7 से 12 वर्ष के बच्चे के लिए

2 कुरिन्थियों 1

प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस एक पत्र लिख रहा है। यह पत्र कुरिन्थुस शहर की कलीसिया के लिए है, यानी वहाँ के उन लोगों के लिए जो यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं। पौलुस की शुरुआत बहुत खास है। वह परमेश्वर की स्तुति करता है, क्योंकि परमेश्वर "दया का पिता" और "सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर" है। फिर पौलुस कुछ बहुत ईमानदार बात बताता है। वह कहता है कि आसिया प्रदेश में उस पर इतना बड़ा क्लेश यानी दुःख और मुसीबत आया था, कि वह लगभग मर ही गया होता। वह लिखता है, "हम जीवन से भी हाथ धो बैठे थे।" यह कोई हल्की बात नहीं है, यह सच्चा डर और निराशा थी।

लेकिन परमेश्वर ने उसे बचाया। इसलिए पौलुस अब भरोसा रखता है कि परमेश्वर आगे भी बचाएगा। वह कुरिन्थुस के लोगों से कहता है कि वे प्रार्थना में उसका साथ दें।

आगे पौलुस अपनी योजनाओं की बात करता है। उसने पहले सोचा था कि वह कुरिन्थुस आएगा, फिर मकिदुनिया जाएगा, फिर वापस आएगा। पर ऐसा नहीं हुआ। कुछ लोगों ने शायद सोचा कि पौलुस अपनी बात पर टिकता नहीं, कि वह पहले "हाँ" कहता है फिर "नहीं"। पौलुस इसका जवाब देता है। वह कहता है कि परमेश्वर विश्वासयोग्य है, और यीशु मसीह में कभी "हाँ" और "नहीं" दोनों नहीं होते, केवल "हाँ" ही "हाँ" होता है।

इसका क्या मतलब है?

यह अध्याय हमें एक ऐसे पौलुस से मिलाता है जो हीरो नहीं बनकर दिखता, बल्कि एक सच्चा इंसान बनकर दिखता है। वह डरा था। वह लगभग टूट गया था। बड़े विश्वासी भी कभी-कभी सोचते हैं कि अब कुछ नहीं बचेगा। यह जानना अच्छा है, क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि दुःख में होना विश्वास की कमी नहीं है।

पर पौलुस वहीं नहीं रुकता। वह बताता है कि परमेश्वर ऐसे परमेश्वर हैं जो मरे हुओं को जिलाते हैं, यानी जिनके पास असंभव को भी संभव करने की शक्ति है। जब पौलुस को शान्ति मिलती है, तो वह वह शान्ति अपने पास नहीं रखता, वह उसे दूसरों तक पहुँचाता है जो दुःख में हैं। यही कारण है कि क्लेश हमेशा बेकार नहीं जाता, कभी-कभी उससे हम दूसरों की मदद करना सीखते हैं।

दूसरी बात, पौलुस की सच्चाई पर एक सवाल उठा था, और वह उसे साफ-साफ जवाब देता है। इससे पता चलता है कि सच बोलना और अपनी बात पर टिकना कितना जरूरी है, यहाँ तक कि जब परिस्थितियाँ बदल जाएँ।

समान सूत्र

पौलुस यहाँ यीशु मसीह की बात एक खास तरीके से करता है। वह कहता है कि परमेश्वर की जितनी भी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब यीशु मसीह में "हाँ" के साथ पूरी होती हैं। एक प्रतिज्ञा यानी एक वादा जो परमेश्वर ने अपने लोगों से किया है। पुराने नियम में परमेश्वर ने कई वादे किए, और वे सारे वादे यीशु मसीह में सच निकले। यीशु में कोई डगमगाहट नहीं है। वह पूरी तरह भरोसे के योग्य हैं।

इसके अलावा, पौलुस बताता है कि परमेश्वर ने विश्वासियों पर अपनी "छाप" कर दी है और पवित्र आत्मा को उनके मन में दिया है। यह ऐसा है जैसे परमेश्वर ने हस्ताक्षर करके कहा है, "यह मेरे हैं, और मैं इनके साथ रहूँगा।" यही बात हमें भी दी गई है।

तुम्हारे लिए

शायद कभी तुम भी किसी मुसीबत में इतना डूब गए हो कि लगा कि अब कुछ ठीक नहीं होगा। पौलुस जैसा बड़ा प्रेरित भी वहाँ से गुजरा। यह याद रखने लायक बात है, अगला दुखी दिन तुम्हारे विश्वास को खत्म नहीं करता।

जब तुम्हें कभी शान्ति और सांत्वना मिलती है, तो सोचो, क्या मैं इसे किसी और के साथ बाँट सकता हूँ, जो अभी दुखी है? और जब तुम कोई वादा करते हो, दोस्त से या घर में, कोशिश करो कि तुम्हारा "हाँ" सच में "हाँ" ही रहे, जैसे यीशु मसीह का वादा हमेशा सच निकलता है।

बात करें

अगर पौलुस जैसा विश्वासी भी कभी सोचता था कि अब सब खत्म हो गया, तो इससे हमारे अपने डर के बारे में क्या पता चलता है?

तुम्हारे जीवन में कोई ऐसी बात है जिसमें तुम्हें अपना "हाँ" सच में निभाना कठिन लगता है?

साथ में प्रार्थना

प्रभु परमेश्वर, आप दया के पिता हैं और शान्ति देने वाले परमेश्वर हैं। जब हम डरते हैं, हमें याद दिलाइए कि आप मरे हुओं को भी जिला सकते हैं। हमें ऐसा दिल दीजिए जो अपनी शान्ति दूसरों के साथ बाँटे, और हमारे मुँह से निकले वादे सच्चे रहें, जैसे यीशु मसीह में आपकी हर प्रतिज्ञा सच्ची निकलती है। आमीन।

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2 कुरिन्थियों 1 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

2 कुरिन्थियों 1 किस विषय में है?
पौलुस एक पत्र लिख रहा है। यह पत्र कुरिन्थुस शहर की कलीसिया के लिए है, यानी वहाँ के उन लोगों के लिए जो यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं। पौलुस की शुरुआत बहुत खास है। वह परमेश्वर की स्तुति करता है, क्योंकि परमेश्वर "दया का पिता" और "सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर" है। फिर पौलुस कुछ बहुत ईमानदार बात बताता है। वह कहता है कि आसिया प्रदेश में उस पर इतना बड़ा क्लेश यानी दुःख और मुसीबत आया था, कि वह लगभग मर ही गया होता। वह लिखता है, "हम जीवन से भी हाथ धो बैठे थे।" यह कोई हल्की बात नहीं है, यह सच्चा डर और निराशा थी।
2 कुरिन्थियों 1 क्या कहता है?
यह अध्याय हमें एक ऐसे पौलुस से मिलाता है जो हीरो नहीं बनकर दिखता, बल्कि एक सच्चा इंसान बनकर दिखता है। वह डरा था। वह लगभग टूट गया था। बड़े विश्वासी भी कभी-कभी सोचते हैं कि अब कुछ नहीं बचेगा। यह जानना अच्छा है, क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि दुःख में होना विश्वास की कमी नहीं है।
2 कुरिन्थियों 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
पौलुस यहाँ यीशु मसीह की बात एक खास तरीके से करता है। वह कहता है कि परमेश्वर की जितनी भी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब यीशु मसीह में "हाँ" के साथ पूरी होती हैं। एक प्रतिज्ञा यानी एक वादा जो परमेश्वर ने अपने लोगों से किया है। पुराने नियम में परमेश्वर ने कई वादे किए, और वे सारे वादे यीशु मसीह में सच निकले। यीशु में कोई डगमगाहट नहीं है। वह पूरी तरह भरोसे के योग्य हैं।
बच्चे 2 कुरिन्थियों 1 से क्या सीख सकते हैं?
जब तुम्हें कभी शान्ति और सांत्वना मिलती है, तो सोचो, क्या मैं इसे किसी और के साथ बाँट सकता हूँ, जो अभी दुखी है? और जब तुम कोई वादा करते हो, दोस्त से या घर में, कोशिश करो कि तुम्हारा "हाँ" सच में "हाँ" ही रहे, जैसे यीशु मसीह का वादा हमेशा सच निकलता है।
2 कुरिन्थियों 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
प्रभु परमेश्वर, आप दया के पिता हैं और शान्ति देने वाले परमेश्वर हैं। जब हम डरते हैं, हमें याद दिलाइए कि आप मरे हुओं को भी जिला सकते हैं। हमें ऐसा दिल दीजिए जो अपनी शान्ति दूसरों के साथ बाँटे, और हमारे मुँह से निकले वादे सच्चे रहें, जैसे यीशु मसीह में आपकी हर प्रतिज्ञा सच्ची निकलती है। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

पौलुस पर आरोप था कि उसकी बातों के पीछे कुछ और छिपा है। उसका जवाब सीधा है: "हम तुम्हें और कुछ नहीं लिखते, केवल वह जो तुम पढ़ते या मानते भी हो।" जो लिखा, वही कहा। जो कहा, वही जिया। सोचो, क्या तुम्हारे शब्दों को किसी ने दो बार पढ़कर समझना पड़ता है? पारदर्शिता प्रेम का सबसे शांत रूप है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

पौलुस अपनी यात्रा की योजना बताते हुए एक छोटी सी बात कहता है, "तुम मुझे यहूदिया की ओर कुछ दूर तक पहुँचा दो।" इतना बड़ा प्रेरित, और फिर भी कलीसिया से सहारा माँग रहा है। जिनको वह सिखाता था, उन्हीं के साथ चलने की उसे चाह थी।

क्या तुम भी किसी को अपनी ज़रूरत बता सकते हो? अकेले चलना पवित्रता नहीं, कई बार बस अभिमान होता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

पौलुस की योजना प्यार से बनी थी, "कि तुम्हें दूसरी बार आशीष मिले।" फिर भी वह योजना बदल गई, और कुरिन्थ के लोगों ने सोचा कि वह चंचल है। कभी तुम्हारा भी सबसे अच्छा इरादा गलत समझा गया है? दुख होता है। पर ध्यान दो, पौलुस सफाई देने से पहले अपने दिल की नीयत परमेश्वर के सामने रखता है। लोगों की राय से पहले उसकी नजर में साफ रहना सीखो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 20

पौलुस पर आरोप था कि वह अपनी बात बदल देता है, कभी हाँ कभी ना। जवाब में वह अपनी सफाई नहीं, मसीह को सामने रखता है: "क्योंकि परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में 'हाँ' के साथ हैं।" तुम्हारी प्रार्थना का जवाब देर से आए, तब भी परमेश्वर का स्वभाव नहीं बदलता। और तुम्हारा "आमीन" कहना, यह उसकी हाँ पर भरोसा करना है।

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For parents and teachers: 7 से 12 वर्ष के उन बच्चों के लिए लिखा गया जो स्वयं पढ़ सकते हैं। पारिवारिक भक्ति और स्कूल में बाइबल पाठ के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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