रोमियों 12:12
पाठ
रोम के किसी घर में, तेल के दीये की मद्धिम रोशनी में, एक आदमी खड़ा होकर पौलुस की चिट्ठी पढ़ रहा है। कमरे में बीस-पच्चीस लोग हैं: कुछ दास, कुछ आज़ाद किए गए, दो-तीन यहूदी जो कुछ बरस पहले शहर से निकाले गए थे और अब लौटे हैं। पढ़नेवाला उस पंक्ति पर पहुँचता है जहाँ वाक्य छोटे और तेज़ हो जाते हैं, जैसे किसी ने साँस रोक ली हो: "आशा के विषय में, आनन्दित; क्लेश के विषय में, धैर्य रखें; प्रार्थना के विषय में, स्थिर रहें।" तीन शब्द, तीन आज्ञाएँ। आशा में आनन्द करो, दुःख में टिके रहो, प्रार्थना में जमे रहो। और कमरा चुप हो जाता है, क्योंकि तीनों में से कोई भी अपने आप नहीं होता।
मर्म
ध्यान दीजिए कि पौलुस आनन्द को परिस्थिति से नहीं, आशा से जोड़ते हैं। वे यह नहीं कहते कि हालात सुधरने पर खुश हो जाना; वे कहते हैं कि आनन्द का ईंधन वह भविष्य है जो परमेश्वर ने मसीह में पक्का कर दिया है। इसीलिए यही आदमी अगली साँस में क्लेश की बात कर सकता है बिना अपनी बात काटे। ईसाई जीवन में दुःख और आनन्द एक-दूसरे को रद्द नहीं करते, वे एक ही छत के नीचे रहते हैं। और बीच में प्रार्थना खड़ी है, वह नली जिससे आशा हृदय तक उतरती है और क्लेश परमेश्वर तक चढ़ता है। हटा दीजिए प्रार्थना, और आनन्द केवल आशावाद रह जाता है, धीरज केवल दाँत भींचना।
सूत्र
यह तीन-लड़ी की रस्सी अकेले पौलुस ने नहीं बुनी। इस्राएल की पूरी कहानी ऐसे ही चली: वादे पर आनन्द, प्रतीक्षा में धीरज, और बीच के अंधेरे में पुकार। भजन संहिता की आधी से ज़्यादा किताब यही है, आँसू और स्तुति एक ही पन्ने पर। और यह रस्सी अपने सबसे कसे हुए बिंदु पर गतसमनी में दिखती है: यीशु मसीह, जो सामने रखे हुए आनन्द के कारण क्लेश सह गए और सारी रात प्रार्थना में डटे रहे। इसलिए रोमियों 12 की यह आज्ञा हमें कोई नया आत्मिक करतब नहीं सिखाती; वह हमें उस रास्ते पर बुलाती है जिस पर प्रभु स्वयं चल चुके हैं, और जिसे उन्होंने अपने पीछे आनेवालों के लिए चलने योग्य बना दिया है।
दर्पण
आप जानते हैं कि इनमें से कौन-सा आपके लिए सबसे कठिन है। शायद आशा, क्योंकि नौकरी की अनिश्चितता ने आपके भीतर हिसाब लगाने की आदत डाल दी है और आनन्द फ़िज़ूलखर्ची जैसा लगता है। शायद धीरज, क्योंकि घर में वही झगड़ा तीसरे साल भी चल रहा है और आप थक चुके हैं। या शायद प्रार्थना, जो सबसे पहले छूटती है, इसलिए नहीं कि आपने उसे नकारा, बल्कि इसलिए कि थकान ने चुपचाप उसकी जगह ले ली। पौलुस यहाँ भावना नहीं माँगते, वे अभ्यास माँगते हैं। तो आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति या स्थिति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसमें आप सबसे ज़्यादा थके हैं, उसके नीचे लिखिए "मैं टिका रहूँगा", और वह कागज़ हाथ में लेकर दो मिनट प्रार्थना कीजिए।
श्रोता
जिन लोगों ने यह चिट्ठी पहली बार सुनी, उनके लिए "क्लेश" कोई रूपक नहीं था। कुछ ही साल पहले क्लौदियुस ने यहूदियों को रोम से निकाल दिया था; लौटे हुए लोग टूटे कारोबार और खोए घर लेकर बैठे थे। कमरे में बैठे दासों के पास अपना समय तक नहीं था, अपनी देह तक नहीं। और उनसे कहा जा रहा है: आनन्दित रहो। यह उनके कानों में क्रूर नहीं, बल्कि विद्रोही लगा होगा, क्योंकि सम्राट की नगरी में आनन्द का अधिकार केवल शक्तिशाली के पास था। पौलुस उस अधिकार को उन लोगों के हाथ में रख रहे हैं जिनके पास कुछ नहीं, केवल आशा। यही इस आयत की मूल ध्वनि है, सांत्वना नहीं, चुनौती।
बारीकी
तीसरा हिस्सा सबसे खुरदरा है। "स्थिर रहें" के पीछे यूनानी शब्द है प्रोस्कार्तेरेओ, जिसका अर्थ है किसी चीज़ से चिपके रहना, उस पर डटे रहना जैसे कोई सैनिक अपनी चौकी नहीं छोड़ता। यही शब्द प्रेरितों के काम में उस पहली कलीसिया के लिए इस्तेमाल हुआ है जो प्रार्थना में लगी रहती थी। यानी पौलुस प्रार्थना की गुणवत्ता की बात नहीं कर रहे, अवधि की कर रहे हैं। उन्हें इससे मतलब नहीं कि आपकी प्रार्थना सुंदर है या नहीं; उन्हें इससे मतलब है कि आप वहाँ से हटे नहीं। यह उन दिनों के लिए राहत है जब शब्द नहीं मिलते: चौकी पर चुपचाप खड़े रहना भी वफ़ादारी है।
केंद्रीय व्यक्ति
इस आयत के पीछे जो चेहरा है, वह लिखनेवाले का है। पौलुस यह सब किसी आरामदेह अध्ययन-कक्ष से नहीं लिख रहे। जिस आदमी ने "क्लेश के विषय में, धैर्य रखें" लिखा, उसने कोड़े खाए थे, पत्थरवाह सहा था, जहाज़ डूबते देखा था। और फिर भी उसकी चिट्ठी में कड़वाहट नहीं है। यह इसलिए कि उसका आनन्द उसके अनुभवों पर नहीं, परमेश्वर की उस दया पर टिका था जिसका ज़िक्र उसने अध्याय की पहली ही पंक्ति में किया। जो व्यक्ति जानता है कि उसे केवल अनुग्रह से बचाया गया, वह दुःख में भी परमेश्वर पर मुकदमा नहीं ठोकता। पौलुस का आत्मिक भूगोल यही है: नीचे अनुग्रह की चट्टान, ऊपर आशा का आकाश, और बीच में एक थका हुआ पर डटा हुआ आदमी।
चिंतन
आशा, क्लेश और प्रार्थना, इन तीनों में से इस समय आप किस मोर्चे से सबसे ज़्यादा भागना चाहते हैं, और क्यों?
अगर आपका आनन्द आज की परिस्थिति पर नहीं बल्कि परमेश्वर के वादे पर टिकता, तो इस सप्ताह आपका कौन-सा निर्णय बदल जाता?
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Romans 12:12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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रोमियों 12:12 का क्या अर्थ है?
रोमियों 12:12 किस विषय में है?
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रोमियों 12:12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 12:12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
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पिता, मुझे अपने बारे में सच्ची समझ दे। न इतना बड़ा समझूँ कि दूसरों को छोटा कर दूँ, न इतना कम कि तेरा दिया हुआ भूल जाऊँ। जो विश्वास तूने मुझे सौंपा है, उसी नाप से चलना सिखा, संयम और नम्रता के साथ।
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