सभोपदेशक 7
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
एक बुद्धिमान राजा था, नाम था सुलैमान। उसने जीवन में बहुत कुछ देखा था, महल भी, दुःख भी। एक दिन उसने कुछ अजीब बात कही। उसने कहा, "मृत्यु का दिन जन्म के दिन से उत्तम है।" क्या यह सुनकर तुम चौंक गए? रुको, आगे सुनो।
सुलैमान कहना चाहता था, जो शोक के घर जाता है, वह ज़्यादा समझदार हो जाता है, उस व्यक्ति से जो सिर्फ़ मौज-मस्ती के घर जाता है। क्योंकि शोक में मन शांत होकर सोचता है, "मैं भी एक दिन मरूँगा। तो अभी मुझे कैसे जीना चाहिए?"
फिर सुलैमान एक और बात कहता है। उसने कहा, मूर्ख की हँसी हांडी के नीचे जलते काँटों जैसी होती है, बहुत शोर, पर कुछ देर में बुझ जाती है। लेकिन बुद्धिमान की डाँट सुनना बेहतर है, भले ही वह कड़वी लगे, क्योंकि वह तुम्हें सच बताती है।
सुलैमान ने यह भी देखा कि जल्दी गुस्सा होना ठीक नहीं। उसने कहा, "अपने मन में उतावली से क्रोधित न हो, क्योंकि क्रोध मूर्खों ही के हृदय में रहता है।" धीरज रखनेवाला, घमण्डी से बेहतर होता है।
फिर वह एक कठिन सच्चाई बताता है। उसने देखा, कभी-कभी अच्छा आदमी दुःख उठाता है, और बुरा आदमी लंबी उम्र पाता है। यह अजीब लगता है ना? पर सुलैमान झूठ नहीं बोलता, वह जो देखता है वही कहता है।
फिर सुलैमान एक सलाह देता है, "अपने को बहुत धर्मी न बना, और न अपने को अधिक बुद्धिमान बना।" यानी अपने आप पर घमण्ड मत करो कि "मैं तो सबसे अच्छा हूँ!" और साथ ही यह भी कहता है, बहुत बुरा भी मत बनो। सबसे अच्छा रास्ता है, परमेश्वर का भय मानना। जो परमेश्वर से डरता है, यानी उनका आदर करता है, वह इन सब मुश्किलों से पार निकल जाएगा।
अंत में सुलैमान खोजता है, "क्या दुनिया में कोई पूरी तरह सीधा, अच्छा इंसान मिलेगा?" वह हज़ार लोगों में खोजता है, पर पाता है कि सब में कहीं न कहीं टेढ़ापन है। उसने कहा, "परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं।" यानी परमेश्वर ने हमें अच्छा बनाया, पर हमने अपने आप को टेढ़ा कर लिया।
इसका अर्थ क्या है?
सुलैमान हमें डराना नहीं चाहता। वह ईमानदार होना चाहता है। जीवन में हमेशा हँसी-खुशी नहीं होती, कभी दुःख भी आता है, और वह दुःख भी हमें कुछ सिखाता है। जो जल्दी गुस्सा करता है, वह मूर्ख की तरह व्यवहार करता है। और सबसे बड़ी बात, कोई भी इंसान अपने आप पूरी तरह अच्छा नहीं है। हम सब में कहीं न कहीं टेढ़ापन है।
समान सूत्र
सुलैमान ने एक पूरी तरह सीधा इंसान ढूँढ़ा, पर नहीं पाया। पर सैकड़ों साल बाद, परमेश्वर ने ऐसा एक इंसान भेजा, यीशु मसीह। वे अकेले पूरी तरह सीधे और सच्चे थे। उन्होंने कभी गलत काम नहीं किया, कभी झूठ नहीं बोला। जब सुलैमान खोजता रहा और नहीं पाया, यीशु में वह मिल गया। और वे हमें भी सीधा करने आए, हमारे टेढ़ेपन को ठीक करने।
तुम्हारे लिए
जब कभी तुम्हें गुस्सा आए, याद रखना, थोड़ा रुको, तुरंत मत भड़को। जब कोई तुम्हें कुछ सही बात कहकर डाँटे, गुस्सा मत करो, सुनो, शायद वह सच हो। और जब तुम्हें लगे "मैं तो सबसे अच्छा हूँ", याद रखना, हम सब में कुछ टेढ़ापन है, सिर्फ़ यीशु ही पूरी तरह सीधे हैं। उनसे मदद माँगो।
बात करें
तुम्हें आखिरी बार कब बहुत जल्दी गुस्सा आया था? उस समय क्या हुआ था?
क्यों सोचते हो कि यीशु ही एकमात्र पूरी तरह सीधे इंसान थे?
साथ में प्रार्थना करें
हे प्रभु परमेश्वर, धन्यवाद कि आप हमेशा सच बोलते हैं। हमें धीरज दीजिए, ताकि हम जल्दी गुस्सा न करें। हमें दिखाइए जहाँ हम टेढ़े हैं, और यीशु के द्वारा हमें सीधा कीजिए। आमीन।
सभोपदेशक 7 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
सभोपदेशक 7 किस विषय में है?
सभोपदेशक 7 क्या कहता है?
सभोपदेशक 7 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे सभोपदेशक 7 से क्या सीख सकते हैं?
सभोपदेशक 7 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
हँसी से खेद उत्तम है, क्योंकि उदास मुख से मन सुधरता है।" सुलैमान हँसी के विरुद्ध नहीं है, वह उस हँसी के विरुद्ध है जो सच्चाई से बचकर भागती है। दुख तुम्हें बैठाकर वह सवाल पूछता है जिसे तुम भीड़ और शोर में टालते रहे। जो आँसू तुम आज रो रहे हो, शायद वही तुम्हारे भीतर कुछ सीधा कर रहे हैं।
अति धर्मी न बन, और न अपने आप को बुद्धिमान बना; तू अपने आप को क्यों नाश करे?"
यह पाप करने की छूट नहीं है। यह उस थकान की चेतावनी है जो अपने आप को सिद्ध साबित करते रहने से आती है। जब धार्मिकता एक नाप बन जाती है, तो पहले हम दूसरों को नापते हैं, फिर खुद को, और अंत में परमेश्वर को भी।
तू क्या साबित करने में घिस रहा है? उसने तुझे पहले ही अपना कहा है।
सुख के दिन में आनन्दित रह, और दुःख के दिन में सोच; क्योंकि परमेश्वर ने दोनों को एक साथ रखा है, ताकि मनुष्य अपने बाद होनेवाली किसी बात को न जान सके।" कल का पन्ना तुझसे छिपा है, यह सज़ा नहीं, दया है। अच्छे दिन को पूरे मन से जी ले, और भारी दिन में बैठकर सोच कि परमेश्वर तुझे क्या सिखा रहा है। दोनों उसी के हाथ से आते हैं।
किसी बात के आरम्भ से उसका अन्त उत्तम है, और अधीर मनुष्य से धीरजवन्त उत्तम है।"
शुरुआत में उत्साह होता है, वादे होते हैं, सपने होते हैं। पर अन्त में सच्चाई सामने आती है, क्या टिका, क्या फल आया।
तू शायद बीच में है, थका हुआ, फल की राह देखता हुआ। रुक मत। धीरज रख। जो शुरू हुआ, उसका अन्त उससे भी सुन्दर होगा।
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