प्रकाशितवाक्य 1:8
पाठ
यूहन्ना अपने पत्र की भूमिका के बीच अचानक रुक जाते हैं, और एक दूसरी आवाज़ बोलने लगती है। अब तक सब कुछ यूहन्ना का लिखा हुआ था; यहाँ स्वयं परमेश्वर अपने विषय में कहते हैं: "मैं ही अल्फा और ओमेगा हूँ।" वे अपना परिचय तीन कालों में देते हैं, "जो है, और जो था, और जो आनेवाला है," और उस पर एक उपाधि जोड़ते हैं जो बाकी सब को सँभाले हुए है, "जो सर्वशक्तिमान है।" वर्णमाला का पहला अक्षर और अंतिम अक्षर, और उनके बीच जो कुछ भी लिखा जा सकता है, वह सब उन्हीं का है। पूरी पुस्तक में परमेश्वर पहली बार इसी वचन में स्वयं बोलते हैं, और फिर लंबे समय तक चुप रहते हैं।
मूल मर्म
अल्फा और ओमेगा केवल "आरंभ और अंत" का काव्यात्मक ढंग नहीं है। यह एक दावा है कि इतिहास किसी की भाषा है, किसी का लिखा हुआ वाक्य है, और उस वाक्य का पहला अक्षर तथा अंतिम अक्षर एक ही हाथ से आया है। ध्यान दीजिए कि तीसरा पद "जो होगा" नहीं कहता, बल्कि "जो आनेवाला है"। परमेश्वर केवल भविष्य में विद्यमान नहीं रहते; वे उस भविष्य में से हमारी ओर चलकर आ रहे हैं। यही अंतर सारी शांति का स्रोत है। और "सर्वशक्तिमान" यहाँ कोई दार्शनिक विशेषण नहीं, बल्कि रोमी सम्राट के सामने रखी गई चुनौती है: शक्ति किसके पास वास्तव में है, उसके पास जो तलवार पकड़ता है, या उसके पास जो समय को थामे हुए है?
जोड़ने वाला धागा
जो नाम इस वचन में परमेश्वर अपने लिए बोलते हैं, वही नाम इसी अध्याय में एक और मुँह से निकलता है। पद 17 में वह पुरुष, जिसके पाँव भट्ठी में तपाए गए पीतल जैसे हैं, यूहन्ना पर हाथ रखकर कहता है, "मैं प्रथम और अन्तिम हूँ," और फिर जोड़ता है, "मैं मर गया था, और अब देख मैं युगानुयुग जीविता हूँ।" यह वही उपाधि है, दूसरे शब्दों में। और यहीं पर प्रकाशितवाक्य अपनी सबसे साहसी बात कह देता है: वर्णमाला का पहला और अंतिम अक्षर उस व्यक्ति का है जिसकी हथेलियों में छेद हैं। जो निर्गमन में जलती झाड़ी से बोले थे कि मेरा नाम "मैं हूँ" है, वही अब घावों के साथ खड़े हैं। इतिहास का लेखक अपने ही वाक्य के भीतर उतर आया, और उसका सबसे कठिन शब्द स्वयं झेल गया।
दर्पण
आप उन अध्यायों को जानते हैं जिनका अंत आप नहीं देख सकते। एक बीमारी जिसकी रिपोर्ट अगले हफ्ते आएगी, एक बच्चा जो अब बात नहीं करता, एक नौकरी जो हर महीने थोड़ी और असुरक्षित लगती है, एक झगड़ा जो दस साल से बिना अल्पविराम के चल रहा है। हमारा असली डर यह नहीं कि परमेश्वर हैं या नहीं; डर यह है कि कहानी का अंतिम अक्षर किसी और के हाथ में है, शायद संयोग के, शायद हमारी अपनी गलतियों के। यह वचन उस डर का उत्तर तर्क से नहीं, आवाज़ से देता है। कोई बोलता है, और बोलने वाला वही है जो आनेवाला है। आज एक कागज़ पर उस एक स्थिति का नाम लिखिए जिसका अंत आप नहीं देख पा रहे, और उसके नीचे लिखिए, "जो है, और जो था, और जो आनेवाला है," फिर वह पूरी पंक्ति ज़ोर से पढ़िए। सिर्फ़ इतना।
प्रश्न
अगर बीच के सारे अक्षर भी उन्हीं के हैं, तो वे ऐसे क्यों दिखते हैं? यूहन्ना यह वाक्य किसी शांत कमरे में नहीं सुनते, वे पतमुस में हैं, और जिन कलीसियाओं को वे लिख रहे हैं उनमें से कुछ जल्द ही अपने भाइयों को खोने वाली हैं। "सर्वशक्तिमान" शब्द उस स्थिति में सांत्वना जितना ही चुभन है। पाठ इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता। वह यह नहीं समझाता कि शक्ति ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया। वह केवल यह बताता है कि बोलने वाला कौन है, और फिर चुप हो जाता है। शायद यही ईमानदारी है: परमेश्वर हमें व्याख्या नहीं, अपना नाम देते हैं। और जो व्याख्या माँगता रहेगा वह शायद खाली हाथ रहेगा, पर जो नाम पर टिकेगा उसके पास कुछ ऐसा होगा जो व्याख्या से भी भारी है।
संदर्भ
पहली सदी का अंत, रोमी प्रांत आसिया, आज का पश्चिमी तुर्की। सात शहर एक व्यापारिक सड़क पर मोतियों की तरह पिरोए हुए हैं, और हर शहर में सम्राट की मूर्ति और मंदिर है। सम्राट को "प्रभु और परमेश्वर" कहा जाता था, और उसकी उपाधियों में शक्ति, अनंतता और शांति के दावे शामिल थे। इसी माहौल में यह पत्र लिखा गया, और इसे कलीसिया की सभा में ऊँची आवाज़ में पढ़ा जाना था, संभवतः किसी के घर के भोजन कक्ष में, जहाँ पचास लोग भी मुश्किल से समाते। यूहन्ना स्वयं पतमुस के टापू पर हैं, "परमेश्वर के वचन, और यीशु की गवाही के कारण"। यानी वह आवाज़, जो सब कुछ अपने अधिकार में बताती है, एक निर्वासित व्यक्ति के ज़रिए एक अल्पसंख्यक समुदाय तक पहुँच रही है।
श्रोताओं का चेहरा
वे लोग यूनानी बोलते थे; अल्फा और ओमेगा उनके लिए धार्मिक प्रतीक नहीं, रोज़ के अक्षर थे, वही जिनसे वे बाज़ार का हिसाब और चिट्ठियाँ लिखते थे। परमेश्वर अपने को उनकी वर्णमाला की भाषा में बताते हैं, उनके अपने औज़ारों में। और "सर्वशक्तिमान", यूनानी में पान्तोक्रातोर, वह शब्द था जिससे उनकी पवित्रशास्त्र की प्रति में "सेनाओं का यहोवा" अनूदित होता था। जब यह पद पढ़ा गया, तो सुनने वालों के कानों में दो आवाज़ें टकराईं: बाहर सड़क पर सम्राट की उपाधियाँ, और भीतर कमरे में यह घोषणा। उन्होंने वही सुना जो हम अक्सर चूक जाते हैं, कि यह वाक्य केवल आराम नहीं, एक राजनीतिक इनकार भी है। और शायद उस कमरे में थोड़ी देर की चुप्पी छाई होगी।
चिंतन
आपके जीवन के किस अध्याय में आप चुपचाप मान बैठे हैं कि अंतिम अक्षर आपको स्वयं लिखना है?
अगर परमेश्वर "आनेवाले" हैं, न कि केवल "होनेवाले", तो यह आपके इंतज़ार करने के तरीके को आज कैसे बदलेगा?
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Revelation 1:8 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Revelation 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु, धन्यवाद कि जब यूहन्ना आपके सामने मुर्दा सा गिर पड़ा, तो आपने उसे वहीं नहीं छोड़ा, बल्कि अपना दाहिना हाथ उस पर रखा। धन्यवाद कि आज भी मेरे डर के बीच वही हाथ मुझे थामता है और वही आवाज़ कहती है, "मत डर! मैं प्रथम और अंतिम हूँ।
प्रभु, जब तेरी आवाज़ मुझे पुकारे, मुझे मुड़ने का साहस दे। मैं अपने कामों और चिंताओं में इतना उलझा रहता हूँ कि तेरी उपस्थिति को देख नहीं पाता। मेरा मन घुमा दे, ताकि मैं तुझे पहचानूँ और तेरी ज्योति में चलूँ।
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