7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

1 कुरिन्थियों 7

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

कुरिन्थुस की कलीसिया ने पौलुस को एक पत्र लिखा था, और उसमें बहुत सारे सवाल थे। विवाह के बारे में, अविवाहित रहने के बारे में, और यहाँ तक कि गुलामी और खतना जैसी बातों के बारे में भी। इस अध्याय में पौलुस उन सवालों का जवाब दे रहे हैं।

पौलुस कहते हैं कि विवाह अच्छा है, और पति-पत्नी को एक दूसरे की ज़रूरतों का ध्यान रखना चाहिए। वे यह भी कहते हैं कि परमेश्वर ने हर एक व्यक्ति को अलग-अलग वरदान दिए हैं, कुछ लोग विवाह करते हैं, कुछ अविवाहित रहते हैं, और दोनों रास्ते परमेश्वर की सेवा के तरीके हो सकते हैं।

वे उन लोगों से भी बात करते हैं जिनका जीवनसाथी विश्वास नहीं रखता। पौलुस कहते हैं, अलग मत हो जाओ अगर वह साथ रहना चाहता है, क्योंकि शायद तुम्हारे ज़रिए वह परमेश्वर को जान जाए।

फिर पौलुस एक बड़ी बात कहते हैं, "हर एक जन जिस दशा में बुलाया गया हो, उसी में रहे" (पद 20)। चाहे कोई गुलाम हो या स्वतंत्र, विवाहित हो या अविवाहित, परमेश्वर उसे वहीं मिल सकते हैं जहाँ वह है।

अंत में पौलुस उन लोगों की बात करते हैं जो अभी विवाह नहीं कर चुके। वे कहते हैं कि समय थोड़ा है, और इस दुनिया का रूप बदलता जा रहा है, इसलिए वे चाहते हैं कि लोग बिना फिक्र के, पूरे दिल से प्रभु की सेवा करें।

इसका मतलब क्या है?

यह अध्याय पढ़ना थोड़ा अजीब लग सकता है, क्योंकि यहाँ बहुत सारी बातें विवाह और परिवार के बारे में हैं, जो शायद तुम्हारी उम्र में अभी दूर की बात लगे। पर इसके पीछे एक गहरी बात छिपी है: परमेश्वर हर इंसान को अलग तरीके से बुलाते हैं, और हर बुलाहट में परमेश्वर की सेवा हो सकती है।

पौलुस खुद अविवाहित था, और वह उसके लिए ठीक था, क्योंकि वह अपना पूरा ध्यान प्रभु की सेवा में लगा सकता था। पर वह यह नहीं कहता कि विवाह गलत है, बल्कि कहता है कि दोनों रास्ते अच्छे हो सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर हर किसी को अलग वरदान देते हैं (पद 7)।

एक और गहरी बात यह है कि पौलुस नहीं चाहता कि लोग अपनी परिस्थिति बदलने की जल्दी करें, जैसे गुलाम आज़ाद होना चाहे या अविवाहित विवाह करना चाहे। वह कहता है, जहाँ परमेश्वर ने तुम्हें रखा है, वहीं परमेश्वर के साथ चलो (पद 24)। यह सिखाता है कि हमारी परिस्थिति हमें परमेश्वर से दूर नहीं रखती, हम वहीं उनकी सेवा कर सकते हैं जहाँ हम अभी हैं।

बड़ी कहानी से जुड़ाव

इस अध्याय के बीच में एक छोटा सा वाक्य है जो सबसे गहरा है: "तुम दाम देकर मोल लिये गए हो" (पद 23)। यह दाम क्या था? यीशु मसीह का अपना जीवन, उनका लहू, जो उन्होंने हमारे लिए क्रूस पर दिया। इसलिए अब हम किसी और के गुलाम नहीं हैं, हम मसीह के हैं।

यह पूरा अध्याय असल में इसी बात के इर्द-गिर्द घूमता है। चाहे हम विवाहित हों या नहीं, गुलाम हों या स्वतंत्र, हमारी असली पहचान यह है कि हम मसीह के हैं। परमेश्वर ने हमें "मेल-मिलाप के लिये बुलाया है" (पद 15), यानी वे चाहते हैं कि लोग झगड़े और टूटन की जगह शान्ति और एकता पाएँ। यह वही काम है जो यीशु मसीह ने क्रूस पर किया, उन्होंने परमेश्वर और इंसान के बीच की दूरी को पाटा।

तुम्हारे लिए

तुम अभी शायद विवाह के बारे में नहीं सोचते, और यह ठीक है। पर यह अध्याय तुम्हें कुछ सिखा सकता है जो आज ही काम आता है: जहाँ परमेश्वर ने तुम्हें रखा है, वहीं उनकी सेवा करो। शायद तुम सोचते हो, "काश मैं बड़ा होता", या "काश मेरी ज़िंदगी अलग होती"। पर पौलुस कहता है कि परमेश्वर उसी जगह मिलते हैं जहाँ तुम अभी हो, तुम्हारे घर में, तुम्हारी कक्षा में, तुम्हारे दोस्तों के बीच।

और यह भी याद रखो, तुम दाम देकर मोल लिए गए हो। यीशु मसीह ने तुम्हारे लिए अपनी जान दी, इसलिए तुम्हारी ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारी अपनी नहीं है, वह परमेश्वर को भेंट है। यह सोचना कि "मेरी ज़िंदगी कीमती है क्योंकि मसीह ने मुझे खरीदा" तुम्हें अपने बारे में, अपनी पहचान के बारे में एक नई नज़र दे सकता है।

बातचीत के लिए

पौलुस कहता है कि हर किसी को परमेश्वर की तरफ से अलग वरदान मिले हैं (पद 7)। तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारा वरदान क्या हो सकता है?

पौलुस चाहता था कि लोग बिना फिक्र के परमेश्वर की सेवा करें। तुम्हें किस बात की सबसे ज़्यादा फिक्र रहती है, और क्या तुम वह फिक्र परमेश्वर को सौंप सकते हो?

साथ में प्रार्थना

प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आपने हमें दाम देकर मोल लिया है, और हम अब आपके हैं। हमें सिखाइए कि जहाँ आपने हमें रखा है, वहीं हम आपकी सेवा खुशी से करें। हमारी चिंताओं को आप पर छोड़ना सिखाइए। आमीन।

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1 कुरिन्थियों 7 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 कुरिन्थियों 7 किस विषय में है?
कुरिन्थुस की कलीसिया ने पौलुस को एक पत्र लिखा था, और उसमें बहुत सारे सवाल थे। विवाह के बारे में, अविवाहित रहने के बारे में, और यहाँ तक कि गुलामी और खतना जैसी बातों के बारे में भी। इस अध्याय में पौलुस उन सवालों का जवाब दे रहे हैं।
1 कुरिन्थियों 7 क्या कहता है?
फिर पौलुस एक बड़ी बात कहते हैं, "हर एक जन जिस दशा में बुलाया गया हो, उसी में रहे" (पद 20)। चाहे कोई गुलाम हो या स्वतंत्र, विवाहित हो या अविवाहित, परमेश्वर उसे वहीं मिल सकते हैं जहाँ वह है।
1 कुरिन्थियों 7 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
पौलुस खुद अविवाहित था, और वह उसके लिए ठीक था, क्योंकि वह अपना पूरा ध्यान प्रभु की सेवा में लगा सकता था। पर वह यह नहीं कहता कि विवाह गलत है, बल्कि कहता है कि दोनों रास्ते अच्छे हो सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर हर किसी को अलग वरदान देते हैं (पद 7)।
बच्चे 1 कुरिन्थियों 7 से क्या सीख सकते हैं?
यह पूरा अध्याय असल में इसी बात के इर्द-गिर्द घूमता है। चाहे हम विवाहित हों या नहीं, गुलाम हों या स्वतंत्र, हमारी असली पहचान यह है कि हम मसीह के हैं। परमेश्वर ने हमें "मेल-मिलाप के लिये बुलाया है" (पद 15), यानी वे चाहते हैं कि लोग झगड़े और टूटन की जगह शान्ति और एकता पाएँ। यह वही काम है जो यीशु मसीह ने क्रूस पर किया, उन्होंने परमेश्वर और इंसान के बीच की दूरी को पाटा।
1 कुरिन्थियों 7 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
पौलुस कहता है कि हर किसी को परमेश्वर की तरफ से अलग वरदान मिले हैं (पद 7)। तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारा वरदान क्या हो सकता है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

परन्तु मैं अविवाहितों और विधवाओं के विषय में कहता हूँ कि उनके लिए ऐसा ही रहना अच्छा है, जैसा मैं हूँ।" पौलुस अकेलेपन को कमी नहीं, एक अच्छाई कहता है। समाज शायद तुमसे पूछे कि तुम्हारा घर कब बसेगा, पर परमेश्वर तुम्हें अधूरा नहीं देखता। जिस स्थिति में तू आज है, वहीं तेरे लिए मसीह की सेवा का पूरा स्थान है।

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