2 कुरिन्थियों 1
नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
एक आदमी था। उसका नाम पौलुस था।
पौलुस बहुत दुखी था। उस पर बड़ी मुसीबत आई थी। इतनी बड़ी, कि पौलुस को लगा, वह मर जाएगा।
पौलुस डरा हुआ था। बहुत डरा हुआ।
पर तब क्या हुआ? परमेश्वर आए। परमेश्वर ने पौलुस को बचाया।
पौलुस ने कहा, "परमेश्वर मरे हुओं को भी जिलाते हैं।" परमेश्वर बहुत बड़े हैं।
इसका क्या अर्थ है?
पौलुस ने अपने दोस्तों को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में उसने कहा, कैसे परमेश्वर ने उसे शान्ति दी।
जब पौलुस दुखी था, परमेश्वर उसके पास थे। जब पौलुस डरा हुआ था, परमेश्वर ने उसे सम्भाला।
पौलुस ने लिखा, परमेश्वर "सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है।"
सोचो, एक बच्चा गिर जाए। घुटना दर्द करे। रोए। फिर माँ आए। गोद में उठा ले। धीरे से थपथपाए। दर्द कम हो जाए।
परमेश्वर भी ऐसे ही हैं। वे शान्ति देते हैं। जब हम दुखी होते हैं, तब भी।
समान सूत्र
पौलुस ने एक और बात लिखी। बहुत सुंदर बात।
उसने कहा, परमेश्वर की सब बातें यीशु मसीह में "हाँ" हैं। परमेश्वर जो कहते हैं, वह सच होता है। हमेशा।
यीशु मसीह में कभी "हाँ" और कभी "नहीं" नहीं होता। यीशु मसीह में सिर्फ "हाँ" है।
यानी परमेश्वर अपनी बात नहीं बदलते। वे झूठ नहीं बोलते। जो वे कहते हैं, वैसा ही करते हैं।
यीशु मसीह इसका सबूत हैं। यीशु मसीह में परमेश्वर की हर बात पूरी हुई।
तुम्हारे लिए
तुम भी कभी दुखी होते हो? कभी डरते हो?
परमेश्वर तुम्हें भी शान्ति दे सकते हैं। जैसे उन्होंने पौलुस को दी।
जब तुम रोते हो, परमेश्वर सुनते हैं। जब तुम डरते हो, परमेश्वर पास होते हैं।
और जब परमेश्वर तुम्हें कुछ कहते हैं, वह हमेशा सच होता है। उनकी बात बदलती नहीं। यीशु मसीह में सब "हाँ" है।
बात करें
तुम कब डरे थे? किसने तुम्हें उस समय सम्भाला?
परमेश्वर की बात कभी बदलती नहीं। यह सुनकर तुम्हें कैसा लगता है?
संगति में प्रार्थना
प्रिय परमेश्वर,
आप शान्ति के परमेश्वर हैं।
जब मैं डरूँ, मेरे पास आइए।
जब मैं रोऊँ, मुझे सम्भालिए।
आपकी हर बात सच है। धन्यवाद।
आमीन।
2 कुरिन्थियों 1 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
2 कुरिन्थियों 1 किस विषय में है?
2 कुरिन्थियों 1 क्या कहता है?
2 कुरिन्थियों 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
नन्हे बच्चे 2 कुरिन्थियों 1 से क्या सीख सकते हैं?
2 कुरिन्थियों 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पौलुस पर आरोप था कि वह अपनी बात बदल देता है, कभी हाँ कभी ना। जवाब में वह अपनी सफाई नहीं, मसीह को सामने रखता है: "क्योंकि परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में 'हाँ' के साथ हैं।" तुम्हारी प्रार्थना का जवाब देर से आए, तब भी परमेश्वर का स्वभाव नहीं बदलता। और तुम्हारा "आमीन" कहना, यह उसकी हाँ पर भरोसा करना है।
पौलुस और कुरिन्थ की कलीसिया के बीच उस समय गलतफहमी थी, इल्ज़ाम थे, दूरी थी। फिर भी वह लिखता है, "वैसे तुम भी प्रभु यीशु के दिन हमारे लिये घमण्ड का कारण ठहरोगे।" वह आज की खटास से आगे उस दिन को देख रहा है, जब दोनों एक दूसरे को देखकर खुश होंगे। जिस रिश्ते में तुम आज ठंडे पड़ गए हो, क्या उसे उस दिन की नज़र से देख पाओगे?
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