंद्र शत्रुओं की संख्या नहीं, बल्कि उनका ताना है: परमेश्वर तुझे नहीं बचाएँगे। यह हमला हथियार से नहीं, धर्मशास्त्र से किया गया है, और इसीलिए ज़्यादा गहरा काटता है। दाऊद इसका उत्तर आँकड़ों से नहीं देता; वह अपने पक्ष की गिनती नहीं करता। वह परमेश्वर के चरित्र की ओर मुड़ता है, और तीन शब्द चुनता है: ढाल, महिमा, मस्तक ऊँचा करनेवाले। ढाल सुरक्षा है, महिमा उसकी प्रतिष्ठा है जो उससे छीनी जा रही थी, और झुका हुआ सिर उठाना अपमानित व्यक्ति की मर्यादा लौटाना है। यहाँ नैतिक भार साफ़ है: जिस व्यक्ति की सुरक्षा और सम्मान परमेश्वर के हाथ में है, उसे अपनी इज़्ज़त खुद बचाने के लिए झूठ, बदला या चालाकी की ज़रूरत नहीं। "उद्धार यहोवा ही की ओर से होता है" कोई भावुक तकिया-कलाम नहीं; यह उस आदमी का व्यावहारिक निर्णय है जो अपने बचाव का काम किसी और को सौंप रहा है, और इसीलिए सो पाता है।
जोड़नेवाला सूत्र
दाऊद का सिंहासन छिन चुका है, उसका बेटा उसके पीछे है, और लोग कह रहे हैं कि परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया। यह वही आकार है जिसमें बाद में एक और राजा चलेगा: अपमानित, घिरा हुआ, और उसके चारों ओर खड़े लोग यही ताना मारते हुए कि अगर परमेश्वर उसके साथ हैं तो अब बचा क्यों नहीं लेते। क्रूस पर वह ताना अपने चरम पर पहुँचता है, और वहाँ उसका उत्तर भी वही है जो इस भजन का है: बचाव अपने हाथ में नहीं लिया जाता, वह परमेश्वर के हाथ में सौंपा जाता है। और फिर आती है वह पंक्ति जो पद पाँच से सीधे जुड़ती है, लेटना, सोना, जाग उठना। दाऊद के लिए यह एक रात थी; मसीह के लिए यह मृत्यु और पुनरुत्थान बन गया। "उद्धार यहोवा ही की ओर से होता है" इसलिए इस भजन में एक अनुभव है और सुसमाचार में एक तथ्य।
दर्पण
सोचिए कि दफ़्तर में किसी ने आपके बारे में ऐसी बात फैलाई जो आधी सच और पूरी ज़हरीली है। पहला आवेग क्या होता है? सफ़ाई देना, सबूत जमा करना, अपने पक्ष में लोग गिनना, रात को दो बजे तक उन्हीं वाक्यों को मन में दोहराना जो आप कल कहेंगे। यही तो दाऊद कर सकता था और नहीं करता। परिवार में भी यही होता है: वह भाई जिसने ज़मीन के बँटवारे में धोखा किया, वह रिश्तेदार जिसने शादी में आपको नीचा दिखाया। हम अपनी इज़्ज़त की रक्षा में वे काम करने को तैयार हो जाते हैं जो हमारी इज़्ज़त को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाते हैं। भजन की धार यहाँ है: अगर परमेश्वर ही आपके मस्तक को ऊँचा करनेवाले हैं, तो अपने सम्मान की कालाबाज़ारी बंद कीजिए। और उसकी परीक्षा बहुत साधारण है, नींद। जो आदमी अपना मुकदमा खुद लड़ रहा है, वह सो नहीं सकता।
आज रात बत्ती बुझाने से पहले फोन दूसरे कमरे में रख दीजिए, और ऊँची आवाज़ में, अकेले, यह वाक्य कहिए: "यहोवा मुझे सम्भालता है", फिर उस एक व्यक्ति का नाम बोलिए जिससे आप इस समय डरते हैं, और चुप हो जाइए।
अन्य पाठों की गूँज
नाव में तूफ़ान के बीच यीशु का सोना अकसर हमें अटपटा लगता है, जैसे लापरवाही हो। भजन 3 पढ़ने के बाद वह दृश्य बदल जाता है: सोना अविश्वास नहीं, विश्वास की सबसे ठोस मुद्रा है, और शिष्यों का जागना घबराहट थी, सतर्कता नहीं। दूसरी गूँज पौलुस के उस प्रश्न में है कि यदि परमेश्वर हमारी ओर हैं तो कौन हमारे विरुद्ध हो सकता है; वह प्रश्न ठीक उसी ताने का उत्तर है जो पद दो में उठाया गया, कि परमेश्वर की ओर से बचाव नहीं होगा। दोनों जगह तर्क संख्या का नहीं, संबंध का है। शत्रु गिने जा सकते हैं; परमेश्वर गिने नहीं जाते।
कठिन प्रश्न
पद सात में दाँत तोड़ने और जबड़ों पर मारने की भाषा हमें असहज करती है, और होनी भी चाहिए। क्या यह प्रार्थना है या हिंसा की कामना? ध्यान दीजिए कि दाऊद यह काम स्वयं करने की अनुमति नहीं माँगता; वह परमेश्वर से कहता है, उठिए, आप बचाइए। यही अंतर बदला और न्याय के बीच खड़ा है। फिर भी सवाल पूरी तरह नहीं मिटता, क्योंकि यहाँ कोई शत्रु के लिए दया की प्रार्थना नहीं है, और यीशु हमसे वह भी माँगते हैं। मुझे लगता है ईमानदार उत्तर यह है: भजन हमें अपना क्रोध परमेश्वर के सामने रखना सिखाता है, छिपाना नहीं, और परमेश्वर उस कच्चे क्रोध को धीरे-धीरे शुद्ध करते हैं। यह सुविधाजनक उत्तर नहीं, पर यह सच्चा है।
संदर्भ
भजन के शीर्षक के अनुसार यह उस समय का है जब दाऊद अपने बेटे अबशालोम के सामने से भाग रहा था। यरूशलेम छूट चुका था, वह नंगे पाँव, सिर ढाँके, जैतून पहाड़ी की चढ़ाई रोते हुए चढ़ रहा था, और उसके अपने सलाहकार दूसरी तरफ़ जा चुके थे। प्राचीन पूर्व में राजा की हार को देवता का त्याग माना जाता था; इसलिए "उसका बचाव परमेश्वर की ओर से नहीं हो सकता" केवल तानाकशी नहीं, राजनीतिक घोषणा थी कि यह आदमी अब वैध राजा नहीं रहा। और यह विद्रोह उसके अपने पाप की फ़सल थी, यह दाऊद जानता था। इसीलिए इस भजन में कोई आत्मधार्मिकता नहीं, केवल एक टूटे हुए आदमी का दावा कि उसका सिर उठाना परमेश्वर के हाथ में है।
चिंतन
आपकी इज़्ज़त की रक्षा में आप पिछले महीने कौन-सा काम कर बैठे जो अब आपको खुद अच्छा नहीं लगता?
रात को जागकर आप जिन बातों को दोहराते हैं, उनमें से कौन-सी बात आप सचमुच परमेश्वर के हाथ में सौंपने से बचते रहे हैं, और क्यों?
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भजन संहिता 3 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 3 किस विषय में है?
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भजन संहिता 3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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