रोमियों 2:4
पाठ
"क्या तू उसकी भलाई, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है?" पौलुस यहाँ उस व्यक्ति की ओर मुड़ते हैं जो दूसरों पर दोष लगाता है और चुपचाप यह मान बैठा है कि उसके साथ कुछ नहीं होगा। वे कहते हैं: तूने परमेश्वर के मौन को गलत पढ़ लिया। जो समय तुझे मिला है, वह तेरी बेगुनाही का प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि एक खुला दरवाज़ा है। और फिर वह वाक्य आता है जो पूरे तर्क को पलट देता है, क्योंकि वह दण्ड की नहीं बल्कि कोमलता की बात करता है: "परमेश्वर की भलाई तुझे मन फिराव को सिखाती है।" भलाई सिखाती है। वह डाँटती नहीं, वह घसीटती नहीं, वह सिखाती है।
मर्म
यहाँ तीन शब्द एक साथ रखे गए हैं, और उन्हें धन कहा गया है: भलाई, सहनशीलता, धीरज। धन, यानी कोई ऐसी चीज़ जिसकी गिनती की जा सके, जिसे खर्च किया जा सके, जिसे बरबाद भी किया जा सके। परमेश्वर ने आपके साथ अपना धैर्य खर्च किया है। हर वह दिन जब बिजली नहीं गिरी, हर वह साल जब आप बचे रहे, वह मुफ़्त नहीं था; उसकी कीमत परमेश्वर के धीरज ने चुकाई। और यहीं पाठ कड़वा हो जाता है: हम इस धन को "तुच्छ" जान सकते हैं। अनदेखा करना भी एक तरह का अपमान है। पौलुस यह नहीं कह रहे कि परमेश्वर क्रोधित नहीं होते; वे कह रहे हैं कि उनका क्रोध देर से आता है, और वह देरी स्वयं एक उपदेश है। सवाल यह है कि क्या हमने कभी उस उपदेश को सुना।
सूत्र
परमेश्वर का धीरज बाइबल की सबसे पुरानी धड़कनों में से एक है। जलप्रलय से पहले की वे लम्बी पीढ़ियाँ, निनवे को दिए गए चालीस दिन, इस्राएल के साथ सदियों तक चलने वाली वह बहस जिसमें परमेश्वर बार-बार लौटते हैं, यह सब एक ही बात कहता है: वे जल्दी में नहीं हैं, और उनकी देरी उदासीनता नहीं है। पौलुस इसी धारा में खड़े हैं। आगे रोमियों के तीसरे अध्याय में वे बताएँगे कि यह धीरज क्यों सम्भव था: क्योंकि परमेश्वर ने पहले किए गए पापों को अनदेखा नहीं किया, बल्कि उन्हें क्रूस तक ढोकर ले गए। यानी जिस "धन" की बात यहाँ हो रही है, उसका खाता किसी दिन खाली नहीं हुआ; वह मसीह में चुकाया गया। परमेश्वर की भलाई कोई भावुक नरमी नहीं, वह एक कीमत है जो पहले ही चुकाई जा चुकी है। और यही कारण है कि वह सिखा सकती है।
दर्पण
हम सब एक तरह का हिसाब रखते हैं। उस सहकर्मी का, जो हमेशा श्रेय ले जाता है। उस रिश्तेदार का, जिसने पैसे के मामले में बेईमानी की। उस भाई या बहन का, जिसकी शादी टूट गई और हमने मन ही मन कारण तय कर लिया। यह हिसाब मीठा लगता है, क्योंकि जब तक दूसरे का खाता खुला है, अपना बन्द रहता है। पौलुस यहीं हाथ रखते हैं। आपने जो वर्ष पाए हैं, जिनमें कुछ नहीं टूटा, जिनमें आपका झूठ पकड़ा नहीं गया, जिनमें शरीर साथ देता रहा, वे आपकी निर्दोषिता का सबूत नहीं हैं। वे खुला दरवाज़ा हैं, और दरवाज़े हमेशा खुले नहीं रहते। सवाल यह नहीं कि परमेश्वर कब कार्रवाई करेंगे; सवाल यह है कि उनकी चुप्पी को आप क्या समझ रहे हैं।
आज एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसके बारे में आपके मन में सबसे ज़्यादा आलोचना रहती है, और उस नाम के नीचे ज़ोर से बोलकर यह वाक्य लिखिए: "परमेश्वर ने मेरे साथ कितना धीरज रखा है।"
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र दोष लगाने वाला मनुष्य नहीं, परमेश्वर हैं। और वे यहाँ एक असामान्य मुद्रा में दिखते हैं। यूनानी में जिस क्रिया का अनुवाद "सिखाती है" किया गया है, वह आगेई है, जिसका अर्थ है ले चलना, आगे की ओर खींच ले जाना, जैसे कोई पीठ पर हाथ रखकर किसी को साथ ले जाए। भलाई भाषण नहीं देती; वह चलाती है। यह परमेश्वर का चित्र है जो क्रोध कर सकते थे पर रुके रहे, जिन्होंने अपनी शक्ति को धीमा किया ताकि एक और आदमी लौट सके। ऐसा परमेश्वर जोखिम उठाते हैं, क्योंकि धीरज को कमज़ोरी समझा जा सकता है और अक्सर समझा भी जाता है। फिर भी वे वही करते रहते हैं। उनका मौन खालीपन नहीं, एक रुका हुआ निमन्त्रण है।
शास्त्र की गूँज
योना की पुस्तक का अन्त इसी पद पर एक अजीब टिप्पणी है। योना परमेश्वर से नाराज़ इसलिए नहीं होते कि वे कठोर हैं, बल्कि इसलिए कि वे बहुत धीरजवन्त हैं; निनवे को मिला अतिरिक्त समय उन्हें अन्याय लगता है। यही रोमियों के दूसरे अध्याय का दोष लगाने वाला है, जो दूसरों के लिए दण्ड और अपने लिए रियायत चाहता है। दूसरी ओर पतरस अपनी दूसरी पत्री में उसी देरी की व्याख्या करते हैं जो यहाँ पौलुस करते हैं: प्रभु अपनी प्रतिज्ञा में देर नहीं करते, वे धीरज धरते हैं ताकि कोई नष्ट न हो। दोनों जगह एक ही रहस्य है, बस दो दिशाओं से देखा गया। समय, जिसे हम अक्सर परमेश्वर की अनुपस्थिति का सबूत मानते हैं, असल में उनकी उपस्थिति का सबसे धीमा रूप है।
पृष्ठभूमि
पहले अध्याय के अन्त में पौलुस अन्यजातियों के पापों की एक लम्बी सूची देते हैं, और रोम की कलीसिया में बैठा यहूदी विश्वासी सिर हिलाते हुए सुनता है, हाँ, बिल्कुल सही। फिर दूसरा अध्याय शुरू होता है और उँगली घूम जाती है: "हे दोष लगानेवाले, तू कोई क्यों न हो, तू निरुत्तर है।" यह उस समय की एक जानी-पहचानी शैली है, जिसमें वक्ता एक काल्पनिक विरोधी से सीधे बात करता है ताकि पाठक स्वयं को उसमें पहचान ले। रोम की कलीसिया तनाव में थी: यहूदी विश्वासी सम्राट के आदेश से कुछ वर्ष शहर से निकाले जाने के बाद लौटे थे और अन्यजाति विश्वासियों से भरी एक कलीसिया पाई थी। कौन असली, कौन बाद में जुड़ा, किसके पास परमेश्वर का अधिक अधिकार है, यह हवा में था। इसी तनाव के बीच पौलुस दोनों पक्षों के हाथ से नापने का फीता छीन लेते हैं और उनके सामने परमेश्वर का धीरज रख देते हैं।
चिंतन
पिछले पाँच वर्षों में परमेश्वर का धीरज आप पर कहाँ-कहाँ खर्च हुआ है, और क्या आपने उसे कभी गिना है?
आप किसकी चुप्पी, किसकी देरी को अपने पक्ष में पढ़ रहे हैं, और यदि वह देरी वास्तव में एक निमन्त्रण हो, तो आज आप क्या अलग करेंगे?
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Romans 2:4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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रोमियों 2:4 का क्या अर्थ है?
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रोमियों 2:4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 2:4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 2:4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मैं तेरी इच्छा जानता हूँ, सही और गलत में फर्क भी पहचानता हूँ, पर कई बार मेरा जीवन उस जानकारी से पीछे रह जाता है। मुझे सिर्फ समझने वाला नहीं, करने वाला बना। जो मैं सिर से मानता हूँ, वह मेरे कामों में भी दिखे।
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