यूहन्ना 8
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
सुबह का समय है। यीशु मसीह मन्दिर में बैठे हैं और लोगों को सिखा रहे हैं। अचानक शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को घसीटकर बीच में खड़ा कर देते हैं। उन्होंने उसे व्यभिचार करते हुए पकड़ा था, यानी उसने अपने विवाह के वचन को तोड़ा था। मूसा की व्यवस्था के अनुसार ऐसे व्यक्ति को पत्थरों से मार डालने की सज़ा थी। ये लोग यीशु से पूछते हैं, "आप क्या कहते हैं?" पर यह प्रश्न सच्चा नहीं है, वे बस यीशु को फँसाना चाहते हैं। अगर यीशु कहें "पथराव करो," तो वे कहेंगे कि यीशु में दया नहीं। अगर कहें "छोड़ दो," तो वे कहेंगे कि यीशु व्यवस्था के विरुद्ध हैं।
यीशु कुछ नहीं कहते। वे झुकते हैं और ज़मीन पर उँगली से कुछ लिखते हैं। हम नहीं जानते वे क्या लिखते थे, बाइबल यह नहीं बताती। फिर वे सीधे खड़े होकर कहते हैं, "तुम में जो निष्पाप हो, वही पहले उसको पत्थर मारे।" एक-एक करके, बड़े से छोटे तक, सब चले जाते हैं। कोई नहीं बचता जो पत्थर उठाए।
यीशु स्त्री से कहते हैं, "मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।" फिर वे कहते हैं, "जगत की ज्योति मैं हूँ।"
इसके बाद यीशु और यहूदी अगुओं के बीच लंबी बातचीत होती है। वे पूछते हैं यीशु कौन हैं, उनका पिता कौन है। यीशु कहते हैं कि वे परमेश्वर की ओर से आए हैं, कि उनका पिता स्वयं परमेश्वर हैं। यह सुनकर यहूदी अगुआ क्रोधित होते हैं। वे कहते हैं उनका पिता अब्राहम है। यीशु उत्तर देते हैं कि अगर वे सचमुच अब्राहम की संतान होते, तो अब्राहम के जैसे काम करते, प्रेम करते, सच बोलते। अंत में यीशु एक चौंकाने वाली बात कहते हैं, "पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ।" यह सुनकर वे यीशु को पत्थर मारने के लिए उठाते हैं, पर यीशु छिपकर मन्दिर से निकल जाते हैं।
इसका क्या अर्थ है?
इस अध्याय में दो कहानियाँ आपस में जुड़ी हैं, और दोनों में एक ही सवाल है: कौन सचमुच पापी है, और कौन न्याय करने का अधिकार रखता है?
शास्त्री और फरीसी स्त्री को दोषी ठहराने आए थे, पर यीशु उन्हें उनके अपने दिल के आगे खड़ा कर देते हैं। "तुम में जो निष्पाप हो" यह वाक्य किसी को भी चुभेगा, क्योंकि सच तो यह है कि कोई भी पूरी तरह निष्पाप नहीं है। यीशु स्त्री को माफ़ नहीं करते क्योंकि उसका पाप छोटा था, बल्कि क्योंकि वे स्वयं उसे नया जीवन देना चाहते हैं। "जा, और फिर पाप न करना" यह आदेश नहीं बल्कि एक नया मौका है।
दूसरी कहानी में यीशु खुलकर बताते हैं कि वे कौन हैं। यह सुनना आसान नहीं था। यीशु के शब्द बहुत बड़े हैं, इतने बड़े कि उनके सुननेवाले पत्थर उठा लेते हैं। यीशु झूठ नहीं बोल रहे थे, न ही डींग मार रहे थे, वे बस सच बता रहे थे, भले ही वह सच सुनने में कठिन था।
सिलसिला
पूरी बाइबल में परमेश्वर अपने लोगों से वादा करते आए हैं कि वे उनके साथ रहेंगे और उन्हें छुड़ाएँगे। यीशु के शब्द "पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ" वही नाम है जो परमेश्वर ने मूसा को जलती हुई झाड़ी में बताया था। यीशु यह कह रहे हैं कि वे कोई नया व्यक्ति नहीं, वे वही परमेश्वर हैं जो हमेशा से हैं। और यह भी वे कहते हैं कि "सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा।" यह स्वतंत्रता पाप की गुलामी से छुड़ाने की बात है, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने उस स्त्री को नए जीवन का मौका दिया।
तुम्हारे लिए
कभी हमें भी दूसरों पर उँगली उठाना अच्छा लगता है, क्योंकि इससे हमारा अपना दोष छिपा रहता है। पर यीशु हमें ईमानदार होने के लिए बुलाते हैं, अपने बारे में भी और दूसरों के बारे में भी। जब कोई गलती करता है, क्या तुम पत्थर उठाने वालों में खड़े होते हो, या यीशु की तरह क्षमा देने की कोशिश करते हो? और जब यीशु कहते हैं "मैं हूँ," क्या तुम उन पर भरोसा करने को तैयार हो, चाहे यह सच समझना कठिन ही क्यों न हो?
बात करें
यीशु ने ज़मीन पर क्या लिखा था, इसे बाइबल नहीं बताती। तुम्हें क्या लगता है, यह जानना ज़रूरी है या नहीं?
यीशु ने स्त्री को माफ़ किया, पर उसे यह भी कहा "फिर पाप न करना।" क्षमा और सच बोलना एक साथ कैसे चल सकते हैं?
साथ में प्रार्थना
प्रभु यीशु, आप हमें जानते हैं जैसे हम सचमुच हैं, फिर भी आप हमें दोषी ठहराने के बजाय नया जीवन देना चाहते हैं। हमें सिखाएँ कि हम दूसरों पर पत्थर उठाने से पहले अपने दिल को देखें। हमारी आँखें खोलें ताकि हम आपको सच्चाई की ज्योति के रूप में पहचान सकें। आमीन।
यूहन्ना 8 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
यूहन्ना 8 किस विषय में है?
यूहन्ना 8 क्या कहता है?
यूहन्ना 8 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे यूहन्ना 8 से क्या सीख सकते हैं?
यूहन्ना 8 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
यीशु ने कहा, "तुम नीचे के हो, मैं ऊपर का हूँ; तुम संसार के हो, मैं संसार का नहीं।" बात सिर्फ जगह की नहीं, जड़ की है। जो जिससे निकला है, उसी की सोच बोलता है। इसलिए वे उसकी बात समझ नहीं पा रहे थे। आज खुद से पूछ: मेरी चिंताएँ, मेरी इच्छाएँ, मेरे फैसले किस मिट्टी से उगते हैं? और अगर मसीह मुझमें है, तो कुछ तो ऊपर का दिखना चाहिए।
मंदिर में यीशु के चारों ओर विरोधी खड़े थे, ताने और आरोप लग रहे थे, और उसी बीच वे कहते हैं, "मेरा भेजनेवाला मेरे साथ है; उसने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।" भीड़ के बीच भी अकेलापन आता है, और अकेले भी संगति मिलती है। ध्यान दो, वे इसे पिता की प्रसन्नता से जोड़ते हैं। जिस काम में तुम इस समय हो, क्या वह पिता को भाता है? शायद तुम्हारा सूनापन दूर होने की शुरुआत यहीं से हो।
यीशु बार बार "पिता" कहते रहे, और वे सुनते रहे, फिर भी लिखा है, "वे न समझे कि हम से पिता के विषय में कहता है।" सबसे साफ बातें भी उस दिल तक नहीं पहुँचतीं जो पहले से तय कर चुका है कि इस आदमी में कुछ नहीं रखा। और यीशु ने बहस नहीं बढ़ाई, उन्होंने क्रूस की ओर इशारा किया। कुछ बातें समझ में तब आती हैं जब हम उन्हें उठाए हुए देखते हैं। तेरी कौन सी उलझन उस दिन तक ठहरी है?
यीशु ने उत्तर देकर फिर सिर झुका लिया, "वह फिर झुककर भूमि पर उँगली से लिखने लगा।" वह उन लोगों की शर्म देखने के लिए नहीं रुके। उन्होंने उस स्त्री को घूरा भी नहीं। सिर झुकाना ही उसकी लाज बचाने का तरीका था। सोचो, तुम्हारे सबसे बुरे पल में भी वह तुम्हें ताकता नहीं, वह तुम्हें ढाँप देता है।
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