रोमियों 13
पाठ
पौलुस रोम की कलीसिया को बताता है कि हर विश्वासी को शासन के अधिकारियों के अधीन रहना चाहिए, क्योंकि सारा अधिकार परमेश्वर की ओर से है। फिर वह मोड़ लेता है: सब कर्जों में सबसे गहरा कर्ज है प्रेम, जो व्यवस्था की पूर्ति है। और अंत में एक चेतावनी: समय बीत रहा है, जागो, अंधकार के काम छोड़ो, "प्रभु यीशु मसीह को पहन लो।"
मर्म
यह अध्याय तीन बातों को एक धागे में पिरोता है: राज्य का अधिकार, पड़ोसी का प्रेम, और मसीह के आगमन की नज़दीकी। बाहर से देखने पर ये तीन अलग विषय लगते हैं, पर पौलुस के लिए ये एक ही सत्य के तीन पहलू हैं। परमेश्वर ने सृष्टि में व्यवस्था ठहराई है, उसने व्यवस्था में प्रेम की माँग रखी है, और अब मसीह में वह अपना उद्धार पूरा करने आ रहा है। यानी: विश्वासी न तो अराजक है, न केवल नैतिक, न केवल आत्मिक। वह एक ऐसे राज्य का नागरिक है जो पहले से आ चुका है और अभी पूरा होना बाकी है। इसीलिए उसका आचरण न्याय, प्रेम और प्रत्याशा, तीनों से गढ़ा जाता है।
समान सूत्र
पौलुस कहता है कि प्रेम "व्यवस्था को पूरा करना है।" यह वाक्य पूरे बाइबल के इतिहास को एक बिंदु पर समेट देता है। सीनै पर्वत पर दी गई दस आज्ञाएँ, लैव्यव्यवस्था 19 का "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख", भविष्यद्वक्ताओं की न्याय और करुणा की पुकार, ये सब मसीह में आकर मिलती हैं। यीशु ने स्वयं इसी आज्ञा को दूसरी सबसे बड़ी आज्ञा कहा। पौलुस उसी शिक्षा को अपने शब्दों में दोहरा रहा है। और "प्रभु यीशु मसीह को पहन लो" वाक्य में उद्धार का शिखर आता है: व्यवस्था को अब पत्थर की पटियाओं पर नहीं, बल्कि एक व्यक्ति में, मसीह में, पूरा किया गया है, जिसे हम धारण करते हैं जैसे कोई वस्त्र।
दर्पण
यह पाठ हमारी कई परतें खोलता है। कर देने की बात हमारी उस प्रवृत्ति को उजागर करती है जो हर व्यवस्था में छेद ढूँढना चाहती है। "किसी के कर्जदार न हो" वाक्य हमारे उन रिश्तों की ओर उंगली उठाता है जिनमें हम प्रेम कम, हिसाब ज़्यादा रखते हैं। "लीलाक्रीड़ा, पियक्कड़पन, व्यभिचार, लुचपन, झगड़े और ईर्ष्या", यह सूची शायद हमें बाहरी लगे, पर ईर्ष्या और झगड़ा? वे तो हमारे घरों, कार्यालयों और कलीसियाओं में हर दिन रहते हैं। सबसे गहरी चोट यहाँ लगती है: क्या मैं जागा हुआ जी रहा हूँ, या नींद में? क्या मेरा जीवन इस बात की गवाही देता है कि उद्धार निकट है, या कि मैं इस जगत में स्थायी बसेरा बना चुका हूँ?
एक विवरण
"प्रभु यीशु मसीह को पहन लो", यह चित्र ठहरकर देखने योग्य है। पौलुस नहीं कहता, "मसीह का अनुकरण करो" या "मसीह के बारे में सोचो।" वह कहता है, उसे पहन लो, जैसे वस्त्र। रोमी संसार में वस्त्र पहचान थी: दास का वस्त्र, सैनिक का वस्त्र, नागरिक का टोगा। जो तुम पहनते हो, वह बताता है कि तुम कौन हो और किसके अधीन हो। मसीह को पहनने का अर्थ है कि लोग तुम्हें देखकर मसीह को पहचानें, कि तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व उसकी छाया में ढक जाए। यह बपतिस्मा की भाषा है, यह हर सुबह की पुकार भी है: आज किसे पहनोगे?
एक कठिन प्रश्न
पर वह प्रश्न जो टलता नहीं: यदि "कोई अधिकार ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर से न हो", तो क्रूर तानाशाहों, अन्यायी शासकों, विश्वासियों को सताने वाली सरकारों का क्या? पौलुस स्वयं एक ऐसे सम्राट के अधीन लिख रहा था जो कुछ ही वर्षों में मसीहियों को जलाने वाला था। यह पाठ हर अन्याय के आगे झुकने का लाइसेंस नहीं है, प्रेरितों ने स्वयं कहा था, "मनुष्यों की अपेक्षा परमेश्वर की आज्ञा मानना ही उचित है।" पौलुस का बिंदु यह है कि सृष्टि में परमेश्वर ने व्यवस्था को अराजकता के विरुद्ध ठहराया है, और विश्वासी विद्रोही स्वभाव का नहीं होता। पर जहाँ राज्य परमेश्वर की जगह लेने लगे, वहाँ यह अध्याय रुक जाता है और अध्याय 12 का "बुराई से न हारो" फिर से बोलने लगता है। रहस्य पूरी तरह नहीं सुलझता, और शायद इसी तनाव में विश्वासी को विवेक से चलना है।
प्रथम श्रोता
रोम की कलीसिया में यहूदी और अन्यजाति दोनों थे, और वे साम्राज्य की राजधानी में रह रहे थे, जहाँ राजनीति सांस लेने जैसी थी। कुछ यहूदी विश्वासी हाल ही में कर के मुद्दे पर विद्रोह के लिए बदनाम हो चुके थे, कुछ को क्लौदियुस ने रोम से निकाल दिया था। इस पृष्ठभूमि में पौलुस का "कर दो, चुंगी दो" शब्द राजनीतिक बारूद पर गिरी चिंगारी था। साथ ही, "रात बहुत बीत गई है" उन विश्वासियों के लिए बोला गया जो सोच रहे थे कि क्या मसीह जल्दी लौटेंगे। पौलुस उन्हें न भागने को कहता है, न सो जाने को, बल्कि दिन के उजाले में जीने वाले लोगों की तरह, अभी, यहीं, इस साम्राज्य के भीतर मसीह को पहनकर चलने को।
चिंतन
*क्या मेरा दैनिक जीवन इस विश्वास की गवाही देता है कि "उद्धार
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Romans 13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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रोमियों 13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Romans 13 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने आज्ञाओं का सारांश इतना सरल कर दिया, "तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।" धन्यवाद कि प्रेम मुझे व्यभिचार, चोरी और लालच से बचाता है, और मेरे पड़ोसी की भलाई चाहना सिखाता है। यही प्रेम मेरे मन में बढ़ाते जाइए।
कर देना कोई बड़ी आत्मिक बात नहीं लगती, फिर भी पौलुस कहता है, "इसी कारण तुम कर भी देते हो, क्योंकि शासन करनेवाले परमेश्वर के सेवक हैं।" जिन अधिकारियों से तुम असहमत हो, उन्हें भी वह अपना सेवक कहता है। तुम्हारी ईमानदारी बिल भरने में, कागज़ भरने में भी दिखती है। वहाँ भी परमेश्वर देख रहा है।
पिता, धन्यवाद कि तूने अधिकारियों को इसलिए ठहराया है कि भले काम करनेवालों को उनसे डर नहीं, पर सराहना मिलती है। तेरी यह व्यवस्था कितनी सुंदर है, जो भलाई करने का हौसला देती है और हमें निडर होकर तेरी इच्छा में चलने का मार्ग दिखाती है।
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