बाइबल व्याख्या

प्रकाशितवाक्य 1:3

बाइबल

पाठ

"धन्य है वह जो इस भविष्यद्वाणी के वचन को पढ़ता है, और वे जो सुनते हैं और इसमें लिखी हुई बातों को मानते हैं, क्योंकि समय निकट है।" पूरी पुस्तक के पहले पन्ने पर, दृश्यों और मुहरों और तुरहियों से पहले, एक आशीष रख दी गई है। ध्यान दीजिए कि वाक्य में तीन क्रियाएँ हैं और वे एक क्रम बनाती हैं: पढ़ना, सुनना, मानना। एक व्यक्ति पढ़ता है (एकवचन), अनेक सुनते हैं (बहुवचन), और वे ही सुननेवाले इसे थामकर जीते हैं। और इस पूरी बात के नीचे एक कारण दिया गया है, कोई तर्क नहीं बल्कि एक घड़ी: समय निकट है। यूहन्ना यह नहीं कहते कि जो इसे समझ ले वह धन्य है, बल्कि जो इसे सुनकर मान ले।

केंद्र

यहाँ प्रकाशितवाक्य अपने पढ़े जाने का तरीका खुद तय कर देता है। यह पुस्तक भविष्य की पहेली सुलझाने का खेल नहीं है, यह आराधना में ऊँचे स्वर से पढ़ा जानेवाला वचन है, जिसका उद्देश्य आज्ञाकारिता है। और यही बात परमेश्वर के बारे में कुछ कहती है: वे अपने दासों से छिपाते नहीं, वे दिखाते हैं (पद 1), और दिखाने के साथ ही आशीष बाँध देते हैं। अनुग्रह पहले आता है, चेतावनी बाद में। साथ ही एक धार भी है। "मानना" शब्द बताता है कि यह दर्शन किसी उत्सुकता को नहीं, बल्कि निष्ठा को जगाने आया है। जिस कलीसिया के सामने सम्राट की मूर्ति और व्यापार की मजबूरियाँ खड़ी थीं, उसके लिए "समय निकट है" का अर्थ था: जिस राजा के सामने तुम्हें एक दिन खड़ा होना है, वह पहले से दरवाज़े पर है।

सूत्र

यह आशीष अचानक नहीं गिरती; वह इस्राएल की पुरानी लय में बैठती है। व्यवस्थाविवरण में मूसा बार-बार वाचा को ऊँचे स्वर से पढ़वाते हैं और फिर कहते हैं: सुनो और करो। नहेम्याह के दिनों में एज्रा जलफाटक के सामने खड़े होकर व्यवस्था पढ़ता है, लोग सुनते हैं, और सुनना उन्हें रुलाता भी है और बदलता भी। परमेश्वर की प्रजा हमेशा से पढ़े जाते हुए वचन के इर्द-गिर्द जमा होती आई है। प्रकाशितवाक्य उसी परंपरा में खड़ा है, पर एक अंतर के साथ: अब जो पढ़ा जा रहा है वह "यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य" है। मसीह केवल वह विषय नहीं जिसके बारे में बोला जाता है, वे स्वयं बोलनेवाले हैं। सीनै पर्वत से लेकर पतमुस तक एक ही धागा है: परमेश्वर बोलते हैं, और सुननेवाला बदल जाता है।

दर्पण

आप शायद बाइबल के अच्छे पाठक हैं। आप संदर्भ जानते हैं, नक्शा समझते हैं, समूह में समझा भी सकते हैं। और ठीक यहीं इस पद की धार आप पर पड़ती है, क्योंकि यूहन्ना समझनेवाले को नहीं, माननेवाले को धन्य कहते हैं। प्रकाशितवाक्य को समाचारों से जोड़कर पढ़ना आसान है; कठिन है यह पूछना कि इस सप्ताह मैंने किस जगह सम्राट के सामने सिर झुकाया। वह जगह शायद दफ़्तर की कोई चुप्पी है, कोई हिसाब जो पूरी तरह सच नहीं, कोई रिश्ता जिसे मैंने सुविधा के लिए ठंडा पड़ने दिया। "समय निकट है" का मतलब यही है कि ये छोटे समझौते किसी दूर के दिन तक नहीं टलते।

आज शाम अपने घर के लोगों के सामने, या फ़ोन पर किसी एक मित्र को, प्रकाशितवाक्य 1:1-8 ऊँचे स्वर से पढ़कर सुनाइए। पढ़िए, ताकि कोई सुने।

एक बारीकी

"समय निकट है" में जिस शब्द का प्रयोग हुआ है वह यूनानी कैरोस है, यानी ठहराया हुआ अवसर, वह क्षण जिसके लिए सब कुछ पक चुका है। यह घड़ी की गिनती नहीं है, फ़सल के पकने जैसी बात है। इसीलिए यह वाक्य दो हज़ार साल बाद भी झूठा नहीं पड़ा। यूहन्ना कैलेंडर की भविष्यवाणी नहीं कर रहे, वे बता रहे हैं कि इतिहास किस रुख पर खड़ा है: पर्दा उठने को है, और जो पर्दे के पीछे है वह मेम्ना है। जिस कलीसिया को लगता था कि रोम अनंत है और वह स्वयं क्षणिक, उसे यह शब्द उलटकर बताता है कि क्षणिक कौन है।

अंतर्पाठ

सबसे तीखी गूँज दानिय्येल से आती है। दानिय्येल को कहा गया था कि वह पुस्तक को बंद करके मुहर लगा दे, क्योंकि वह समय बहुत दूर है। यूहन्ना को इसी पुस्तक के अंत में ठीक उलटा कहा जाता है: मुहर मत लगा, क्योंकि समय निकट है। बीच में क्या हुआ? क्रूस और खाली कब्र। जिन्हें पद 5 में "मरे हुओं में से जी उठनेवालों में पहलौठा" कहा गया है, उन्होंने पुस्तक खोल दी। दूसरी गूँज यीशु की अपनी है: जब एक स्त्री ने उनकी माता को धन्य कहा, तो उन्होंने उत्तर दिया कि धन्य वे हैं जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं। यूहन्ना उसी वाक्य को अपनी पुस्तक के दरवाज़े पर टाँग देते हैं, और अंत में दोहराते भी हैं। पूरा प्रकाशितवाक्य इन दो आशीषों के बीच बँधा हुआ है।

संदर्भ

पहली सदी के अंत में, आसिया प्रांत के सात शहरों में छोटी-छोटी मंडलियाँ किसी के घर के आँगन में इकट्ठा होती थीं। अधिकांश लोग पढ़ना नहीं जानते थे; एक व्यक्ति खड़ा होकर पत्र पढ़ता, बाकी सुनते। इसीलिए पद में एक पढ़नेवाला और अनेक सुननेवाले हैं। बाहर, इफिसुस और पिरगमुन में सम्राट के मंदिर थे, व्यापार-संघों के भोज मूर्तियों के सामने होते थे, और उनसे कट जाने का मतलब रोज़ी से कट जाना था। यूहन्ना स्वयं पतमुस के टापू पर हैं, "परमेश्वर के वचन, और यीशु की गवाही के कारण"। यह आशीष किसी सुरक्षित कमरे से नहीं, दबाव में जी रहे एक भाई की ओर से दबाव में जी रहे भाइयों को भेजी गई है।

चिंतन के प्रश्न

पिछली बार आपने बाइबल का कोई अंश किसी दूसरे व्यक्ति के सामने ऊँचे स्वर से कब पढ़ा था, और आपने ऐसा करना कब से छोड़ दिया?

अगर "समय निकट है" इस सप्ताह के आपके किसी एक निर्णय पर लागू होता, तो वह कौन-सा निर्णय होगा?

Revelation में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Revelation

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A steady, sane guide through the visions to the throne of the Lamb.

Revelation For Everyone

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Revelation: An Introduction and Commentary

Leon Morris

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Revelation

Craig Keener

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Revelation 1:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रकाशितवाक्य 1:3 का क्या अर्थ है?
"धन्य है वह जो इस भविष्यद्वाणी के वचन को पढ़ता है, और वे जो सुनते हैं और इसमें लिखी हुई बातों को मानते हैं, क्योंकि समय निकट है।" पूरी पुस्तक के पहले पन्ने पर, दृश्यों और मुहरों और तुरहियों से पहले, एक आशीष रख दी गई है। ध्यान दीजिए कि वाक्य में तीन क्रियाएँ हैं और वे एक क्रम बनाती हैं: पढ़ना, सुनना, मानना। एक व्यक्ति पढ़ता है (एकवचन), अनेक सुनते हैं (बहुवचन), और वे ही सुननेवाले इसे थामकर जीते हैं। और इस पूरी बात के नीचे एक कारण दिया गया है, कोई तर्क नहीं बल्कि एक घड़ी: समय निकट है। यूहन्ना यह नहीं कहते कि जो इसे समझ ले वह धन्य है, बल्कि जो इसे सुनकर मान ले।
प्रकाशितवाक्य 1:3 किस विषय में है?
यह आशीष अचानक नहीं गिरती; वह इस्राएल की पुरानी लय में बैठती है। व्यवस्थाविवरण में मूसा बार-बार वाचा को ऊँचे स्वर से पढ़वाते हैं और फिर कहते हैं: सुनो और करो। नहेम्याह के दिनों में एज्रा जलफाटक के सामने खड़े होकर व्यवस्था पढ़ता है, लोग सुनते हैं, और सुनना उन्हें रुलाता भी है और बदलता भी। परमेश्वर की प्रजा हमेशा से पढ़े जाते हुए वचन के इर्द-गिर्द जमा होती आई है। प्रकाशितवाक्य उसी परंपरा में खड़ा है, पर एक अंतर के साथ: अब जो पढ़ा जा रहा है वह "यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य" है। मसीह केवल वह विषय नहीं जिसके बारे में बोला जाता है, वे स्वयं बोलनेवाले हैं। सीनै पर्वत से लेकर पतमुस तक एक ही धागा है: परमेश्वर बोलते हैं, और सुननेवाला बदल जाता है।
प्रकाशितवाक्य 1:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज शाम अपने घर के लोगों के सामने, या फ़ोन पर किसी एक मित्र को, प्रकाशितवाक्य 1:1-8 ऊँचे स्वर से पढ़कर सुनाइए। पढ़िए, ताकि कोई सुने।
प्रकाशितवाक्य 1:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सबसे तीखी गूँज दानिय्येल से आती है। दानिय्येल को कहा गया था कि वह पुस्तक को बंद करके मुहर लगा दे, क्योंकि वह समय बहुत दूर है। यूहन्ना को इसी पुस्तक के अंत में ठीक उलटा कहा जाता है: मुहर मत लगा, क्योंकि समय निकट है। बीच में क्या हुआ? क्रूस और खाली कब्र। जिन्हें पद 5 में "मरे हुओं में से जी उठनेवालों में पहलौठा" कहा गया है, उन्होंने पुस्तक खोल दी। दूसरी गूँज यीशु की अपनी है: जब एक स्त्री ने उनकी माता को धन्य कहा, तो उन्होंने उत्तर दिया कि धन्य वे हैं जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं। यूहन्ना उसी वाक्य को अपनी पुस्तक के दरवाज़े पर टाँग देते हैं, और अंत में दोहराते भी हैं। पूरा प्रकाशितवाक्य इन दो आशीषों के बीच बँधा हुआ है।
प्रकाशितवाक्य 1:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछली बार आपने बाइबल का कोई अंश किसी दूसरे व्यक्ति के सामने ऊँचे स्वर से कब पढ़ा था, और आपने ऐसा करना कब से छोड़ दिया?
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Revelation 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

यूहन्ना अपने आप को "प्रेरित" नहीं, पहले "तुम्हारा भाई" कहता है, और फिर "क्लेश और राज्य और धीरज में तुम्हारा सहभागी।" ध्यान दो, क्लेश और राज्य एक ही साँस में हैं। वह निर्वासित था, पतमुस के उस सूने टापू पर, फिर भी राज्य की बात करता है। तेरा अकेलापन भी शायद वही जगह हो जहाँ स्वर्ग खुलता है।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 17

यीशु, धन्यवाद कि जब यूहन्ना आपके सामने मुर्दा सा गिर पड़ा, तो आपने उसे वहीं नहीं छोड़ा, बल्कि अपना दाहिना हाथ उस पर रखा। धन्यवाद कि आज भी मेरे डर के बीच वही हाथ मुझे थामता है और वही आवाज़ कहती है, "मत डर! मैं प्रथम और अंतिम हूँ।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 12

प्रभु, जब तेरी आवाज़ मुझे पुकारे, मुझे मुड़ने का साहस दे। मैं अपने कामों और चिंताओं में इतना उलझा रहता हूँ कि तेरी उपस्थिति को देख नहीं पाता। मेरा मन घुमा दे, ताकि मैं तुझे पहचानूँ और तेरी ज्योति में चलूँ।

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