बाइबल व्याख्या

रोमियों 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पौलुस अपना परिचय दास और प्रेरित के रूप में देता है, और तुरंत बताता है कि जिस सुसमाचार के लिये वह अलग किया गया है वह कोई नई खोज नहीं: परमेश्वर ने उसकी प्रतिज्ञा "पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्रशास्त्र में" कर दी थी, और उसका विषय एक व्यक्ति है, दाऊद के वंश से जन्मा और मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा हुआ। इसके बाद रोम के विश्वासियों के लिये धन्यवाद, उनसे मिलने की गहरी लालसा, और वह वाक्य जो पूरी पत्री की धुरी है: "मैं सुसमाचार से नहीं लजाता।" फिर स्वर बदलता है। परमेश्वर का क्रोध प्रगट होता है उन पर जो सत्य को दबाए रखते हैं, जिन्होंने सृष्टिकर्ता की महिमा को मूरतों से बदल डाला, और जिन्हें परमेश्वर ने उनकी ही अभिलाषाओं पर छोड़ दिया।

मर्म

इस अध्याय में दो "प्रगट होना" आमने-सामने खड़े हैं। पद 17 में परमेश्वर की धार्मिकता प्रगट होती है, पद 18 में परमेश्वर का क्रोध प्रगट होता है। दोनों परमेश्वर की ओर से आते हैं, दोनों छिपे हुए नहीं हैं। और मनुष्य का पाप यहाँ सबसे पहले नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि एक अदला-बदली है: महिमा के बदले मूरत, सच्चाई के बदले झूठ, सृजनहार के बदले सृष्टि। पौलुस की तर्कशैली ध्यान दें: पद 29 से 31 की लंबी सूची कारण नहीं, परिणाम है। जब आराधना का केंद्र खिसकता है, तो जीवन का पूरा ढाँचा खिसकता है। इसीलिए सुसमाचार को "उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य" कहा गया है, कोई नैतिक सुधार-योजना नहीं; टूटी हुई आराधना को केवल एक नया आराध्य ठीक कर सकता है।

मुख्य सूत्र

पौलुस मसीह को शून्य से नहीं निकालता। "दाऊद के वंश" कहकर वह उस वाचा की ओर इशारा करता है जो परमेश्वर ने 2 शमूएल 7 में दाऊद से बाँधी थी, कि उसका एक वंशज सदा राज करेगा। सदियों तक वह सिंहासन खाली दिखा; पुनरुत्थान ने उसे भर दिया। और अब पद 23 के साथ पद 3-4 को जोड़कर पढ़िए: मनुष्य ने "अविनाशी परमेश्वर की महिमा" को नाशवान मूरतों से बदला, पर मसीह ने बदला नहीं, उन्होंने परमेश्वर की महिमा को पूरी तरह थामे रखा और साथ ही हमारे शरीर को अपनाया। जहाँ आदम की सन्तान ने महिमा को गिराया, वहाँ दाऊद का पुत्र उसे लौटाता है। हबक्कूक का पुराना वाक्य, "विश्वास से धर्मी जन जीवित रहेगा," उसी में आकर पूरा साँस लेता है।

दर्पण

अदला-बदली आज मूरतों की दुकान में नहीं होती, वह चुपचाप घर में होती है। जब बच्चों की सफलता आपके जीवन का अर्थ तय करने लगे, जब वेतन-पर्ची आपकी कीमत बताए, जब दूसरों की राय आपकी नींद तय करे, तब सृष्टि की सेवा शुरू हो गई है। और पद 29-31 की सूची को दूर की चीज़ मत समझिए: उसमें हत्या और हिंसा के साथ "चुगलखोर, गपशप करनेवाले, डींगमार, कठोर और निर्दयी" भी हैं, यानी वे पाप जो कलीसिया की चाय-सभा में सम्मानजनक लगते हैं। पद 32 और भी चुभता है: करना ही नहीं, करनेवालों से प्रसन्न होना भी दोष है। हम जो देखते, हँसते, साझा करते हैं, वह भी हमारी सहमति है। और पद 16 का प्रश्न बाकी रहता है: स्टाफ रूम में, रिश्तेदारी में, आप किस बात पर चुप हो जाते हैं?

एक बारीकी

तीन बार एक ही क्रिया लौटती है: "परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया" (पद 24, 26, 28)। यूनानी में यह शब्द है παρέδωκεν, "सौंप दिया"। यहाँ परमेश्वर का क्रोध बिजली की तरह नहीं गिरता; वह हाथ खोल देता है। यह न्याय का सबसे डरावना रूप है: जो तुम ज़िद से चाहते हो, वही तुम्हें दे दिया जाना। पर वही शब्द पौलुस आगे मसीह के लिये इस्तेमाल करता है, कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को हमारे लिये सौंप दिया। दोनों "सौंपने" के बीच पूरा सुसमाचार खड़ा है। हमें अपनी अभिलाषाओं के हाथ में सौंपा गया, और उस हाल से निकालने के लिये परमेश्वर ने अपने पुत्र को क्रूस के हाथों में सौंपा। एक ही क्रिया, दो दिशाएँ।

श्रोताओं का चेहरा

रोम में कोई एक भव्य कलीसिया नहीं थी, बल्कि घरों और किराए के कमरों में बँटी छोटी मंडलियाँ, जिनमें यहूदी और अन्यजाति दोनों थे और आपसी तनाव भी। पौलुस उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, इसलिए वह सावधानी से लिखता है: "पहले तो यहूदी, फिर यूनानी", क्रम बताता है पर दरवाज़ा दोनों के लिये खोलता है। और साम्राज्य की राजधानी में "सुसमाचार" तथा "परमेश्वर का पुत्र" कैसर के शब्द थे; सम्राट के जन्म और विजय की घोषणा को ही सुसमाचार कहा जाता था। ऐसे शहर में यह कहना कि असली सुसमाचार एक सूली पर चढ़े यहूदी का है, राजनीतिक रूप से बेतुका और सामाजिक रूप से लज्जाजनक था। तभी "मैं सुसमाचार से नहीं लजाता" खोखली धर्मभाषा नहीं, साहस की घोषणा है।

पृष्ठभूमि

पत्री लगभग 57 ईस्वी में लिखी गई, संभवतः कुरिन्थ से, जब पौलुस यरूशलेम जाने और उसके बाद पश्चिम बढ़ने की योजना बना रहा था। रोम दस लाख की भीड़ वाला शहर था: तंग गलियाँ, दास और स्वतंत्र किए गए दास, हर मोड़ पर मंदिर और मूर्तियाँ। पद 18-32 का विवरण उन पाठकों के लिये सिद्धांत नहीं, गली का दृश्य था। और यहाँ पौलुस की रणनीति पर ध्यान दें: यह अंश ठीक वैसा लगता है जैसा एक धर्मनिष्ठ यहूदी पाठक अन्यजातियों के बारे में सुनना चाहेगा, सिर हिलाते हुए, सहमति में। अगले अध्याय में पौलुस वही उँगली पाठक की ओर घुमा देगा। पहला अध्याय दोष सिद्ध करता है, ताकि पद 17 की धार्मिकता दान लगे, अधिकार नहीं।

आपके जीवन में वह कौन सी अच्छी चीज़ है जो चुपचाप सृजनहार की जगह लेने लगी है, और आप उसे किस नाम से छिपाते हैं?

यदि "छोड़ दिया" परमेश्वर के न्याय का रूप है, तो उन आदतों को आप क्या कहेंगे जिन्हें आपने वर्षों से बिना लड़े चलने दिया है?

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स्वीकारोक्ति

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उद्देश्य भरा जीवन

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परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

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Romans 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

रोमियों 1 का क्या अर्थ है?
पौलुस अपना परिचय दास और प्रेरित के रूप में देता है, और तुरंत बताता है कि जिस सुसमाचार के लिये वह अलग किया गया है वह कोई नई खोज नहीं: परमेश्वर ने उसकी प्रतिज्ञा "पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्रशास्त्र में" कर दी थी, और उसका विषय एक व्यक्ति है, दाऊद के वंश से जन्मा और मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा हुआ। इसके बाद रोम के विश्वासियों के लिये धन्यवाद, उनसे मिलने की गहरी लालसा, और वह वाक्य जो पूरी पत्री की धुरी है: "मैं सुसमाचार से नहीं लजाता।" फिर स्वर बदलता है। परमेश्वर का क्रोध प्रगट होता है उन पर जो सत्य को दबाए रखते हैं, जिन्होंने सृष्टिकर्ता की महिमा को मूरतों से बदल डाला, और जिन्हें परमेश्वर ने उनकी ही अभिलाषाओं पर छोड़ दिया।
रोमियों 1 किस विषय में है?
पौलुस मसीह को शून्य से नहीं निकालता। "दाऊद के वंश" कहकर वह उस वाचा की ओर इशारा करता है जो परमेश्वर ने 2 शमूएल 7 में दाऊद से बाँधी थी, कि उसका एक वंशज सदा राज करेगा। सदियों तक वह सिंहासन खाली दिखा; पुनरुत्थान ने उसे भर दिया। और अब पद 23 के साथ पद 3-4 को जोड़कर पढ़िए: मनुष्य ने "अविनाशी परमेश्वर की महिमा" को नाशवान मूरतों से बदला, पर मसीह ने बदला नहीं, उन्होंने परमेश्वर की महिमा को पूरी तरह थामे रखा और साथ ही हमारे शरीर को अपनाया। जहाँ आदम की सन्तान ने महिमा को गिराया, वहाँ दाऊद का पुत्र उसे लौटाता है। हबक्कूक का पुराना वाक्य, "विश्वास से धर्मी जन जीवित रहेगा," उसी में आकर पूरा साँस लेता है।
रोमियों 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
तीन बार एक ही क्रिया लौटती है: "परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया" (पद 24, 26, 28)। यूनानी में यह शब्द है παρέδωκεν, "सौंप दिया"। यहाँ परमेश्वर का क्रोध बिजली की तरह नहीं गिरता; वह हाथ खोल देता है। यह न्याय का सबसे डरावना रूप है: जो तुम ज़िद से चाहते हो, वही तुम्हें दे दिया जाना। पर वही शब्द पौलुस आगे मसीह के लिये इस्तेमाल करता है, कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को हमारे लिये सौंप दिया। दोनों "सौंपने" के बीच पूरा सुसमाचार खड़ा है। हमें अपनी अभिलाषाओं के हाथ में सौंपा गया, और उस हाल से निकालने के लिये परमेश्वर ने अपने पुत्र को क्रूस के हाथों में सौंपा। एक ही क्रिया, दो दिशाएँ।
रोमियों 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पत्री लगभग 57 ईस्वी में लिखी गई, संभवतः कुरिन्थ से, जब पौलुस यरूशलेम जाने और उसके बाद पश्चिम बढ़ने की योजना बना रहा था। रोम दस लाख की भीड़ वाला शहर था: तंग गलियाँ, दास और स्वतंत्र किए गए दास, हर मोड़ पर मंदिर और मूर्तियाँ। पद 18-32 का विवरण उन पाठकों के लिये सिद्धांत नहीं, गली का दृश्य था। और यहाँ पौलुस की रणनीति पर ध्यान दें: यह अंश ठीक वैसा लगता है जैसा एक धर्मनिष्ठ यहूदी पाठक अन्यजातियों के बारे में सुनना चाहेगा, सिर हिलाते हुए, सहमति में। अगले अध्याय में पौलुस वही उँगली पाठक की ओर घुमा देगा। पहला अध्याय दोष सिद्ध करता है, ताकि पद 17 की धार्मिकता दान लगे, अधिकार नहीं।
रोमियों 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि "छोड़ दिया" परमेश्वर के न्याय का रूप है, तो उन आदतों को आप क्या कहेंगे जिन्हें आपने वर्षों से बिना लड़े चलने दिया है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Romans 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा।" ध्यान दो, पौलुस यह नहीं कहता कि धर्मी जन विश्वास से बचाया जाएगा, बल्कि जीवित रहेगा। यानी हर सुबह, हर बिल दिखने पर, हर जाँच रिपोर्ट पर, यही साँस लेनी है। और परमेश्वर की धार्मिकता "विश्वास से और विश्वास के लिये" प्रकट होती है, एक कदम भरोसे का, फिर अगला। तुम्हारा आज का कदम कौन सा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 27

पौलुस यहाँ सिर्फ किसी एक पाप की सूची नहीं बना रहा। पीछे मुड़कर देखो: जड़ यह है कि मनुष्य ने "परमेश्वर की सच्चाई को झूठ से बदल डाला।" जब परमेश्वर हटता है, तो जगह खाली नहीं रहती, वहाँ हमारी अपनी इच्छाएँ बैठ जाती हैं और मालिक बन जाती हैं। इसलिए पूछ: मेरे जीवन में किस छोटी चीज़ को मैंने परमेश्वर की जगह दे दी है?

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